पैलेस ऑफ वेस्टमिन्सटर,वेस्टमिन्सटर एबे, सेंट मारग्रेट चर्च,वेस्टमिन्सटर

‘पैलेस ऑफ वेस्टमिन्सटर’ समस्त विश्व में प्रजातन्त्र की जन्मभूमि कहा जाता है। इसको ‘हाउस ऑफ पार्लियामेंट’ भी कहते हैं। यह ‘हाउस ऑफ लॉर्ड्स’ तथा ‘ हाउस ऑफ कामन्स’, संसद के दो सदनों का सभास्थल है। वेस्टमिन्सटर लंदन नगर के मध्य थेम्स नदी के उत्तरी किनारे पर स्थित तथा ऐतिहासिक स्थल वेस्टमिन्सटर ऐबे के समीप है।

ब्रिटेन की महारानी के अनेक राजप्रासादों में से एक है। हेनरी अष्टम तक ब्रिटेन के सभी सम्राट इसमें रहते थे। हेनरी ने बाद में अपना आधिकारिक निवास ‘व्हाइट पैलेस,सेंट जेम्स पैलेस’ में स्थानांतरित कर लिया था। सम्राट के स्थानांतरण कर लेने के बाद यह पार्लियामेंट के रूप में प्रयुक्त होने लगा था। शुरू से ही यह राजप्रासाद लंदन की राजनीतिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र रहा। सरकार के वेस्टमिन्सटर तंत्र का नाम इसी पर पड़ा।

पार्लियामेंट की प्रमुख संरचनाएँ हैं-बिगबेन घड़ी वाली अल्बर्ट मीनार से लगा वेस्टमिन्सटर हाल; उसी के समीप हाउस ऑफ कामन्स; उसके बाद हाउस ऑफ लॉर्ड्स तथा दूसरे छोर पर विक्टोरिया टावर।

वेस्टमिन्सटर हाल-

इन संरचनाओं में वेस्टमिन्सटर हाल सबसे पुराना है। आठ सौ साल पुराने इस हाल की ‘हैमरबीम’ पद्धति से निर्मित बरेंडी का सौंदर्य देखते ही बनाता है। अठारहवीं शताब्दी में निर्मित पार्लियामेंट की मूल इमारत उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ में ही जीर्ण-शीर्ण हो गयी थी। कई वर्षों तक ऐसे ही पड़ी रही। पुनर्निर्माण पर कोई निर्णय नहीं लिया गया। अंततः प्रकृति ने ही इस समस्या का समाधान निकाल डाला। 1834ई की भीषण आग की लपटों में पार्लियामेंट जल कर राख़ हो गयी। बचा तो केवल वेस्टमिन्सटर हाल।

पुनर्निर्माण के अतिरिक्त कोई अन्य समाधान नहीं था। पुनर्निर्माण के लिए प्रस्तुत योजनाओं में से चार्ल्स बेरी की योजना स्वीकृत की गयी। चार्ल्स बेरी ने अभिलम्ब गोथिक स्थापत्यशैली में निर्माण करवाया। पुराने राजप्रासाद के स्थान पर भव्य विशाल संरचना निर्मित की गयी। इसमें 1100 कक्ष हैं जो विशाल आँगन की दो शृंखलाओं के इर्द-गिर्द निर्मित हैं। इस नयी संरचना का कुछ भाग 3.24 हेक्टेयर थेम्स पर स्थित है। इस भव्य संरचना को प्रख्यात गोथिक शिल्पी अगस्टस डब्ल्यू एन पूगीन ने सुसज्जित किया था।

दूसरे विश्वयुद्ध में जर्मनी ने इस इमारत को नष्ट करने के कई प्रयास किए। वास्तव में वे टावर ब्रिज और पार्लियामेंट को नष्ट करना चाहते थे। किसी सीमा तक वे अपने उद्देश्य में सफल भी हो गए। ब्रिज तो बच गया लेकिन पार्लियामेंट पूरी तरह से नष्ट हो गयी। आश्चर्य की बात है कि इस बार भी वेस्टमिन्सटर हाल पर इस विभीषिका का कोई प्रभाव नहीं पड़ा।

विश्वयुद्ध की समाप्ति पर स्पीकर ने एक बार फिर नयी इमारत का शिलान्यास रखा। शिलान्यास के लिए ग्यारहवीं से लेकर उन्नीसवीं सदी तक की इमारतों में इस्तेमाल किए गए लकड़ी के उपकरणों का इस्तेमाल किया गया था। वेस्टमिन्सटर हाल के समीप निर्धारित प्रारूप के अनुसार अत्याधुनिक भवनों का पुनर्निर्माण हो गया।

अविनाशी वेस्टमिन्सटर हाल ब्रिटेन के इतिहास की अनेक घटनाओं का मूक साक्षी है। प्राचीनतम इंग्लिश गिरजा, वेस्टमिन्सटर ऐबे का निर्माण करवाने वाले सम्राट ‘एडवर्ड दी कंफेसर’ की मृत्यु यहीं पर हुई थी। अनेक ऐतिहासिक महत्त्व के निर्णय यहीं पर लिए गए।

विक्टोरिया टावर-

वेस्टमिन्सटर में तीन प्रमुख टावर हैं। इनमें सबसे बड़ा और ऊंचा टावर ‘विक्टोरिया टावर’ है। इसकी ऊंचाई 98.5 मीटर है। यह पैलेस के दक्षिणी कोने में स्थित है। तत्कालीन सम्राट विलियम के सम्मान में इस टावर का डिज़ाइन चार्ल्स बेरी ने तैयार किया था। इसे पैलेस के शाही प्रवेशद्वार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है और यह पार्लियामेंट के पुस्तक संग्रहालय के लिए अग्निरोधक का काम करता है। टावर के तल पर सम्राट के लिए प्रवेशद्वार है। सम्राट इस द्वार से प्रवेश कर पार्लियामेंट का उदघाटन करता है। इसकी ऊंचाई 15.2 मीटर है। मेहराबदार मार्ग कलाकृतियों से सज्जित है। इनमें सेंट जॉर्ज, एंड्रयू, पैट्रिक के अतिरिक्त महारानी विक्टोरिया की प्रतिमा भी है। विक्टोरिया टावर के मुख्य भाग में संसदीय लेखागार के तीस लाख दस्तावेज़ संरक्षित हैं। सबसे ऊपर लोहे से बनी पिरामिडनुमा छत पर ध्वज फहराया जाता है। सम्राट की उपस्थिती में सम्राट का व्यक्तिगत ध्वज तथा झण्डा दिवस पर व संसद के सदन की सभा के समय संघीय ध्वज फहराया जाता है।

बिग बेन-

पैलेस के दक्षिणी कोने पर एक अन्य प्रसिद्ध टावर ‘क्लाक टावर’ है। ‘बिग बेन’ के नाम से प्रसिद्ध यह टावर लंदन की पहचान है। बी.बी.सी के श्रोताओं ने ‘बिग बेन’ की आवाज़ अवश्य सुनी होगी। पार्लियामेंट के अल्बर्ट टावर में 1859ई में इस विशाल घड़ी की स्थापना की गयी थी। तब से आज तक यह घड़ी सुचारु रूप से चल रही है। इसके पेंडुलम का वज़न भले ही दो सौ किलो हो लेकिन घड़ी के समय में एक या आधे सेकेंड का अंतर करना हो तो पैसे के आकार की पेनी को इस्तेमाल किया जाता है। बिजली आने से पहले इसमें चाबी भरने में पाँच घंटे का समय लगता था। वज़न के हिसाब से यह ब्रिटेन की तीसरी सबसे बड़ी घड़ी है। इस का वज़न है 13.8 टन। क्लाक टावर के ऊपर रखी लालटेन आयरन लाइट है। यह केवल तभी जलती है जब अंधेरा हो जाने के बाद भी किसी न किसी सदन की बैठक चलती रहती है। 1885 ई में यह महारानी विक्टोरिया के अनुरोध पर लगाई गयी थी ताकि वे बकिंघम पैलेस से भी देख सकें कि सभी सदस्य उपस्थित हैं या नहीं।

अष्टकोणीय मध्य टावर-

पैलेस के केंद्र में स्थित है सेंट स्टीफन टावर। इसको ‘सेंट्रल टावर’ भी कहते हैं। यह पैलेस के तीन प्रमुख टावरों में सबसे छोटा है। इसकी ऊंचाई 91 मीटर है। दूसरे टावरों के विपरीत इसमें मीनार भी निर्मित है। यह सेंट्रल लॉबी के ठीक ऊपर स्थित है तथा अष्टकोणीय है।

आंतरिक संरचना-

पैलेस ऑफ वेस्टमिन्सटर में 1100 कक्ष, 100 सीढ़ियाँ और 4.8 किलोमीटर लम्बे 91 गलियारे हैं। ये चार मंज़िलों पर निर्मित हैं। ग्राउंड फ्लोर पर कार्यालय, डाइनिंग रूम,और बार है। पहली मंज़िल पर पैलेस के मुख्य कक्ष,वाद-विवाद कक्ष, लॉबी और पुस्तकालय है। ऊपरी दो मंज़िलों को कार्यालय और समिति कक्ष के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।

प्रवेश द्वार-

एक मुख्य प्रवेश द्वार के स्थान पर अलग-अलग वर्गों के लिए अलग-अलग प्रवेश द्वार बने हुए हैं। विक्टोरिया टावर मंज़िल पर टावर के दक्षिण-पश्चिम कोने की तरफ शाही प्रवेश द्वार है। यहाँ से शाही समारोह का आगमन होता है। शाही परम्पराओं के अनुसार संसद का उदघाटन होता है। इसमें शाही सीढ़ियाँ, नॉर्मन बरामदा, रोबिंग रूम,शाही गैलेरी तथा लॉर्ड का कक्ष है। यहाँ पर सभी शाही रस्में सम्पन्न होती हैं। हाउस ऑफ दी लॉर्ड्स के सदस्यों के लिए कुलीन प्रवेशद्वार है। यह पत्थर वाले बरामदे से हो कर जाता है और प्रवेश हाल में जा कर खुलता है। संसद के सदस्य प्रवेश द्वार से भीतर प्रवेश करते हैं। यहाँ कोलाइस्टर की नीचे वाली मंज़िल पर स्थित क्लाकरूम से हो कर पंहुचा जा सकता है। इमारत के पश्चिमी मुख्य द्वार के बीच में है सेंट स्टीफन द्वार। यह द्वार जनता द्वारा निर्वाचित सदस्यों के लिए है।

साम्राज्ञी का रोबिंग कक्ष-

साम्राज्ञी का रोबिंग कक्ष पैलेस के समारोह वाले हाल के दक्षिणी छोर पर स्थित है। जैसा कि नाम से प्रतीत होता है यहाँ पर साम्राज्ञी आधिकारिक पोशाक तथा सिर पर शाही मुकुट को धारण कर पार्लियामेंट की स्टेट ओपनिंग की घोषणा करती है। इस भव्य कक्ष मेंआकर्षण का केन्द्रबिन्दु सम्राट का सिंहासन है। सम्राट यहाँ तीन सीढ़ियों के ऊपर स्थित अपने सिंहासन पर स्कॉटलैंड, इंग्लैंड तथा आयरलैंड के सैनिकों की सुरक्षा में इन राष्ट्रों के फूलों के प्रतीक से सज्जित मंच पर आसीन होता है। कक्ष के चारों ओर अलंकृत पत्थरों से आग की जगह बनाई गयी है। यहाँ पर सेंट जॉर्ज , सेंट माइकेल की भव्य प्रतिमाएँ प्रतिष्ठित हैं।

शाही गलियारा-

रोबिंग कक्ष के दक्षिण में शाही गलियारा है। यह पैलेस के विशाल कक्षों में से एक है। इसका मुख्य उद्देश्य पार्लियामेंट की स्टेट ओपनिंग के शाही जलूस को मंच उपलब्ध करवाना है। इस जलूस को सड़क के दोनों किनारों पर लगी खिड़कियों से बाहर से भी देखा जा सकता है। यहाँ पर विदेशी अतिथियों का स्वागत करने की व्यवस्था भी है। यहाँ पर दीवारों पर लगी पेंटिंग्स में ब्रिटिश सैन्य इतिहास के महत्त्वपूर्ण क्षण संरक्षित हैं। ऊपर लगी काँच की खिड़कियों पर इंग्लैंड और स्कॉटलैंड के सैनिकों का सुंदर चित्रण है।

राजकुमार का कक्ष-

राजकुमार का कमरा शाही गलियारे और लॉर्ड कक्ष के मध्य निर्मित एक छोटा उपकक्ष है। यहाँ पर लॉर्ड्स के सदस्य हाउस से सम्बद्ध विषयों पर विचार-विमर्श करने के लिए आते हैं। इस कक्ष में टंगे चित्रों में ट्यूडर इतिहास का चित्रण है। 28 आयल पेंटिंग्स ट्यूडर शासन के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालती हैं। इस कक्ष में महारानी विक्टोरिया की प्रतिमा भी स्थापित है ।

उनके दोनों ओर न्याय तथा दया की प्रतिमाएँ स्थित हैं। महारानी राजदंड और लारल के साथ सिंहासन पर बैठी हुई हैं। यह इस बात का प्रतीक है कि साम्राज्ञी ही शासन तथा सरकार चलाती हैं।

लॉर्ड’स चैंबर-

हाउस ऑफ लॉर्ड’स का कार्यस्थल पैलेस ऑफ वेस्टमिन्सटर के दक्षिणी भाग में स्थित है। इस के कक्ष भव्य रूप से अलंकृत हैं। चैंबर में बैठने की सीटों के साथ-साथ महल के लॉर्ड’स वाले भाग का फर्नीचर लाल रंग का है। चैंबर के ऊपरी भाग को अलंकृत काँच की खिड़कियों तथा धर्म, शौर्य, व कानून का प्रतिनिधित्व करने वाले व्यंजनात्मक भित्ति चित्रों से सजाया गया है। सभा के सदस्य तीन ओर लाल बेंचों पर बैठते हैं। अध्यक्ष के दायीं तरफ आध्यात्मिक सदस्य ( इंग्लैंड के स्थापित चर्च के आर्कबिशप तथा बिशप) तथा बायीं तरफ अस्थायी सदस्य बैठते हैं। सत्तापक्ष के सदस्य आध्यात्मिक पक्ष के साथ तथा विपक्ष के सदस्य अस्थायी सदस्यों के साथ बैठते हैं।

प्रतिदिन दोपहर के समय दो-तीन घंटे, आवश्यकता होने पर उससे भी अधिक टी.वी पर पार्लियामेंट की कार्यवाही का सीधा प्रसारण होता है।

वेस्टमिन्सटर ऐबे-

लंदन में वेस्टमिन्सटर पैलेस में गोथिक शैली में निर्मित विशाल गिरजाघर वेस्टमिन्सटर ऐबे है। यह वेस्टमिन्सटर पैलेस के पश्चिम में स्थित है। ब्रिटिश साम्राज्य के विशिष्ट पूजास्थलों में से एक तथा शाही परिवार के राज्याभिषेक का परम्परागत स्थल है। यह अब पूर्णरूप से राजपरिवार की निजी सम्पत्ति है। इस सम्पूर्ण क्षेत्र का विकास तथा निर्माण राजपरिवार ने किया है। अतः यहाँ पर राजा और धर्म को एकसाथ देखा जा सकता है।

सातवीं शताब्दी में पहले-पहल पंहुचे ईसाईयों ने थेम्स की तटीय थार्नी आइलैंड ( वर्तमान वेस्टमिन्सटर) पर एक छोटा सा लकड़ी का गिरजाघर बनवाया था। वह तीन-चार सौ साल तक तो जैसे-तैसे टिका रहा बाद में टूटने लगा। ग्यारहवीं शताब्दी में धर्मपरायण इंग्लिश सम्राट ‘एडवर्ड दी कंफेसर” ने देश की सत्ता संभाली। 1042-1052 ई के बीच पापमोचक एडवर्ड ने गिरजाघर के पुनर्निर्माण का कार्य शुरू करवाया। रोमन शैली में निर्मित यह इंग्लैंड का पहला गिरजाघर था। 28 दिसंबर,1065 ई को इसकी विधिवत प्रस्थापना करवायी गयी। एक सप्ताह बाद 5 जनवरी, 1065 ई को एडवर्ड की मृत्यु हो गयी। एक सप्ताह बाद उनको गिरजाघर में ही दफना दिया गया। गिरजाघर का निर्माण कार्य 1090 ई में पूरा हुआ। नौ साल बाद एडवर्ड की पत्नी एडिथ को उनके बगल में दफना दिया गया। उनके उत्तराधिकारी हेराल्ड द्वितीय का राज्याभिषेक इसी गिरजाघर में हुआ था। विगत नौ सौ साल से इंग्लैंड के प्रत्येक राजा या महारानी का राज्याभिषेक इसी गिरजाघर में सम्पन्न होता आ रहा है।

वर्तमान गिरजाघर का निर्माण 1245 ई में हेनरी अष्टम के आदेश पर आरंभ हुआ था। उन्होने इस स्थान को अपनी कब्र के रूप में भी चुना था। 1503 ई में हेनरी सप्तम ने इसमें एक लम्बवत शैली में प्रार्थनाघर बनवाया जो वर्जिन मेरी को समर्पित था ।

इसको हेनरी सप्तम का प्रार्थनाघर अथवा लेडी प्रार्थनाघर भी कहा जाता है। इस के निर्माण के लिए अधिकांश पत्थर फ्रांस में केन, पोर्टलैंड में आइल तथा फ्रांस की ही लोइर घाटी से आयात किए गए थे। इसके भव्य पश्चिमी प्रवेश द्वार पर चित्ताकर्षक आकृतियाँ, प्रतिमाएँ उत्कीर्ण हैं।

अधिकांश महाराजा-महारानियों के विवाह इसी गिरजाघर में सम्पन्न हुए तथा जब तक यहाँ पर पर्याप्त स्थान उपलब्ध रहा वे यहीं पर समाधिस्थ रहे। एडवर्ड दी कंफेसर का नाम इनमें उल्लेखनीय है। इस संत सम्राट की स्मृति में ऐबे के भीतर एक छोटा सा मंदिर भी है। अब भी राजपरिवार के सदस्यों के विवाह यहीं पर सम्पन्न करने की परम्परा चली आ रही है।

इंग्लैंड का पहला छापाखाना ऐबे में ही शुरू हुआ था। शायद इसी लिए छपाई प्रमुख को ‘मास्टर’ के स्थान पर ‘फादर’ कहने का प्रचलन आरंभ हो गया।

यहाँ पर अज्ञात सैनिकों की स्मृति में एक प्रतीकात्मक स्मारक है, वहाँ युद्ध से न लौटे हुए जवानों की स्मृतियाँ मौजूद हैं।

उन्नीसवीं शताब्दी से पहले तक ऑक्सफोर्ड तथा कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के बाद वेस्टमिन्सटर इंग्लैंड का तीसरा सबसे बड़ा विद्यालय था। यहीं पर किंग जेम्स बाइबिल, ओल्ड टेस्टामेंट के प्रथम तीन भाग तथा न्यू टेस्टामेंट के अंतिम आधे भाग का अनुवाद किया गया था। बीसवीं सदी में नयी बाइबिल को भी यहीं पर संग्रहीत किया गया। 15 नवम्बर, 1940 ई के ब्लीट्ज़ के कारण वेस्टमिन्सटर को मामूली क्षति पंहुची।

पोयट’स कार्नर-

ऐबे में ‘पोयट’स कार्नर’ प्रसिद्ध दर्शनीय स्थल है। यहाँ पर अनेक महान कवि, दार्शनिक, राजनीतिज्ञ, राजनयिक, अनुसंधानकर्त्ता, कलाकार, सैनिक और वैज्ञानिक चिरनिद्रा में लीन हैं। इन में शेक्सपियर, चौसर,डीलन, थॉमस, डेविड, वर्ड्सवर्थ, डॉ.जान्सन उल्लेखनीय नाम हैं। 6 सितम्बर, 1997 ई को एलिज़ाबेथ की दूसरी बहू, वेल्स की राजकुमारी डायना स्पेन्सर का अंतिम संस्कार इसी गिरजाघर में किया गया था।

विश्व में अनेक शाही कब्रिस्तान हैं । कुछ कब्रिस्तान आकर्षक भी हैं। संभवतः यही एक ऐसा स्थान है जहां राजा अपने श्रेष्ठ प्रजाजनों के साथ विश्राम कर रहे हैं। राजा के साथ राजसी बड़प्पन जुड़ा है लेकिन किसी श्रेष्ठ लोकोत्तर व्यक्ति को भी यहाँ पर बराबर का स्थान मिलता है। यही है इस ‘थार्नी आइलैंड’ की विशेषता।

17 दिसम्बर, 2010 ई को पोप बेनेडिक्ट 16 इस गिरजाघर में आने वाले पहले पोप थे।

सेंट मारग्रेट’स चर्च, वेस्टमिंस्टर-

सेंट मारग्रेट चर्च वेस्टमिन्सटर के पार्लियामेंट स्क्वेयर में स्थित है। यह लंदन स्थित हाउस ऑफ कामन्स का चर्च है तथा एंटीओक की मारग्रेट को समर्पित है। पैलेस ऑफ वेस्टमिन्सटर , वेस्टमिन्सटर ऐबे के साथ इसको भी 1987 ई में यूनेस्को ने विश्वविरासत घोषित कर दिया था।

बेनेडिक्ट पादरियों ने ऐबे के आसपास के क्षेत्र में रह रहे सामान्य लोगो के देवस्थान के रूप में 12वीं शताब्दी में इस चर्च की स्थापना की थी। सम्राट हेनरी सप्तम ने इस के नवनिर्माण के आदेश दिये थे। 1482-1523 ई के माध्य इस का नवनिर्माण हुआ। 1523 ई में इसकी प्रतिस्थापना हुई थी। सुधारवादी प्रक्रिया शुरू होने से पहले यह लंदन का कैथोलिक परम्परा के रूप में प्रतिष्ठित अंतिम चर्च है। दोनों तरफ सेंट मेरी तथा सेंट जॉन की भव्य अलंकृत प्रतिमाएँ शोभायमान हैं। परिसर के भीतर कई अन्य गिरजाघर हैं।

1614 ई में सेंट मारग्रेट चर्च पैलेस ऑफ वेस्टमिन्सटर का निजी चर्च बन गया था। 1734-1738 ई के मध्य उत्तर-पश्चिमी टावर का पुनर्निर्माण किया गया। पूरी संरचना में पोर्टलैंड पत्थर लगाया गया। 1877ई में सर जॉर्ज गिल्बर्ट स्काट ने चर्च के भीतरी भाग का जीर्णोद्धार कर उसको वर्तमान भव्य स्वरूप प्रदान किया। ब्रिटेन में प्रतिवर्ष अक्तूबर में कोप्टिक आर्थोडॉक्स चर्च यहाँ पर नववर्ष की प्रार्थना सभा का आयोजन करता है। 2016 ई में बिशप एंगोलस ने यहाँ पर धर्मोपदेश दिया था। सेंट मारग्रेट चर्च का पादरी वेस्टमिन्सटर ऐबे का एक पादरी होता है।

यहाँ पर न केवल स्थानीय लोगों के विवाह सम्पन्न होते हैं अपितु अन्य वर्गों के लोगों के विवाह के लिए भी यह लोकप्रिय स्थान है। पार्लियामेंट के सदस्य, कुलीन वर्ग के लोग, हाउस ऑफ लॉर्ड’स तथा हाउस ऑफ कामन्स के सदस्य भी यहाँ पर बंधन में बंध सकते हैं।

1987 ई में पैलेस ऑफ वेस्टमिन्सटर तथा,वेस्टमिन्सटर ऐबे के साथ इसको भी विश्वविरासत के रूप में मान्यता प्रदान कर दी गयी थी। लंदन सम्पूर्ण विश्व के साथ सम्बद्ध है । यहाँ पर खान-पान, आवास की प्रत्येक सुविधा उपलब्ध है। वैसे भी लंदन एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल है।

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प्रमीला गुप्ता

विश्व के सात आश्चर्यों में से एक-पेट्रा

अपनी अद्वितीय स्थापत्यशैली के कारण जॉर्डन स्थित पेट्रा की गणना विश्व के सात आश्चर्यों में होती है। यह ‘होर’ नामक पहाड़ की ढलान पर पर्वतों के बीच एक संकरी घाटी में स्थित है। ‘होर’ पहाड़ मृत सागर से अकाबा की खाड़ी तक फैली ‘अरबा वादी’ तक फैला है। मूल निवासी नाबातियन इस पुरातन नगर को ‘रेकेम’ के नाम से जानते थे।

सात हज़ार साल पहले पेट्रा व आसपास का क्षेत्र बसा हुआ था। अनुमान है कि नबातियन कबीले के लोग यहाँ पर रहते थे। ई पू . छठी शताब्दी में नबातियों ने इस बंजर रेगिस्तान में अपनी राजधानी स्थापित की थी। गुलाबी चट्टानों से बना होने के कारण इसको ‘गुलाबी शहर’ भी कहा जाता है। पेट्रा शहर की गुलाबी बलुआ पत्थरों से बनी नक्काशीदार भव्य इमारतें, कुशल जल प्रणाली अपने आप में अद्वितीय है। पेट्रा का वैश्विक, सांस्कृतिक मूल्य यहाँ पर स्थित भव्य मकबरों, मंदिरों की स्थापत्य शैली, विशिष्ट धार्मिक स्थलों, बरसाती पानी के संचयन के लिए निर्मित नहरों, बांधों, जलाशयों तथा शहर में पानी की सप्लाई के लिए बलुआ पत्थरों की पाइप लाइनों,तांबे की खदानों, मंदिरों, चर्चों व अन्य सार्वजनिक इमारतों के पुरातत्त्वशेषों के कारण है। इमारतों के बाहरी भाग पर रोमन स्थापत्य शैली की छाप अंकित है। अमूल्य वैश्विक सांस्कृतिक धरोहर के रूप में यूनेस्को की विश्व विरासत समिति ने इसको 1985ई में विश्व विरासत घोषित कर दिया था। 2007 ई में यहाँ के ‘अल-खजनेह’ को विश्व के सात आश्चर्यों में से एक माना गया।

इतिहास-

नबातियों द्वारा पारम्परिक शैली में चट्टानों को काट कर बनाए गए नक्काशीदार मंदिर, शाही मकबरे व ‘अल-खजनेह’ विशिष्ट हैं। ई पू. पहली शताब्दी से अंतिम शताब्दी तक की अद्भुत स्थापत्यकला व कलात्मक सौन्दर्य मुग्धकारी है। प्रागैतिहासिककाल से मध्यकाल तक की स्थापत्य शैली में निर्मित संरचनाओं,स्मारकों के पुरातत्त्वशेष उन विलुप्त सभ्यताओं के प्रतीक हैं जो यहाँ पर आती रहीं। सदियों तक गुमनामी के अंधेरे में विलीन पेट्रा को ‘विलुप्त नगर’ (The lost city) कहा जाता है।

पुरातत्त्वशेष इस बात की पुष्टि करते हैं कि नबाती कबीले के लोग अत्यधिक सुविधासम्पन्न थे। वे जलप्रणाली के विशेषज्ञ तथा कुशल व्यापारी थे। उनके गाज़ा,बसरा, दमस्कश के साथ व्यापारिक संबंध थे। यह आश्चर्य की बात है कि इतने समृद्ध शहर के अवशेष सदियों तक जनसामान्य की दृष्टि से ओझल रहे। 1812 ई में स्विस अन्वेषक जॉन लुडविग बरकार्ट ने इस विलुप्त शहर को ढूंढ निकाला था। यूनेस्को के विचार में ये संरचनाएँ विश्व की अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर हैं। मृत सागर के उत्तरी तट पर कामरान की वादी की ग्यारह गुफाओं में प्राप्त अभिलेखों में इस स्थान का ज़िक्र है। उस समय इस स्थान का नाम ‘रेकेम’ था। इन अभिलेखों में 900 दुर्लभ दस्तावेज़ संरक्षित हैं। इनमें ‘हेब्र्यु’ भाषा में लिखी दुर्लभ बाइबल भी है। ये अभिलेख 1947-1956 के बीच प्राप्त हुए । इतिहासकर इन में लिखी सामग्री का गहन अध्ययन करने में जुटे हैं। उनके मतानुसार इन अभिलेखों में लिखी सामग्री से विश्व के इतिहास में नाटकीय परिवर्तन आने की संभावना है।

इतिहासकारो, पुरातत्त्वविदों के लिए इस शहर का निर्माण काल आज भी एक रहस्य बना हुआ है। इस रहस्य को जानने के लिए उनके पास कोई भी विश्वसनीय प्रमाण नहीं है। हार कर निर्माण काल को निर्धारित करने के लिए उन्होने स्थापत्यशैली का सहारा लिया है। अनेक संरचनाओं में ग्रीक, रोमन तथा सीरियन शैली का प्रभाव परिलक्षित होता है। तत्कालीन स्थानीय स्थापत्य शैली कहीं नहीं दिखाई देती है। यहाँ की मूल सभ्यता का आकलन करने के लिए पुरातत्त्वविद यूनानी सभ्यता के मकबरों को आधार मान कर अध्ययन कर रहे हैं। ये संरचनाएँ प्राचीनतम संरचनाएँ हैं। आकलन के अनुसार ये ई पू. छठी शताब्दी से प्राचीन नहीं हैं।

प्रवेश द्वार-

इस क्षेत्र का प्रवेशद्वार पूर्व में मूसा वादी से है।वहाँ से एक संकरी, अंधेरी खाई से अंदर जाने का रास्ता है। इसके दोनों तरफ ऊंची चट्टानें हैं।इस्लामिक अभिलेखों के अनुसार पेट्रा उस स्थान पर स्थित है जहां पर मूसा नबी ने एक पत्थर पर छड़ी मारी थी और वहाँ से अक्षय जलधारा निकल पड़ी थी । इसी कारण से यह घाटी ‘मूसा वादी’ के नाम से प्रसिद्ध है। यह खाई तीन-चार मीटर चौड़ी तथा एक मील लम्बी है। प्रवेशद्वार बांध से शुरू हो कर ‘अल खजेनह’ तक जाता है। चट्टानों पर दोनों ओर बलुआ पत्थरों से चित्ताकर्षक आकृतियाँ उत्कीर्ण हैं। प्रवेशद्वार के दोनों ओर पानी के लिए पाइप लाइनें बिछी हैं। सिक अर्थात प्रवेश द्वार से बाहर ‘बब-अल-सिक नामक घाटी में वर्गाकार विशाल स्मारक हैं। इन चट्टानों को ‘जिन चट्टानें’ भी कहा जाता है। यहीं पर है ‘ओबेलिस्क समाधि’ (मकबरा)।

अल-खजनेह (कोषागार)

प्रवेशद्वार अर्थात ‘सिक’ यहाँ की सर्वाधिक सुंदर इमारत ‘अल-खजनेह’ तक जाता है। वास्तव में यह एक शाही मकबरा है। स्थानीय अफवाहों के आधार पर इसका नाम ‘अल-खजनेह’ (कोषागार) पड़ गया।

कुछ लोगों ने यह अफवाह फैला दी कि यहाँ पर एक बड़े घड़े में लुटेरों ने लूट का माल छिपा रखा है। इन अफवाहों को सुन कर बेदुइन अरबों ने उस खजाने को पाने के लिए यहाँ पर धावा बोल दिया। घड़े को तोड़ने के लिए अंधाधुंध गोलियां बरसा दीं। उनको शायद इस बात का अहसास नहीं था कि वह एक मजबूत चट्टान से बना हुआ था। आज भी उस स्थान पर गोलियों के निशान मौजूद है।

भव्य मंदिर-

ई पू. पहली शताब्दी के अंत में चित्ताकर्षक,भव्य मंदिर का निर्माण बहुत तेज़ी से हुआ। इस निर्माण कार्य को संभवतः अलेक्ज़ेंडरिया के प्रशिक्षित वास्तुशिल्पियों ने सम्पन्न किया।

मंदिर की चारदीवारी के साथ छह खूबसूरत पगडंडियाँ थीं। ऊपर तीन स्तंभों पर नक्काशीदार तीन हाथियों के सिर सुशोभित थे। मंदिर पर रंगीन प्लास्टर किया था तथा पानी के लिए पाइप लाइनें बिछी हुई थीं।

सम्राट अरेटस चतुर्थ ने पहली शताब्दी के मध्य अनेक संरचनाओं का निर्माण करवाया था। उसी समय संभवतः मंदिर का भी नव निर्माण करवाया हो। मंदिर से स्तंभों वाली गली से बाइजेंटाइन चर्च का मनोरम दृश्य दिखाई देता है। एक अभिलेख से ज्ञात होता है कि सम्राट अरेटस ने नबातियों के प्रमुख देव ‘दुसरा’ के मंदिर के साथ थियेटर बनाने का भी आदेश दिया था। अतः मंदिर के साथ थियेटर भी निर्मित है। अन्य किसी स्थान पर किसी मंदिर में स्तंभों वाली गली तथा थियेटर निर्मित होने का प्रमाण नहीं मिलता है। कुछ पुरातत्त्वविदों के मतानुसार यहाँ पर मंदिर नहीं अपितु प्रशासनिक कार्यालय थे। जो भी हो पुरातत्त्वविद आज भी इन रहस्यों की गुत्थी सुलझाने में माथा-पच्ची कर रहे हैं।

मठ-

कुछ पुरातत्त्वविदों,व पर्यटकों के विचार में मठ ‘अल खजनेह’ का विस्तीर्ण तथा बेहतर प्रतिरूप है। यहाँ तक पंहुचने के लिए 800 सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं। पुराने पेट्रा में निर्मित म्यूज़ियम के समीप से मठ तक जाने का मार्ग शुरू हो जाता है। ऊपर जाने के लिए खच्चर,टट्टू मिल जाते हैं। मार्ग के आरंभ में धूल भरी पगडंडियों के पीछे नक्काशीदार मकबरे हैं।

स्तंभों के बीच स्थित गली-

मेहराबदार प्रवेशद्वार के सामने पेट्रा शहर में स्तंभों के बीच अवस्थित गली के पुरातत्त्वशेष प्राप्त हुए हैं। यह पृष्ठभूमि में दीख रहे थियेटर से कस्र-अल बिंत ( Qasr al-Bint) की पुराने बाज़ार तक जाते हैं। मूल संरचना नबातियन शैली का प्रतिनिधित्व करती है। रोमन काल में इसका नवनिर्माण हुआ होगा। यह प्राचीन पेट्रा का प्रमुख बाज़ार होगा। 106 ई में गली की चौड़ाई मीटर कर दी गयी थी।

शाही मकबरे-

भव्य मंदिर के सामने शाही मकबरे हैं। किंवदंतियों के अनुसार यह शहर की व्यापारिक, वाणिज्यकी गतिविधियों का प्रमुख केंद्र था। बाइजेंटाइन काल की चौथी,पाँचवीं तथा छठी शताब्दी तक यह स्थान गली के रूप में इस्तेमाल होता रहा। आवाजही की सुविधा को ध्यान में रख कर इस को आयताकार तथा वृत्ताकार में निर्मित किया गया था। मध्य में जलनिकासी के लिए नीचे पाइप लाइने बिछी हुई हैं।

ओपन स्टेडियम-

पुरातत्त्विक दृष्टिकोण से यह संरचना अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है। नबातियन साम्राज्य में सम्राट अरेटस चतुर्थ के शासन काल में पेट्रा सांस्कृतिक तथा राजनैतिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र था। निर्माण कार्य भी पूरे ज़ोर-शोर से चल रहा था। कहते हैं कि ‘हेरोड दी महान’ द्वारा निर्मित थियेटर को देख कर नबातियन सम्राट के मन में भी थियेटर निर्माण का विचार आया। थियेटर के भीतर लगभग 4,000 दर्शकों के बैठने की व्यवस्था थी। डिजाइन के दृष्टिकोण से रोमन दिखाई देने पर भी इस पर नबातियन स्थापत्य शैली की छाप स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है। बाद में अरेटस के बेटे मैकस द्वितीय ने इसमें कुछ परिवर्तन करवाया।

धर्म-

ये अमूल्य स्मारक 264 वर्ग कि.मी क्षेत्र में पंक्तिबद्ध रूप से निर्मित हैं। नबाती कबीले के लोगों ने इसको बसाया था। उनकी भाषा ‘आर्मेक’ थी। वे ‘दुशरा’ देवता तथा ‘उज्जा’,’अलत’, व ‘मनह’ नामक तीन देवियों की पूजा करते थे। इनके अतिरिक्त वे अपने सम्राटों की पूजा भी देवरूप में करते थे। उनके पौराणिक आख्यान, सम्राटों के नाम, शासन प्रणाली सब अतीत के गर्भ में विलुप्त हो चुकी है। पाँचवीं शताब्दी में ईसाई मतावलम्बियों ने इस क्षेत्र में प्रवेश किया था। उसके बाद का इतिहास लिखित रूप में उपलब्ध है।

विलुप्त सभ्यता-

363 ई में आए भूकंप में यहाँ की जलप्रणाली नष्ट हो गयी थी। शहर में जलप्राप्ति का कोई साधन नहीं बचा था अतः लोग जीवन-यापन के लिए दूसरे स्थानों पर विस्थापित हो गए थे। सागर मार्ग भी नष्ट हो गया था। परिणाम स्वरूप पेट्रा का व्यापार, सुख-समृद्धि सब विलुप्त हो गया। डाकुओं,लुटेरों ने इसको अपना ठिकाना बना लिया। वे आते और यहाँ से अमूल्य, ऐतिहासिक सम्पदा लूट कर ले जाते। नक्काशीदार ग्रेनाइट पत्थरों से निर्मित कुछ इमारतें ही शेष बची हैं जो पेट्रा के गौरव शाली इतिहास की साक्षी हैं। इस अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर के अवशेषों को प्रतिवर्ष अगणित पर्यटक देखने के लिए आते हैं। कोविड-19 महामारी के चलते आज यहाँ पर सन्नाटा पसरा है।

विश्व साहित्य, लोकमञ्च पर पेट्रा की लोकप्रियता-

सन 1845 में ब्रिटिश कवि विलियम बुरगोन को उनकी कविता ‘पेट्रा’ के लिए ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी का ‘नौडीगेट’ पुरस्कार मिला था।

पेट्रा का उल्लेख अनेक उपन्यासों यथा-‘Left Behind Series’, ‘ Appointment with Death; ‘ The Eagle in the Sand; ” The Red Sea Sharks’ में मिलता है।

अंग्रेज़ महिला ने पेट्रा बेदुइन के साथ 2004-2013 तक उम सेयहोन में बिताए गए समय को कलमबद्ध किया ।

‘Indiana Jones and the Last Crusade; Arabian Nights; Passion in the Desert; Mortal Combat ; Sinbad and the Eye of the Tigar, फिल्मों में भी पेट्रा के चित्र देखे जा सकते है।

अनेक टी.वी सीरियलों में भी खूबसूरत पेट्रा देखा जा सकता है।

विशेष-

लाल-गुलाबी रंग के पत्थरों से निर्मित ‘गुलाबी सिटी’ पेट्रा के समीप दो अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट-अकाबा एयरपोर्ट तथा वादी अरबा एयरपोर्ट है। जॉर्डन पंहुचने के बाद पेट्रा तक जाने के लिए परिवहन के अनेक विकल्प हैं। अम्मान से पेट्रा तक आने-जाने के लिए पूरे दिन का टिकट लिया जा सकता है। इसके अतिरिक मिनी बसें भी चलती हैं। अम्मान से पेट्रा तक दो घंटे का सफर है। अम्मान में रहने, खाने-पीने की समुचित व्यवस्था है।

पेट्रा के दर्शनीय स्थलों को देखने के लिए प्रातःकाल अथवा शाम का समय सर्वोपयुक्त है। दिन में रेगिस्तान की तपती गर्मी में पर्यटक बेहाल हो जाते हैं। शाम को ढलते सूरज की सतरंगी किरणों की रोशनी में देदीप्यमान नक्काशदार बलुआ पत्थरों की अद्वितीय संरचनाओं को देखने में अलौकिक आनंद आता है। तो क्यों नहीं जीवन में एक बार इस अलौकिक आनंद की अनुभूति की जाए।

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प्रमीला गुप्ता

प्रकृति का चमत्कार-ग्रैंड कैन्यन

उत्तरी एरिज़ोना में स्थित ग्रैंड कैन्यन संयुक्त राज्य अमेरिका में पर्यटकों का सर्वाधिक आकर्षण का केंद्र है। विशाल भाग में अनेक अलग-अलग खंड हैं। ग्रैंड कैन्यन नेशनल पार्क इस का सबसे बड़ा खंड है। ग्रैंड कैन्यन सदृश चामत्कारिक, मुग्धकारी दृश्यावली पृथ्वी पर संभवतः कहीं अन्यत्र दिखाई न दे। इसका सौंदर्य वर्णातीत है। शब्दों अथवा चित्रों की परिधि में बांध पाना दुरूह ही नहीं दुस्साहस भी होगा। दर्शक इसे देख कर चित्रलिखित से रह जाते हैं। उनको अपनी आँखों पर विश्वास नहीं होता, बार-बार आँखें मलते हैं, बारबार प्रकृति के इस अजूबे को निहारते हैं। अनन्तकाल से बह रही कोलेरेडो नदी के वेग से कोलेरेडो के रेतीले, बंजर पठार में डेढ़ कि.मी गहरी सर्पीली, बलखाती दरारें डाल दी हैं।

यद्यपि ग्रैंड कैन्यन विश्व की सबसे गहरी घाटी नहीं है तथापि अपने आकार और चित्ताकर्षक परिदृश्य के कारण सम्पूर्ण विश्व के पर्यटकों के विशिष्ट आकर्षण का केंद्र है। प्रकृति के इस अनन्तकालीन चामत्कारिक सौंदर्य की अनुभूति सर्वप्रथम अमेरिका के राष्ट्रपति थियोडोर रूज़वेल्ट ने की थी। 1903 ई में वे यहाँ पर भ्रमणार्थ आए थे। वे यहाँ के प्राकृतिक सौंदर्य को देख कर मंत्रमुग्ध रह गए थे। उसके बाद भी उन्होने यहाँ की कई बार यात्रा की। उस समय कुछ व्यवसायी इस क्षेत्र को पर्यटन स्थल के दृष्टिकोण से रेलमार्ग से जोड़ने तथा कैन्यन के दोनों किनारों पर होटल निर्माण की योजना बना रहे थे। राष्ट्रपति रूज़वेल्ट यह देख कर चिंतित हो गए। 1908 ई में उन्होने प्रकृति की इस अमूल्य धरोहर को ‘एंटिक्विटी एक्ट’ के अंतर्गत राष्ट्रीय स्मारक घोषित कर दिया।

इस घोषणा से नाराज़ हो कर स्थानीय व्यवसायी रेल्फ कैमरून ने फेडरल गवर्नमेंट पर मुक़द्दमा दायर कर दिया। लम्बी लड़ाई के बाद 1920 ई में सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति रूज़वेल्ट के निर्णय को वैधता प्रदान कर दी। राष्ट्रपति रूज़वेल्ट के निर्णय के फलस्वरूप न केवल अमेरिका के अपितु सम्पूर्ण विश्व के पर्यटक ग्रैंड कैन्यन के मुग्धकारी सौंदर्य का आनंद ले रहे हैं तथा भविष्य में भी लेते रहेंगे।1979 ई में यूनेस्को की विश्व विरासत समिति ने इसको विश्व विरासत के रूप में मान्यता प्रदान कर दी।

इतिहास-

ग्रैंड कैन्यन से पृथ्वी के अनंतकालीन भूगर्भीय इतिहास का पता चलता है। 277 मील लम्बी,18 मील चौड़ी और 6,093 फीट से अधिक गहरी घाटी की दीवार की चट्टानें पृथ्वी के इतिहास की एक समयरेखा बताती हैं। इसकी गठन प्रक्रिया 70 मिलियन साल पहले आरंभ होने की संभावना है लेकिन प्रमुख भाग लगभग छह मिलियन साल पहले आकार लेने लगे थे।

ग्रैंड कैन्यन-

ग्रैंड कैन्यन दो प्रमुख खंडों में विभाजित है-1-दूरस्थ उत्तरी रिम, 2- अधिक सुलभ दक्षिणी रिम। घाटी का छोटा दक्षिण-पश्चिमी भाग दो भागों में अवस्थित है-हवापाई और वलापायी। घाटी के प्रत्येक क्षेत्र का अपना विशिष्ट आकर्षण है तथा आगंतुक के मनोरंजन के लिए विभिन्न साधन हैं। पार्क में एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने के लिए दो विकल्प हैं-पैदल अथवा कार( बस)। 34 कि.मी दो लम्बी पगडंडियाँ पार्क के दोनों भाग-उत्तरी रिम तथा दक्षिणी रिम को कोलेरेडो नदी के ऊपर निर्मित ‘काइबा सस्पेंशन ब्रिज’ जोड़ता है। दक्षिणी रिम उत्तरी रिम से 354 कि. मी दूर है। कार से यात्रा करने में पाँच घंटे लग जाते हैं। लैंडस्केप, जलवायु तथा वनस्पति के दृष्टिकोण से उत्तरी और दक्षिणी रिम सर्वथा पृथक हैं। एक पार्क में दो पार्क की तरह हैं। एक ही दिन में घाटी के दोनों किनारों की यात्रा करना असंभव है।

दक्षिणी रिम-

ग्रैंड कैन्यन राष्ट्रीय उद्यान पहली बार जाने पर दक्षिणी रिम से अपनी यात्रा आरंभ करनी चाहिए। यह अधिक सुविधाजनक व आनंदप्रद है। दक्षिणी रिम पूरा साल ,24 घंटे खुला रहता है। आगंतुकों के लिए शिविर, होटल, रेस्तरां आदि की सभी सेवाएँ पूरा साल उपलब्ध रहती हैं। यहाँ स्थित ग्रैंड कैन्यन विलेज संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रीय ऐतिहासिक स्थलों की सूची में सम्मिलित है।

यह गाँव पूरी तरह से पर्यटकों की सेवा पर केन्द्रित है। इस गाँव से रेलवे घाटी तक रास्ता जाता है। 1901ई में विलियम्स शहर से दक्षिणी रिम तक रेलवे के निर्माण के लिए बसाया गया था यह गाँव। गाँव में अनेक ऐतिहासिक इमारतें हैं । इसका ऐतिहासिक केंद्र अमेरिका के राष्ट्रीय ऐतिहासिक स्थलों की सूची में सम्मिलित है।

विजिटर सेंटर-

विजिटर सेंटर से ग्रैंड कैन्यन के किनारों की यात्रा, विशिष्ट दर्शनीय स्थलों की जानकारी, नीचे जाने के लिए अनुभवी गाइड के साथ कोलेरेडो नदी में राफ्टिंग संबंधी विस्तृत जान कारी प्राप्त की जा सकती है। विजिटर सेंटर तथा अन्य विशिष्ट स्थानों पर तैनात वन अधिकारी मानव विकास के इतिहास, वनस्पतियों , फूलपौधों, वन्यप्राणियों एवं भूगर्भ के बारे में रोचक जानकारी प्रदान करते हैं।

लुक आउट स्टुडियो-

Lookout Studio, Grand Canyon

1914 ई में पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रख कर वास्तुकार कोल्टर के डिजाइन के अनुरूप लुक आउट स्टुडियो के निर्माण में स्थानीय चट्टानों का उपयोग किया गया था। यह इमारत अमेरिकी राष्ट्रीय ऐतिहासिक स्थलों के रजिस्टर में सूचीबद्ध है। यहाँ से घाटी की मनमोहक दृश्यावली दिखाई देती है। घाटी की देखरेख के लिए बाहरी छत पर दूरबीनें लगी हैं। घाटी से संबद्ध पुस्तकों की प्रदर्शनी और स्मारिका की एक दुकान है।

19वीं सदी के अंत में सभी मूल आदिवासी जन- जातियाँ विलुप्ति के कगार पर थीं। उस समय अमेरिकियों के विचार में निकट भविष्य में सभी मूल आदिवासियों की बीमारी और सफ़ेद लोगों के संपर्क में आने के कारण पूरी तरह से विलुप्त हो जाने की संभावना थी। कुछ यात्रा कंपनियों ने विशेष रूप से दक्षिण-पश्चिम के यात्रियों को इन विलुप्त हो रहे आदिवासियों की जीवनशैली से परिचित करवाने की योजना बनाई। 19वीं शताब्दी के मानकों के अनुसार ‘होपी’ जन जातियों को सभ्य माना जाता था क्योंकि वे पत्थरों के घरों में स्थायी रूप से रहते थे। घर विशिष्ट स्थापत्य शैली के आधार पर निर्मित तथा शांतिपूर्ण थे। पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए सांता फे रेल रोड ने दक्षिण रिम पर एक ‘होपी हाउस’ बनाया। आर्किटेक्ट कोल्टर ने पारंपरिक प्युब्लो स्थापत्य शैली में इसका निर्माण करवाया था। यहाँ पर आगंतुक होपी कारीगरों के शिल्प को देख सकते थे, उनका बनाया हुआ सामान खरीद सकते थे। वर्तमान में इसके भीतर दुकानें, प्रदर्शनी और एक संग्रहालय है।

मार्केट प्लाज़ा-

यह ग्रैंड कैन्यन का शॉपिंग सेंटर है। यहाँ पर सुपरमार्केट, अन्य दुकानें, एक बैंक, एक पोस्टऑफिस और एक कैफे है। मार्केट प्लाज़ा में एक बड़ी कार पार्किंग भी है। किराने की दुकानें, डिपार्टमेंटल स्टोरों की पूरी शृंखला, कपड़े, स्मृति चिन्ह, कैंपिंग के लिए और घाटी में लम्बी यात्रा के लिए आवश्यक सभी सामान किराए पर उपलब्ध है। पूरा साल, प्रतिदिन सुबह 8 बजे से शाम 7 बजे तक खुला रहता है। खुलने का अतिरिक्त समय मौसम के अनुसार बदलता रहता है।

यावपय संग्रहालय भूविज्ञान-

मार्केट प्लाज़ा से 1.6 कि.मी दूर है यावापय भूविज्ञान संग्रहालय में थ्री डी मॉडलों, चित्रों , वृत्तचित्रों के माध्यम से ग्रैंड कैन्यन के जटिल भूगर्भीय इतिहास के बारे में जानकारी प्रदान की जाती है। प्रदर्शनियों द्वारा रॉक लेयर्स की गठन प्रक्रिया तथा कोलेरेडो पठार को ऊपर उठाने तथा ग्रैंड कैन्यन को तराशने की प्रक्रिया समझायी जाती है। संग्रहालय स्मृति चिन्हों के लिए सुंदर स्थान है। यावापय संग्रहालय के समीप ही भूविज्ञान का यावपई पायण्ट पर्यवेक्षण डेक है।

ग्रैंड कैन्यन ट्रेन स्टेशन-

लकड़ी से निर्मित यह ऐतिहासिक रेलवे स्टेशन ग्रैंड कैन्यन विलेज के केंद्र में स्थित है। 1909-1910 ई के मध्य सांता फे कंपनी ने इसका निर्माण करवाया था। यह संयुक्त राज्य अमेरिका में लकड़ी से निर्मित तीन स्टेशनों में से एक है। स्टेशन एल टावर होटल के सामने घाटी के किनारे से केवल 100 मीटर की दूरी पर है। 100 से अधिक सालों से यह पर्यटकों के आगमन और प्रस्थान के लिए प्रारम्भिक बिन्दु के रूप में काम कर रहा है। स्टेशन संयुक्त राज्य अमेरिका के ऐतिहासिक स्मारकों के रजिस्टर में सूचीबद्ध है।

आकर्षण के अन्य प्रमुख स्थल हैं- ‘कुप्पी स्टूडियो'( कोलब स्टुडियो); ‘बकी ओ’नील हाउस’; ‘माथर प्वायंट’।

दक्षिणी रिम लुक आउट-हर्मिट्स रेस्ट रोड-

दक्षिणी रिम के अवलोकन केंद्र दो प्रमुख सड़कों पर स्थित हैं। हर्मिट्स रेस्ट रोड और डेज़र्ट व्यू ड्राइव। हर्मिट्स रेस्ट रोड ‘वेस्ट ड्राइव रिम’ के नाम से भी जानी जाती है। यह हर्मिट्स रेस्ट टर्मिनस के ग्रैंड कैन्यन सूचना केंद्र के समीप स्थित हर्मिट्स रेस्ट ट्रांसफर स्टॉप से 11 कि.मी लम्बा मार्ग है। घाटी के किनारे नौ अवलोकन स्थल हैं। यह मार्ग अत्यधिक लोकप्रिय है। इस पर राष्ट्रीय पार्क की निःशुल्क बसें तथा वाणिज्यिकी बसें चलती हैं। घाटी के किनारे, हर्मिट रेस्ट रोड ने पैदल चलने वालों और साइकिल चालकों के लिए समानान्तर 12.6 कि.मी रास्ता तैयार किया है। यहाँ पर स्वतंत्र रूप से यात्रा तथा भिन्न स्थलों से चित्ताकर्षक दृश्यावली देखी जा सकती है।

मारीकोपा प्वायंट से पुरातन खदानों के पुरातत्त्वशेष तथा 1893 ई में ताँबे, चांदी और वेनेडियम की खदानें और 1956 ई से 1969 ई तक यहाँ की संयुक्त राज्य में यूरेनियम की सबसे बड़ी खदान देखी जा सकती है। उस समय यह खदान पूरे अमेरिका में यूरेनियम का सबसे समृद्ध स्रोत था।

होपी प्वायंट के अवलोकन स्थल से सूर्यास्त और सूर्योदय का मनोहारी दृश्य दिखाई देता है। यहाँ से पश्चिम में कोलेरेडों नदी की सुंदर दृश्यावली दिखाई देती है। इनके अतिरिक्त मोज़ावे प्वायंट,हर्मिट रेस्ट अन्य अवलोकन मंच है।

डेज़र्ट व्यू ड्राइव रोड-

डेज़र्ट व्यू ड्राइव 42 कि.मी लम्बी है। यह ईस्ट रिम ड्राइव के नाम से भी जानी जाती है। यह ग्रैंड कैन्यन विलेज से ले कर डेज़र्ट व्यू वाच टावर और राष्ट्रीय उद्यान के पूर्वी प्रवेश द्वार तक विस्तीर्ण है। डेज़र्ट व्यू वाच टावर से अनेक अवलोकन स्थलों तक सड़क जाती है। प्रमुख हैं-मोरन प्वायंट । यहाँ अवलोकन डेक पर जाने के लिए छोटी साइड रोड है। इस का नाम लैंडस्केप चित्रकार थॉमस मोरन के नाम पर रखा गया था। उन्होने 1873 ई में कोलेरेडो नदी के किनारे एक वैज्ञानिक अभियान में भाग लिया था तथा घाटी को लोकप्रिय बनाने में सहायता की। फलस्वरूप 1908 ई में राष्ट्रीय स्मारक तथा 1919 ई में राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना हुई। 1873 ई में मोरन द्वारा बनाई गयी ग्रैंड कैन्यन की एक पेंटिंग अमेरिकी कांग्रेस की दीवार पर लटकी हुई है।

तुसयान खंडहर-

तुसयान खंडहरों में छिपा है ग्रांड कैन्यन का लम्बा मानव इतिहास। इन खंडहरों और समीपस्थ संग्रहालय में 800 साल पहले प्युबलो इंडियंस की जीवनशैली, सभ्यता, संस्कृति का चित्रण देखने को मिलता है। यह डेज़र्ट व्यू टावर से 5 कि. मी पश्चिम में स्थित है। यहाँ से पार्क के वन अधिकारियों के साथ खंडहर और संग्रहालय का भ्रमण करने की सुविधा उपलब्ध है।

डेज़र्ट व्यू वाच टावर-

प्रसिद्ध वास्तुकार मैरी काल्टर ने इसको प्रागैतिहासिक अमेरिकी टावर के मूल डिजाइन केअनुरूप निर्मित करवाया था। 1932 ई में निर्मित चार मंज़िला 21 मीटर ऊंचा टावर दक्षिणी रिम का सर्वोच्च शिखिर है। टावर की निचली मंज़िल पर स्मृति चिन्हों की दुकान और कैफ़े है। ऊपरी मंज़िलों से कोलेरेडो नदी की सुंदर दृश्यावली दिखाई देती है। टावर की भीतरी दीवारों को कलाकार फ्रेड काबोती ने सुंदर भित्तिचित्रों से सजाया है। 28 मई, 1987 से टावर यू.एस राष्ट्रीय ऐतिहासिक स्थलों की सूची में सम्मिलित है।

उत्तरी रिम-

ग्रैंड कैन्यन के उत्तरी रिम की यात्रा कठिन एवं दुरूह है । पूर्ण रूप से स्वस्थ एवं अभ्यस्त पर्यटक ही इस यात्रा का आनन्द ले पाते हैं। उत्तरी किनारे की वादियों में बसे छिटपुट आदिवासियों के रोचक एवं मनोरंजक किस्से सुन कर मन खुश हो जाता है। यहाँ का सर्वाधिक लोकप्रिय प्वायंट ‘ब्राइट एंजल प्वायंट’ है। इसकी लोकप्रियता का कारण है समीपस्थ ग्रैंड कैन्यन लॉज काटेज़ और उत्तरी रिम विजिटर सेंटर है।

देवदार वृक्षों के सघन जंगलों में बनी प्राकृतिक पगडंडियों पर चलते हुए यहाँ के मुग्धकारी दृश्य को आत्मसात किया जा सकता है। किनारे के किसी समतल स्थान से नीचे झाँकने पर मिस्र के पिरामिड, एज़टेक मंदिर सदृश अनेक भव्य गुंबद व आकृतियाँ दिखाई देती हैं

फ़ैन्टम रेंच-

कोलेरेडो नदी के उत्तर में दो नदियों के संगम पर फैन्टम क्रीक और ब्राइट एंजल क्रीक के समीप एक छोटा सा गाँव फैन्टम रेंच स्थित है। ग्रैंड कैन्यन के कारण इस की लोकप्रियता में भी निरंतर वृद्धि हो रही है। अमेरिका के राष्ट्रीय उद्यानों में फैन्टम रेंच सर्वाधिक लोकप्रिय स्थान है। इसके कमरों को प्रायः एक साल पहले बुक कर लिया जाता है।

फैन्टम रेंच में काटेज़,पुरुषों ,महिलाओं के लिए दो डोरमीटरी, एक रेस्तरां, एक आपातकालीन कक्ष, एक रेंजर स्टेशन,एक कैम्प ग्राउंड तथा कोलेरेडो नदी में राफ्टिंग पर्यटन में भाग लेने वालों के लिए एक समुद्र तट है । मकान स्थानीय पत्थरों तथा लकड़ी से निर्मित हैं। उद्यानों के बीच खेत तक पगडंडियों पर पैदल चल कर अथवा खच्चरों पर बैठ कर पंहुचा जा सकता है।

सभ्यता-संस्कृति से परिचय-

ग्रैंड कैन्यन नेशनल पार्क में अनेक म्यूज़ियम व विजिटर सेंटर हैं । इनमें आडियो,वीडियो, चित्रों, पोस्टरों के माध्यम से ग्रैंड कैन्यन की उत्पत्ति, विकास, इतिहास, एवं भूगर्भीय विशेषताओं को अतीव सुंदर व रोचक ढंग से प्रस्तुत किया जाता है। यहाँ की ‘श्राइन ऑफ एजिस’ में पिछले पैंतीस साल से अगस्त-सितंबर के बीच संगीत समारोह आयोजित किया जाता है। इसमें विश्व प्रसिद्ध संगीतकार भाग लेते हैं।

मानसिक तथा शारीरिक रूप से स्वस्थ पर्यटक यहाँ पर पैदल यात्रा का आनंद ले सकते हैं। टेढ़े-मेढ़े, ऊबड़-खाबड़ रास्तों और गर्मी के कारण यात्रा में कठिनाई अवश्य होती है। कठिन होने पर भी पैदल चलते हुए नीचे की मुग्धकारी दृश्यावली देखने का अपना अलग आनंद और रोमांच है।

यात्रा से लौटते समय ग्रैंड कैन्यन के दक्षिणी रिम पर स्थित वरकैम्प स्टोर अवश्य जाएँ। 1906 ई में वरकैम्प ने पर्यटकों के लिए यह स्टोर खोला था। आज भी यह स्टोर पर्यटकों की सेवा कर रहा है। यहाँ पर आदिवासियों द्वारा तैयार क्या गया हस्तशिल्प का सामान

और स्मृति चिन्ह मिलते हैं।

विशेष-कैसे जाएँ?

एरिज़ोना की राजधानी फोएनिक्स सम्पूर्ण विश्व के साथ हवाई मार्ग से जुड़ी है। फोएनिक्स के अंतर्राष्ट्रीय एयर पोर्ट पर उतरने के बाद राष्ट्रीय विमान सेवा अथवा कार/ टैक्सी से ग्रैंड कैन्यन पंहुच सकते हैं। राष्ट्रीय उद्यान की यात्रा सुविधाजनक बनाने के लिए अपनी कार/टैक्सी कारपार्क में छोड़ दें तथा निःशुल्क बस सेवा का उपयोग करें। पार्क के प्रवेश द्वार पर निःशुल्क समाचार पत्र गाइड लें। इसमें सभी कार पार्कों का नक्शा रहता है।

कब जाएँ?

मई से सितंबर के मध्य पर्यटकों की भीड़ रहती है। आराम से घूमने-फिरने के लिए संभव हो तो यह समय न चुनें।

क्या ले जाएँ?

बढ़िया मजबूत जूते,हैट, धूप का चश्मा,दूरबीन, फ्लैशलाइट तथा मौसम के अनुरूप कपड़े ले जाएँ।

ग्रैंड कैन्यन की यात्रा की योजना बनाने से पहले ठहरने, भोजन व अन्य जानकारी के लिए पार्क की वेब साइट पर संपर्क कर सकते हैं।

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प्रमीला गुप्ता

विश्व के सात अजूबों में से एक- भव्य कोलोसियम-

विश्व विख्यात रोमन साम्राज्य रोम! विकसित सभ्यता और समृद्ध संस्कृति का स्वामी रोम! रोम यूरोप के भव्य देश इटली की राजधानी है। यहीं रोम के केंद्र में विद्यमान है विशाल ‘कोलोसियम’। मूल लेटिन नाम ‘एम्फीथियेटर फ्लावियम’ है। अंग्रेज़ी में इसको ‘फ्लावियम एम्फीथियेटर’ कहते हैं। यह विश्व के नए सात अजूबों में से एक है। 1980 ई में यूनेस्को ने इसको विश्व विरासत के रूप में मान्यता प्रदान कर दी थी। फ्लावियन वंश के संस्थापक वेस्पेसियन के नाम पर ही इसका नाम ‘फ्लावियम एम्फीथियेटर’ रखा गया। विश्व में यह एम्फीथियेटर ‘कोलोसियम’ के नाम से प्रसिद्ध है।

इस स्थान पर पूर्ववर्ती रोमन सम्राट नीरो ने अपने ऐश-ओ-आराम, शान-शौकत का प्रदर्शन करने के लिए कृत्रिम झील, उसके चारों तरफ बाग,पैवेलियन और पोर्टिको बनवा रखे थे। यहीं पर उसने अपनी एक विशाल कांस्य प्रतिमा का निर्माण करवाया। संभवतः उस विशाल (Collosal)प्रतिमा के कारण ही इस विशाल संरचना का नाम ‘कोलोसियम’ पड़ गया था। उस ऐश्वर्य और सुख-समृद्धि का उपभोग केवल नीरो ही कर सकता था।

निर्माण-

वेस्पेसियन नीरो अधिकृत इस साम्राज्य के ऐश्वर्य का उपभोग जनसामान्य के साथ मिल कर करना चाहता था। उसने इस वैभवसंपन्न राजप्रासाद तथा कृत्रिम झील को तुड़वा कर एक विशाल नए एम्फीथियेटर का निर्माण आरंभ करवाया। उसने केवल नीरो की कांस्य प्रतिमा को यथा स्थान रहने दिया । रोम की जनता के मनोरंजन को ध्यान में रख कर उसने इसका निर्माण नगर के केंद्र में करवाया तथा निर्माण पूरा होने पर जनता के लिए खोल दिया गया। ‘कोलोसियम’ रोम की सांस्कृतिक पहचान बन गया। यह रोमन स्थापत्य कला तथा इंजीनियरिंग का उत्कृष्ट नमूना है।

सन 70-72 में तत्कालीन रोमन सम्राट वेस्पेसियन ने इसका निर्माण कार्य आरंभ करवाया था। दुर्भाग्यवश यह उनके जीवन काल में पूरा नहीं हो पाया। तीसरी मंज़िल तक ही बना था कि सन 79 में उनकी मृत्यु हो गयी। उनके बेटे टाइटस ने निर्माण कार्य जारी रखा और निर्माण पूरा करवाया। बाद में वेस्पेसियन के छोटे बेटे ने इसमें अनेक परिवर्तन करवाए।

नवनिर्मित कोलोसियम के एक अभिलेख पर लिखा है-” युद्ध में जनरल के रूप में प्राप्त धन-सम्पदा से सम्राट वेस्पेसियन ने इस एम्फीथियेटर का निर्माण करवाया था।” सन 70 में वेस्पेसियन ने महान यहूदी क्रान्ति पर विजय प्राप्ति की थी। रोम परम्परा के अनुरूप विजय प्राप्ति के उपलक्ष्य में इस विशाल स्मारक का निर्माण करवाया गया था।

सन 80 में सम्राट टाइटस ने ‘कोलोसियम’ का उदघाटन किया था। उदघाटन समारोह के अवसर पर आयोजित खेलों में 9,000 जंगली जानवर मारे गए थे।उदघाटन के उपलक्ष्य में स्मारक सिक्का भी जारी किया गया था।

वेस्पेसियन के छोटे बेटे डोमिशियन ने ‘कोलोसियम’ में अनेक संशोधन करवाए। अधिक लोगों के बैठने के लिए सबसे ऊपरी मंज़िल के ऊपर एक गैलेरी बनवाई।

एक भूमिगत सुरंग का निर्माण भी करवाया। ग्लेडिएटर्स ( योद्धाओं) के लिए प्रशिक्षण केंद्र और आयुधाभंडार भी बनवाए। एम्फीथियेटर में लोगों के मनोरंजन के लिए ग्लेडिएटरों यानि योद्धाओं और जानवरों की लड़ाइयाँ लड़वाई जाती थी। समय-समय पर पौराणिक कथाओं पर आधारित नाटकों का मंचन भी किया जाता था।

संरचना-

‘फ्लावियम एम्फीथियेटर’ ( कोलोसियम) के निर्माण से पहले थियेटर का निर्माण सामान्यतः पर्वतों के समीप किया जाता था लेकिन कोलोसियम पूर्ण रूप से स्वतंत्र तथा समतल भूमि पर निर्मित है। छह एकड़ भूमि पर विस्तीर्ण 189 मीटर लम्बा और 156 मीटर चौड़ा है। बाहरी दीवार 48 मीटर ऊंची है। आखाडा( लड़ाई का मैदान) अंडाकार है। यह 287 फुट लम्बा और 18 फुट चौड़ा है। इसके चारों तरफ 15 फुट ऊंची दीवार है। उसके ऊपर दर्शकों के कतारबद्ध बैठने की व्यवस्था है।

बाहरी दीवार के निर्माण में लगभग एक लाख क्यूबिक मीटर पत्थर इस्तेमाल किए गए थे। ये बिना किसी मसाले के लोहे के 300 टन शिकंजों के साथ जोड़े गए थे। भूकंप में बाहरी दीवार टूट चुकी है। उत्तर दिशा की बाहरी दीवार अभी भी संरक्षित है। कोलोसियम के बाहर से दिखने वाले अवशेष मूलतः भीतरी दीवार के हैं।

पुरातत्त्वशेषों में तीन मंज़िलों के ऊपर निर्मित मेहराबदार गलियारों के ऊपर चबूतरे पर एटिक है। यह रस्सियों से बनी जालीदार कनवेस से ढकी है। यह अखाड़े का दो तिहाई भाग है। बीच में ढलुआं है। यहाँ से दर्शकों के पास हवा आती है।

एम्फीथियेटर में 80 प्रवेश द्वार हैं। इनमें से 76 प्रवेश द्वार जन सामान्य के लिए थे। नीचे के प्रवेश द्वार पर लेटिन भाषा में L11 लिखा है-

उत्तरी द्वार से केवल सम्राट व मंत्रीगण ही भीतर जा सकते थे। शेष तीन द्वार गणमान्य व संभ्रांत जनों के लिए आरक्षित थे। इन चारों द्वारों पर सुंदर नक्काशी की हुई थी। अब केवल इन के अवशेष ही देखे जा सकते हैं।

दर्शकों के लिए मनोरंजन कार्यक्रम निःशुल्क थे लेकिन उनको प्रवेश टिकट दिया जाता था। इससे लोगों को अपनी निर्धारित सीट पर बैठने में आसानी होती थी। मिट्टी से बने टिकट पर सीट का नंबर और लाइन लिखी होती थी।

कोलोसियम में 50,000 दर्शकों के बैठने की व्यवस्था थी। उस समय इतनी बड़ी व्यवस्था का निर्माण व सुचारुरूप से संचालन एक आश्चर्यजनक बात है। सीट का निर्धारण समूह और रुतबे के अनुसार किया जाता था। डोमिशियन ने इमारत के सबसे ऊपर एक गैलेरी का निर्माण करवाया था। यहाँ पर निर्धन, गुलाम तथा औरतें खड़े हो कर अथवा लकड़ी की नीची बेंचों पर बैठ कर खेल का आनंद ले सकती थी। कब्र खोदने वालों और पूर्व ग्लेडिएटर्स को अन्दर जाने की मनाही थी।

हाइपोजियम-

कोलोसियम रणभूमि ( अखाड़े ) के नीचे हाइपोजियम है। यहाँ जाने के लिए लकड़ी का रास्ता बना हुआ है। यह 83 मीटर लम्बा और 14 मीटर चौड़ा है। फर्श लकड़ी और रेत से बना है। अखाड़ा भूमिगत ‘हाइपोजियम’ के ऊपर निर्मित है। अखाड़े (रणभूमि) का फर्श तो नष्ट हो चुका है लेकिन ‘हाइपोजियम’ दिखाई देता है। हाइपोजियम में दो स्तरों पर भूमिगत सुरंगों का जाल बिछा हुआ था। यहाँ पर खूंखार जानवरों को रखने के लिए पिंजरे भी रखे हुए थे। ऊपर अखाड़े में जाने से पहले ग्लेडिएटरस और जानवरों को यहीं पर इकट्ठा किया जाता था। ऊपर अखाड़े में जाने के लिए अलग रास्ते बने हुए थे।

हाइपोजियम कोलोसियम से बाहर कई स्थानों के साथ सुरंगों से जुड़ा हुआ था। जानवरों और ग्लेडिएटर्स को सुरंगों से हाइपोजियम में लाया जाता था। कोलोसियम के पूर्व में निर्मित ‘लुड्र्स मैग्नस’ ग्लेडिएटर्स की बैरेक्स हाइपोजियम के साथ जुड़ी हुई थी। सम्राट तथा संभ्रांत महिलाओं के भीतर जाने के लिए अलग रास्ता बना हुआ था।

हाइपोजियम के भीतर भारी उपकरण रखने का भी प्रावधान था। यहाँ पर अफ्रीका से बड़े जंगली जानवर लाए जाते थे। अखाड़े में उनकी लड़ाइयाँ होती थीं। इन जानवरों में दरयाई घोडा, गैंडा, हाथी, मगरमच्छ, जिराफ, शेर, बाघ,चीते, शुतुरमुर्ग प्रमुख थे। ये लड़ाइयाँ विशाल स्तर पर होती थीं। किंवदंती के अनुसार 107 ई में डेसिया में अकेले टार्जन ने 123 दिनों के अन्दर 11,000 जानवरों और 10,000 ग्लेडिएटर्स को पराजित कर दिया था। टार्जन आज भी बच्चों का पसंददीदा हीरो है। उस पर न जाने कितनी फिल्मे बन चुकी हैं, कहानियाँ लिखी गयी, कार्टून बने? ऐसी ही एक फिल्म से टार्जन का यह चित्र लिया गया है-

विध्वंस तथा पुनर्निर्माण-

सन 217 के भीषण अग्निकांड में एम्फीथियेटर की बाहरी सतह पर निर्मित काष्ठ संरचनाएँ जल कर राख़ हो गयी थीं। बहुत सालों तक उनकी मरम्मत नहीं हुई। सन 250-252 में उनका जीर्णोद्धार करवाया गया। 443 ई में भूकम्प ने दोबारा उसको तहस-नहस कर डाला। 435 ई में यहाँ पर ग्लेडिएटरों की आखिरी लड़ाई हुई थी। 523 ई तक यहाँ पर जानवरों की लड़ाइयाँ होती रही।

धीरे-धीरे इन हिंसक खेलों में जनसामान्य की रुचि समाप्त होने लगी थी। लोगों का मनोरंजन करने में लाखों निर्दोष इन्सान और जानवर अपनी जान गंवा चुके थे। इतिहासकारों के अनुसार इन खूनी खेलों में पाँच लाख जानवरों और दस लाख इन्सानों ने अपनी जान गंवा दी थी। वास्तव में उस समय दूसरे देशों से गुलामों को ला कर ग्लेडिएटर के रूप में प्रशिक्षित किया जाता था। प्रशिक्षण के बाद लोगों के मनोरंजन के लिए अखाड़े में दूसरे योद्धाओं और जानवरों से लड़वाया जाता था। जीतने वाले योद्धा को इनाम और हारने वाले को मौत मिलती थी। खूंखार जानवरों के साथ निहत्थे लड़वाया जाता था। इन खूनी लड़ाइयों को देखते-देखते लोग ऊब गए थे।

छठी शताब्दी में कोलोसियम में एक चर्च की स्थापना की गयी। उसके बाद कुछ भाग आवासीय स्थल तथा रंगारंग कार्यक्रमों के लिए इस्तेमाल होने लगे। 12वीं शताब्दी के आसपास राजाओं ने इसे किले के रूप में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। 1349 ई में आए भीषण भूकंप में बाहरी दक्षिणी भाग पूरी तरह से टूट गया। खंडित भाग के पत्थरों से रोम के महल, चर्च और हस्पतालों का निर्माण करवाया गया।

जीर्णोद्धार-

1832 ई में थॉमस कोल ने कोलोसम की भीतरी दीवारों और आस पास सलीब के निशान और जंगली पौधे देखे-

19वीं शताब्दी में उनको वहाँ से हटा दिया गया। 1807,1827 ई में कोलोसियम के बाहरी हिस्से की मरम्मत की गयी। 1827, 1831, 1930 ई में भीतरी भाग का जीर्णोद्धार किया गया। समय और प्रदूषण से होने वाली टूट-फूट को 1993 तथा 2000 ई में ठीक किया गया।

सहायक भवन-

कोलोसियम के कारण उसके आसपास कई प्रकार के उद्योग स्थापित हो गए थे। एम्फीथियेटर के लिए सहायक भवनों का निर्माण हो गया था। पूर्व में ‘लुड्र्स मैग्नस’ नामक ग्लेडिएटर्स प्रशिक्षण केंद्र के पुरातत्त्वशेष आज भी विद्यमान है। यह कोलोसियम के साथ भूमिगत सुरंग से जुड़ा हुआ था। इसके अतिरिक्त भी अन्य कई प्रशिक्षण केंद्र हैं। अस्त्र-शस्त्र रखने के लिए आयुधागार था। उपकरण रखने, ज़ख्मी ग्लेडिएटर्स के उपचार के लिए तथा मृतकों को दफनाने के लिए अलग-अलग स्थान थे।

अंतर्राष्ट्रीय मृत्युदंड विरोधी प्रतीक-

पिछले कई सालों से कोलोसियम मृत्युदंड विरोधी अंतर्राष्ट्रीय अभियान का प्रतीक बन गया है। 1984 ई में मृत्युदंड समाप्त कर दिया गया था। 2,000 ई में कोलोसियम के सामने अनेक मृत्युदंड विरोधी प्रदर्शन हुए और पूरे विश्व में मृत्यु दंड के विरुद्ध विरोध किया गया। अब यदि किसी देश में मृत्युदंड समाप्ति का कानून पारित होता है तो रोम प्रशासन कोलोसियम में सफ़ेद के स्थान पर सुनहरी रोशनी करता है। सुनहरी रोशनी में जगमगाता कोलोसियम-

रंगारंग कार्यक्रम-

खंडहर के रूप में परिवर्तित हो जाने के कारण कोलोसियम के भीतर विशाल कार्यक्रमों का आयोजन संभव नहीं। भीतर कुछ सौ व्यक्ति ही बैठ सकते हैं। इस पर भी अनेक रंगारंग कार्यक्रमों की पृष्ठभूमि में कोलोसियम रहता है। 435 ई में ग्लेडिएटर्स और 435 ई में जानवरों की लड़ाइयाँ बंद हो गयी थी।

अब यहाँ पर रोमन कैथोलिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। पोप ने कोलोसियम को एक पवित्र स्थान घोषित कर दिया था। हर साल ‘गुड फ्राइडे’ के दिन एम्फीथियेटर तक एक शोभायात्रा निकाली जाती है। इसकी अगुवाई स्वयं पोप करते हैं। उनके हाथ में ‘वे ऑफ दी क्रास’ नाम की मशाल रहती है।

कोलोसियम आज रोम में पर्यटकों के लिए विशिष्ट आकर्षण का केंद्र है। प्रतिवर्ष लाखों पर्यटक यहाँ पर आते हैं। स्थापत्य कला और इंजिनियरिंग के इस अद्वितीय कौशल को देख कर अचंभित रह जाते हैं। इटली के विनाशकारी भूकंपों में ध्वस्त हो जाने के बाद भी आज भी यह प्राचीन रोम की गौरवगाथा के प्रतीक के रूप में जीवंत साक्षी बन कर खड़ा है। अब कोलोसियम की बाहरी दीवार की ऊपरी मंज़िल पर ‘ईरोस’ को समर्पित एक संग्रहालय है। इटली की मुद्रा यूरो के सिक्कों पर भी कोलोसियम का चित्र अंकित है।

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प्रमीला गुप्ता

इत्सुकुशिमा शिंतो समाधि

जापान के हिरोशिमा क्षेत्र,हत्सुकायची में स्थित मियाजिमा द्वीप, जिसे इत्सुकुशिमा द्वीप भी कहते है, में विश्व प्रसिद्ध इत्सुकुशिमा शिंतो समाधि स्थित है । यह सेतो अंतःस्थलीय सागर पर तैरती हुई दिखाई देती है तथा सागर में द्वीप पर तैरने वाली विश्व की एकमात्र समाधि है।मियाजिमा द्वीप पुरातन काल से ही शिंतो मतावलम्बियों की आस्था का केंद्र रहा है। संभवतः यहाँ पर प्रथम शिंतो भवनों का निर्माण छठी शताब्दी में हुआ होगा। वर्तमान संरचनाओं -भव्य तोरी गेट, सागर में स्तंभों पर टिके भवन, पाँच मंज़िला पेगोडा, का निर्माण काल 12वीं शताब्दी है। एक-दूसरे से जुड़े भवनों का कलात्मक सौंदर्य तथा तकनीकी कौशल दर्शनीय है। विभिन्न रंगों से सुशोभित पर्वतों तथा सागर के मध्य स्थित ये भवन अद्वितीय मनोहारी हैं। ये प्रकृति तथा पुरुष का अनुपम संगम स्थल हैं। 1996 ई में यूनेस्को की विश्व विरासत समिति ने इस क्षेत्र को विश्व विरासत की सांस्कृतिक धरोहर के रूप में मान्यता प्रदान कर दी थी।

तोरी गेट-

मियाजिमा द्वीप पर स्थित इत्सुकुशिमा समाधि का जल पर तैरता हुआ भव्य सिंदूरी ‘तोरी’ गेट विशिष्ट आकर्षण का केंद्र है –

यहाँ तक पंहुचने के लिए नौका लेनी पड़ती है। सागर की लहरों पर तैरती नौका पर खड़े हो कर चारों ओर की मनमोहक दृश्यावली देखने पर तन-मन में असीम ऊर्जा का संचरण हो जाता है। तट से तोरी गेट तक पंहुचने में पाँच मिनट लगते हैं। सिंदूरी रंग का यह गेट समाधि के पवित्र क्षेत्र का प्रवेश द्वार है। यह सदियों पुराने कपूर की लकड़ी से बना है। इसका निर्माण 1168 ई में हुआ था। वर्तमान गेट का निर्माण 1875 ई में हुआ था। यह 16 मीटर ऊंचा है तथा इसका वज़न 60 टन है। पानी का बहाव तेज़ होने पर यह जल पर तैरता हुआ दिखाई देता है। कम बहाव होने पर पैदल भी पंहुचा जा सकता है। उस समय लोग तट पर सीपियाँ इकट्ठी करते दिखाई देते हैं। यहाँ से समाधि का चित्ताकर्षक दृश्य दिखाई देता है-

इतिहास-

जापान के हिरोशिमा क्षेत्र में हत्सुयाकची नगर में स्थित यह समाधि ‘अकी’ प्रांत की प्रमुख समाधि है। प्रारम्भ में इसका निर्माण स्थानीय मछुआरों ने सामान्य शिंतो समाधि के रूप में करवाया था।811 ई में यहाँ पर ‘सएकी कुरमोटो’ ने बड़ी संरचना का निर्माण हुआ। आरंभ में यह समाधि शिंतो के ‘तूफान देवता’ की तीन पुत्रियों को समर्पित थी। कमकुरा काल (1185-1333) में जापान के सात सौभाग्य सूचक देवताओं में से एक ‘बेनटेन’ की भी आराधना होने लगी। ‘बेनटेन’ प्रेम, तर्क, ज्ञान, साहित्य, संगीत और सुख-समृद्धि प्रदान करने वाली हिन्दू-बौद्ध मूल की देवी है।उस समय इत्सुकुशिमा में व्यापार व सागर के यात्रियों की संरक्षक देवी के रूप में आराधना होती थी। सभी देवताओं की पूजा-अर्चना एक ही स्थान पर होने के कारण इस क्षेत्र को ‘इत्सुकुशिमा’ की संज्ञा दे दी गयी। इत्सुकुशिमा का अर्थ है-‘देवताओं को समर्पित द्वीप’।

समाधि परिसर में जल के ऊपर स्तंभों पर निर्मित 56 काष्ठ संरचनाएँ हैं। अनेक संरचनाएँ गलियारों तथा पगडंडियों से जुड़ी हैं।

1168 ई में महान शक्तिशाली योद्धा तायरा-नो-कियोमोरी ने इस भव्य समाधि का निर्माण करवाया था। वह युद्धक्षेत्र में विजयप्राप्ति तथा सुख समृद्धि का कारण मियाजिमा में विद्यमान जल देवियों की कृपा दृष्टि मानता था। समाधि सुसानो-ओ-नो-मिकातो की पुत्रियों, सागर,तूफान तथा सूर्यदेवी के भाई अमातरेसू की तीन देवियों को समर्पित है। तायरा-नो-कियोमोरी ने 431.2 हेक्टेयर भूमि पर समाधि निर्मित करवायी। दो परिसरों में 17 भवन तथा तीन अन्य संरचनाएँ स्थित हैं। इनके अतिरिक्त अन्य छोटे-छोटे भवन, मिसेन पर्वत के इर्द-गिर्द आदिकालीन वन तथा विचित्र आकार की चट्टानें हैं। कियोमोरी ने समाधि निर्माण पर अपार धनराशि खर्च की। वह अपने मित्रों,सहयोगियों तथा राजकीय अतिथियों को यह स्थान दिखाने में गौरवान्वित अनुभव करता था। उसने समाधि का निर्माण खाड़ी पर पुलनुमा संरचनाओं के रूप में करवाया ताकि यह पवित्र द्वीप से जल पर तैरती दिखाई दे-

यह आध्यात्मिक शक्ति तथा प्राकृतिक सौंदर्य का अद्भुत समन्वय है। जापान की तीन उत्कृष्ट दृश्यावलियों में से एक है। कालांतर में अन्य महाद्वीपीय धर्मों के प्रभाव तथा अपनी निजी परम्पराओं के साथ जापानी जनजीवन का अविभाज्य अंग बन गया।

स्थापत्य शैली-

इत्सुकुशिमा समाधि जापान की पारंपरिक शिंतो स्थापत्य शैली में निर्मित है। इस में उपासना का केंद्र प्रकृति के उपादान पर्वत, नदी, चट्टानें, वृक्ष पशु विशेष रूप से सूर्य , चंद्रमा होते हैं। इनमें दैवी शक्तियाँ निहित रहती हैं। समाधि के भवन भव्य आवासीय शिंतो स्थापत्य शैली का अद्वितीय उदाहरण हैं। इनमें मानव निर्मित तथा प्राकृतिक तत्त्वों का अपूर्व सम्मिश्रण देखने को मिलता है।

समाधि बौद्ध तथा शिंतो की मिश्रित स्थापत्य शैलियों में निर्मित है। तोरी गेट के सामने तथा पृष्ठभूमि में पवित्र मिसेन पर्वत के मध्य निर्मित सागर की मनमोहक दृश्यावली को दर्शाते अनेक लम्बे लकड़ी के गलियारों से जुड़े विशाल भवन प्रमुख रूप से शिंदेन -जुकुरी शैली; हिआन कालीन (794-1185) इम्पीरियल स्थापत्य शैली में निर्मित हैं। यद्यपि इन के लाल स्तंभों पर- शिंतो स्थापत्य शैली का प्रभाव देखने को मिलता है तथापि ग्लेजड टाइल्स के स्थान पर साइप्रस की छाल से बनी छतें इम्पीरियल स्थापत्य शैली की द्योतक हैं।

परिसर में चिकित्साशास्त्र के आचार्य बुद्ध याकुशी को समर्पित पाँच मंज़िला बौद्ध पेगोडा है। इसका निर्माण 1407 ई में हुआ था।

परिसर का विशालतम भवन सेंजोककू असेंबली हाल है। प्रतिष्ठित राजनयिक और जनरल तोयोतोमी हिदेयोशी (1587-1598) ने 16वीं शताब्दी में इसका निर्माण करवाया था। जापानी शब्द ‘सेंजोककु’ का अर्थ है- मैट अर्थात 18 वर्ग फुट। इसकी विशिष्टता यह है की हाल लगभग 857 मैट पर निर्मित है। यह बौद्ध भिक्षुओं के प्रार्थना करने के लिए बनवाया गया था। वर्तमान में इस का उपयोग इसके संस्थापक की समाधि के रूप में होता है।

खूबसूरत रंगों से दमकते अंतहीन गलियारे देख कर पर्यटक मंत्रमुग्ध रह जाते हैं। स्तंभों पर स्थित गलियारों से सागर का अनूठा दृश्य,खारे पानी की सौंधी-सौंधी महक से आभास हो जाता है कि समाधि वास्तव में जल पर स्थित है। प्रत्येक स्तम्भ के आगे और पीछे एक अतिरिक्त पाया है। यह रयोबो शिंतो शैली का प्रतीक है। अप्रत्यक्ष रूप से यहाँ शिंतो स्थापत्य शैली पर मध्यकालीन जापानी स्थापत्य शैली का प्रभाव भी परिलक्षित होता है।

नोह रंगमंच-

प्रमुख समाधि के सामने ‘नोह’ रंगमंच है। इसका निर्माण काल 1590 ई के आसपास है। विशिष्ट अवसरों पर जापान के पारम्परिक नृत्य ‘नोह’ की प्रस्तुति होती है। यह वर्ष में नौ बार प्रस्तुत किया जाता है। इसके अतिरिक्त अन्य रंगारंग कार्यक्रम भी आयोजित होते रहते हैं। प्रमुख हैं-जल पर शानदार आतिशबाज़ी का प्रदर्शन तथा वाद्ययंत्रों पर संगीत की प्रस्तुति-‘कंगेन उत्सव’।

कोषागार-

कोषागार में संरक्षित हैं प्रसिद्ध हेयके नोक्यो अर्थात तायरा के धर्मसूत्रों के 32 हस्तलिखित अभिलेख। इनमें कमल सूत्र तथा अन्य सूत्रों को कियोमोरी, उसके पुत्रों तथा अन्य परिजनों ने लिपिबद्ध किया था। प्रत्येक व्यक्ति ने केवल एक अभिलेख लिखा था।

इस पवित्र शिंतो समाधि को प्रदूषण मुक्त रखना अनिवार्य है। 1876 ई से इसके समीप जन्म-मृत्यु का निषेध है। आज भी गर्भवती महिलाएं प्रसव के समय अन्यत्र चली जाती हैं। गंभीर रूप से बीमार तथा वृद्ध जन जिनकी मृत्यु निकट है, दूर चले जाते हैं। द्वीप पर मृत का अंतिम संस्कार करना वर्जित है।

मियाजामा द्वीप-

मियाजामा का पूरा द्वीप समाधि के अंतर्गत आता है। इस द्वीप पर ईश्वर का आवास माना जाता है। जनसामान्य की इसमें अटूट आस्था है। जापान के पौराणिक आख्यानों के अनुसार यहाँ पर जल से सम्बद्ध अनेक देवियों का वास है। सागर पर स्थित समाधि की दृश्यावली मुग्ध कारी है। हो भी क्यों न? अनेक दैवी शक्तियों का वासस्थल जो है।

सूर्यास्त के बाद काले सागर पर अगणित बिजलियों के प्रकाश में आलोकित समाधि को देख कर पर्यटक भाव विभोर हो जाते हैं। यहाँ पर आने का सर्वोत्तम समय पतझड़ ऋतु है। उस समय पूरा द्वीप शरत कालीन सौन्दर्य से सजा रहता है। यहाँ आने पर जापान की गूढ रहस्यात्मकता और सौन्दर्य की अनुभूति होती है।

पाँच सितम्बर, 2004 को भयंकर सोंगडा तूफान में समाधि को भारी क्षति पंहुची थी। चलने के लिए बने पुल, छतें, आंशिक रूप से क्षति ग्रस्त हो गए थे। उस समय मरम्मत करने के लिए समाधि को अस्थायी रूप से बंद कर दिया गया था।

हिरोशिमा शांति म्यूज़ियम-

चुकोगु जिले का प्रमुख नगर है हिरोशिमा। द्वितीय विश्व महायुद्ध में वहाँ पर अणु बमों की वर्षा हुई थी। असंख्य लोग काल कवलित हो गए थे। यहाँ पर स्थित म्यूज़ियम में उस विध्वंसक घटना की स्मृतियाँ संग्रहीत है।

मियाजामा द्वीप जाने के लिए हिरोशिमा से ‘मियाजीमगुची’ के लिए ट्रेन लेनी पड़ती है। यह समीपस्थ रेलवे स्टेशन है। ट्रेन 25 मिनट में वहाँ पंहुचा देती है। मियाजीमगुची से मियाजिमा के तोरी गेट तक जाने के लिए नाव लेनी पड़ती है। नाव पाँच मिनट में ‘तोरी’ गेट तक पंहुचा देती है। सम्पूर्ण विश्व के पर्यटक इस समाधि को देखने के लिए आते हैं।

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प्रमीला गुप्ता

बुद्ध की जन्मस्थली -लुम्बिनी-

भारत के बिहार राज्य की उत्तरी सीमा के निकट वर्तमान नेपाल में भगवान बुद्ध की जन्मस्थली ‘लुम्बिनी’ स्थित है। नेपाल में कपिलवस्तु के रुपेनधेनी ज़िले में है ‘लुम्बिनी’। भगवान बुद्ध की जीवनयात्रा यहीं से आरंभ होती है। यहाँ पर बौद्ध धर्म के सभी सम्प्रदायों ने अपनी-अपनी विचारधारा के अनुरूप मंदिर, गुम्पा,विहार स्थापित कर रखे हैं। हूणों के आक्रमणों के बाद यह स्थान गुमनामी के अंधेरे में खो गया था। 1866 ई में इस स्थान की खोज की गयी और इसका जीर्णोद्धार किया गया। 1997 ई में यूनेस्को ने इसको ऐतिहासिक महत्त्व की विश्व धरोहर घोषित कर दिया।

लुम्बिनी में बुद्ध की अपेक्षा उनकी माता मायादेवी की अधिक मान्यता है। बुद्ध की माता व पिता के निवासगृहों के बीच एक पवित्र उद्यान ‘लुम्बिनी’ है। ससुराल से मायके जाते समय माया देवी ने उनको यहीं पर जन्म दिया था। लुम्बिनी में मायादेवी अर्थात महामाया का चिरस्थायी मंदिर है। इसको ‘प्रदिमोक्ष’ वन भी कहा जाता है। अनेक सदियों से यह स्थान जनसामान्य की दृष्टि से ओझल था। 1896 ई में डॉ. फ्यूहरर ने अशोक स्तम्भ की खोज की थी। 1990 ई के प्रारम्भ में उत्खनन में प्राप्त शिलालेखों से इस बात की पुष्टि हो गयी कि भगवान बुद्ध का जन्म इसी स्थान पर हुआ था। चीनी यात्री फ़ाहयान और हुआन त्सांग ने भी इसका वर्णन किया है। कुछ समय से पुरातत्त्वविद यहाँ पर उत्खनन कर पुरातत्त्वशेषों का संरक्षण कर रहे हैं। वर्तमान में माया देवी मंदिर के इर्द-गिर्द चारदीवारी है। इसके भीतर प्राचीन मंदिर के अवशेष संरक्षित हैं।

बुद्ध जन्म का दृश्य-

मान्यता के अनुसार मायादेवी ने लुम्बिनी के एक तालाब के किनारे अपने ऊपर के पेड़ की एक शाखा को हाथ में लिए खड़ी अवस्था में ही बुद्ध को जन्म दिया था। तीनों लोकों के देव-ब्रह्मा, विष्णु,महेश स्वयं बुद्ध को अपने हाथों में लेने के लिए वहाँ पधारे थे। किंवदंती के अनुसार जन्म के तुरंत बाद सिद्धार्थ सात कदम चले थे। उनके चरणों ने जहां धरती का स्पर्श किया वहाँ कमल के पुष्प खिल उठे। इस घटना को बुद्ध के जीवन की पहली चामत्कारिक घटना माना जाता है। बुद्ध जन्म के इस दृश्य का चित्रांकन अनेक बौद्ध स्थलों में देखने को मिलता है। इस दृश्य में मायादेवी के साथ बुद्ध की दाई प्रजापति गौतमी का चित्र भी है।

बाल बुद्ध-

जन्म प्रतिमा कक्ष –

4.8 कि.मी लम्बे तथा 1.6 कि.मी चौड़े लुम्बिनी क्षेत्र में अनेक स्मारक हैं। वर्तमान मंदिर सफ़ेद पत्थरों से निर्मित है। मंदिर के भीतर प्राचीन मंदिर व स्तूप अवस्थित हैं। यहीं एक तरफ बड़ी-बड़ी ईंटों को चौरस आकार में रखा हुआ है। इस सभामंडप जैसे स्थान की एक दीवार पर एक प्रतिमा उत्कीर्ण है। प्रतिमा की आकृति धूमिल पड़ गयी है।यह अन्य स्थानों पर उत्कीर्ण माया देवी की प्रतिमा के सदृश दिखाई देती है। इस कक्ष में केवल बुद्ध के जन्म को दर्शाती प्रतिमाएँ हैं। संभवतः पुरातत्त्वविदों ने इसीलिए इस कक्ष को ‘जन्म प्रतिमा कक्ष’नाम दिया है।

सीमा शिला-

‘जन्म प्रतिमा कक्ष’ के कुछ फुट नीचे एक शिला पत्थर रखा हुआ है। अनियमित आकार की इस शिला पर मानव पैर का हल्का निशान है। मान्यता है कि यह निशान बाल सिद्धार्थ के पाँव का निशान है। इस को सुदृढ़ काँच के केस में संरक्षित रखा हुआ है। इसके पास अगणित सिक्के राके हुए हैं। इन को श्रद्धालु भक्ति भाव से यहाँ पर भेंट स्वरूप रख जाते हैं। इस शिला को देखने के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है।

अशोक स्तम्भ-

माया देवी मंदिर के पीछे अशोक स्तम्भ स्थित है। इस पर पाली भाषा में लिखा हुआ है कि सम्राट अशोक स्वयं भगवान बुद्ध के जन्म स्थान के दर्शन करने के लिए लुम्बिनी आए थे और इस स्तम्भ को स्थापित करवाया था। स्तम्भ पर लिखा है-‘ हिता बुद्धे जाते शाक्यमुनिती’ अर्थात शाक्य मुनि बुद्ध का जन्म इसी स्थान पर हुआ था।

पुष्करिणी (पवित्र तालाब)-

यह पवित्र तालाब माया देवी मंदिर के साथ ही स्थित है। सिद्धार्थ के जन्म के बाद माया देवी ने इस तालाब में स्नान किया था। बौद्ध धर्मावलम्बी इस स्थान को अत्यधिक पवित्र मानते हैं। वर्तमान तालाब नवनिर्मित है। इस तालाब के पास एक बोधि वृक्ष है। समीप ही बुद्ध को समर्पित एक छोटा सा मंदिर है। यहाँ कुछ बोधिवृक्षों के नीचे लकड़ी के गोलाकार पटरे रखे हैं। इन पर भक्त जन ध्यान,साधना करते हैं। यही नहीं इन वृक्षों पर कतार में रंग-बिरंगे झंडे फहरा रहे हैं।

स्तूप

मंदिर के आसपास अनेक स्तूप हैं। अधिकांश स्तूपों के अवशेष बचे हैं । कुछ स्तूप वर्गाकार आधारशिला पर निर्मित हैं तो कुछ गोलाकार आधारशिला पर। 16 स्तूपों के आधार को ‘मन्नत स्तूप’ कहते हैं। मन्नत पूरी होने के बाद श्रद्धालुओं ने इन का निर्माण करवाया था।

संग्रहालय-

अब तक जो स्थान खंडहर प्रतीत होता था, पुनर्निर्माण के बाद भक्तगणों के मंत्रोच्चारण से जीवंत हो उठा है। लुम्बिनी विकास न्यास ने एक महत्त्वाकांक्षी योजना के अंतर्गत इसको विश्वस्तरीय पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने का निर्णय लिया है। इस दृष्टिकोण से इस क्षेत्र को नहर के माध्यम से दो भागों में बांटा गया है। नहर के एक ओर लाल रंग की ईंटों से आधुनिक स्थापत्य शैली में निर्मित संरचना लुम्बिनी संग्रहालय है। यहाँ आस्ट्रेलिया मंदिर में माया देवी की चित्ताकर्षक प्रतिमा है। चीनी मंदिर में हुआन त्सांग की भव्य प्रतिमा स्थित है। जर्मन मंदिर में अप्रतिम, मनोरम भित्ति चित्र उत्कीर्ण हैं। नेपाल मंदिर में बुद्ध की विशाल प्रतिमा मुग्धकारी है। संग्रहालय का भवन चित्ताकर्षक है लेकिन भीतर मौलिक कलाकृतियों के स्थान पर उनकी प्रतिकृतियाँ रखी हुई हैं। विशिष्ट बौद्ध स्थलों के छाया चित्र भी देखे जा सकते हैं।

लुम्बिनी उद्यान-

यह शांत मनोरम स्थल है। यहाँ पर सुंदर पक्षी और रंग-बिरंगी तितलियाँ देख कर तन-मन में नूतन ऊर्जा का संचरण हो जाता है। सर्दी के मौसम में यहाँ की झीलों में सारस इत्यादि अनेक प्रवासी पक्षी डेरा डाले रखते हैं। लुम्बिनी घने जंगलों के बीच एक विशाल उद्यान है।

परम ज्योति, लुम्बिनी उद्यान-

केंद्र में बह रही नहर में नौका में सैर करते समय नहर के दक्षिण छोर पर 1986 ई से प्रज्वलित परम ज्योति दिखाई देती है। यह विश्व में शांति, सौहार्द के संदेश का प्रतीक है।

विश्व शांति मंदिर-

विश्व शांति मंदिर के नाम से प्रसिद्ध शांति का प्रतीक जापान का शांति पेगोडा पर्यटकों के विशिष्ट आकर्षण का केंद्र है। । प्रमुख परिसर के बाहर स्थित पारम्परिक पेगोडा शैली में निर्मित भव्य संरचना है। जापान के बौद्ध श्रद्धालु ने इसके निर्माण पर एक मिलियन डालर खर्च किए थे। सफ़ेद रंग की इस संरचना में भगवान बुद्ध की स्वर्णिम प्रतिमा स्थित है। भव्य संरचना के केंद्र में गुंबद है। वहाँ तक पंहुचने के लिए सीढ़ियाँ हैं। दूसरी मंज़िल पर गुंबद के इर्द-गिर्द परिपथ है। विश्व शांति के प्रतीक इस शांत, सौम्य स्थल पर जाने पर पर्यटकों को अहिंसा तथा एकात्मकता की अनुभूति होती है।

अन्य दर्शनीय मंदिर व विहार-

नहर के माध्यम से दो भागों में बंटे इस क्षेत्र के एक ओर माया देवी का मंदिर है तो दूसरी ओर सफ़ेद रंग का विशाल विश्व शांति पेगोडा स्थित है। नहर के पश्चिम में कोरिया, चीन, जर्मनी, कनाडा, आस्ट्रिया, वियतनाम, लद्दाख, नेपाल के महायान सम्प्रदाय के मंदिर हैं।पूर्व में थेरवाद सम्प्रदाय के म्यांमार, कम्बोडिया के मंदिर हैं। दोनों ओर के मंदिरों में पृथक-पृथक ध्यान केंद्र हैं।पूरे क्षेत्र का भ्रमण करने के लिए काफी पैदल चलना पड़ता है।

कोरिया का भव्य विहार-

कोरिया की विशिष्ट स्थापत्य शैली में निर्मित यह विहार ‘दाए-शुंग-शाक्य-सा’ के नाम से प्रसिद्ध है। इसकी छत पर सुंदर, चित्ताकर्षक चित्र उत्कीर्ण हैं। श्रद्धालुओं व अन्य तीर्थयात्रियों के लिए यहाँ पर कुछ दिन रहने व खाने-पीने की व्यवस्था है। कुछ दिन रहने पर यात्रियों को जीवन में उपलब्ध नित्यप्रति की सुविधाओं से विरक्त बौद्ध भिक्षुओं का आत्मसंयम से परिपूर्ण शांत जीवन देखने को मिलता है।उसको देखने पर सुखद आत्मानुभूति होती है।

म्यांमार का स्वर्णिम मंदिर-

मंदिर परिसर में म्यांमार स्वर्णिम मंदिर प्राचीनतम संरचनाओं में से एक है।बागान मंदिरों की शैली के अनुरूप इसका नुकीला शिखर सर्वाधिक चित्ताकर्षक है। भीतर तीन प्रार्थना सभागार हैं। मंदिर के प्रांगण में दक्षिण बर्मा की शैली में निर्मित विशाल स्वर्णमंडित ‘लोकमनी पुला पेगोडा’ है।

कंबोडियन विहार-

कम्बोडिया के प्रख्यात मंदिर ‘अंगकोर वत’ मंदिर की स्थापत्य शैली के अनुरूप ही यह विहार निर्मित है। यह संरचना बहुत मुग्धकारी और ऊर्जा से परिपूर्ण है। प्रमुख आकर्षण है बाहर की चौकोर रेलिंग पर बने 50 मीटर हरे रंग के साँप। बाहर दीवारों पर मनमोहक, सूक्षम चित्र उत्कीर्ण हैं।

विशेष-

लुम्बिनी के विशाल क्षेत्र में केवल धार्मिक स्थलों के निर्माण की ही अनुमति है। दुकानें,होटल, रेस्टौरेंट स्थापित करने की अनुमति नहीं है।

काठमाण्डू से सड़क मार्ग से लुम्बिनी पंहुचने में पाँच घंटे लगते हैं और भैरहवा से तीस मिनट का रास्ता है। भैरहवा में समीपस्थ एयरपोर्ट गौतम बुद्ध एयरपोर्ट है।

लुम्बिनी नेपाल की तराई में पूर्वोत्तर रेलवे की गोरखपुर-नौतनवाँ लाइन के नौतनवाँ स्टेशन से बीस मील और गोरखपुर-गोंडा लाइन के नौगढ़ स्टेशन से दस मील दूर है। नौगढ़ से वहाँ तक जाने के लिए पक्की सड़क है। जाने के लिए वाहन सुविधापूर्वक मिल जाते हैं।

लुम्बिनी जाने के लिए अक्तूबर-दिसम्बर और अप्रैल-मई का समय सर्वोत्तम है।

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प्रमीला गुप्ता

कीव का भव्य सेंट सोफिया कैथेड्रल व पेचेर्स्क मठ परिसर-

पोलिश तथा रूसी चिरकाल तक यूक्रेन के सीमावर्ती प्रदेश पर आधिपत्य करने के लिए संघर्ष करते रहे। यहाँ की भूमि समतल व उपजाऊ है। पश्चिम में कार्पेथियन पर्वत और दक्षिण में क्रिमियीन प्रायद्वीप है। सदियों तक यह क्षेत्र आवागमन व व्यापार मार्ग के रूप में शाही आकांक्षाओं की आपूर्ति करता रहा। इसका प्रमाण 300 साल पुरानी राजसत्ता से पहले मिलता है। यूक्रेन के हेप्स्बर्ग साम्राज्य के सीमावर्ती नगर, पोलिश किले, तातार महल और काले सागर पर निर्मित पुरातन ग्रीक व जेनोआ की चौकियाँ इस बात की गवाह हैं।

वर्तमान में यूक्रेन अपने पुरातन समृद्ध इतिहास को खंगाल रहा है। इसका सर्वोत्कृष्ट उदाहरण यूक्रेन की राजधानी कीव है। रूसी कीव के वैभवशाली काल ,जब केवल कोंस्टेन्टिपोल का ही बोलबाला था, के बाद 1240 ई में तातारों और बातूखान ने कीव को पूरी तरह से तहस-नहस कर डाला था। उस समय की जनसंख्या तक पंहुचने में कीव को छह सदियाँ लग गयी। इस अवधि में कीव नगर लिथुनियनस,पोलिश तथा रूसी लोगों के साथ संघर्ष करता रहा। बहुत कठिनाई से 20वीं सदी में विश्वयुद्ध की दो विभीषिकाओं से अपने अस्तित्व को बचा पाया। कालचक्र पूरा होने के बाद अब कीव दोबारा भव्य यूरोपीय राजधानी के रूप में अपने आप को स्थापित करने के लिए सतत प्रयत्नशील है।

इतिहास-

कीव का प्रारम्भिक परिदृश्य दो महान सम्राटों–व्लादमीर दी ग्रेट और उसके पुत्र यरोस्ल्व दी वाइज़ के इर्द-गिर्द घूमता है। उनके नाम की दो गलियों के संगमस्थल से ऊपरी नगर की यात्रा आरंभ होती है। यह कीव ओपेरा और बैले थियेटर से एक चौराहे की दूरी पर नगर का पुराना प्रवेशद्वार ‘गोल्डन गेट’ है।

इस प्रवेशद्वार का निर्माण 11वीं सदी में ऊपरी नगर की किलेबंदी के रूप में यरोस्लव ने करवाया था। शिखर पर निर्मित ‘चर्च ऑफ दी अनंसिएशन’ की स्वर्णिम गुंबद के अनुरूप गेट का नाम भी ‘स्वर्णिम गेट’ रखा गया। 1240 ई में तातारों ने चर्च और गेट दोनों को पूरी तरह से नष्ट कर दिया। 1982 ई में मूल प्रारूप के आधार पर इन का नवनिर्माण किया गया। भीतर स्थित म्यूज़ियम में कीव के पुरातन तथा वर्तमान रूप का मिश्रण देखा जा सकता है।

गोल्डन गेट से वुलित्स्या व्लादिमिरिसका गली के उत्तर में यरोस्लव नगर है। रास्ते में KGB की अनुकृति SBU बिल्डिंग आती है। उससे थोड़ा आगे है ‘सेंट सोफिया कैथेड्रल’। बायीं तरफ कैथेड्रल की सुनहरी तथा हरी मीनारें दिखाई देती हैं। यह यरोस्लव का अद्वितीय, चित्ताकर्षक स्मारक है।

इसका निर्माण पेचेंग कबीले पर विजयप्राप्ति के उपलक्ष्य में करवाया गया था। बेजेंटाइन स्थापत्य शैली में निर्मित कैथेड्रल का प्रारूप और डिजाइन के साथ-साथ नाम भी कांस्टेनटीपोल स्थित हेगीया सोफिया पर आधारित है। यह तत्कालीन रस कीव की प्रभुसंपन्नता व वैभव का प्रतीक है। इसमें बसी है प्रारम्भिक रस कीव की आध्यात्मिक चेतना। यही नहीं यह पूर्वी स्लाव सभ्यता का अमूल्य कोष है। सेंट सोफिया कैथेड्रल, उससे सम्बद्ध संरचनाएँ तथा कीव पेचेर्स्क मठ परिसर- कीव की दो मध्यकालीन उत्कृष्ट संरचनाएँ तथा प्रारम्भिक सांस्कृतिक स्मारक हैं।

सेंट सोफिया कैथेड्रल व अन्य संरचनाएँ-

कीव के ऐतिहासिक केंद्र में स्थित सेंट सोफिया कैथेड्रल 11वीं सदी की आरंभिक कलात्मक स्थापत्यशैली का प्रतिनिधित्व कर रहे भव्य स्मारकों में से एक है। यूक्रेन की राजधानी कीव के प्रमुख ईसाई चर्च के रूप में इसका निर्माण राजकुमार यरोस्लव दी वाइज़ ने स्थानीय निर्माताओं तथा बेजेंटाइन वास्तुशिल्पियों के सहयोग से करवाया था। कैथेड्रल के भीतर राजकुमारों का राज्याभिषेक होता था। यहीं पर वे विदेशी अतिथियों का स्वागत करते तथा संधि प्रस्तावों पर हस्ताक्षर करते थे। कैथेड्रल के भीतर इतिहास लेखन की व्यवस्था थी तथा यरोस्लव द्वारा स्थापित लायब्रेरी है।

सेंट सोफिया कैथेड्रल गिने-चुने क्रूसाकार कैथेड्रलों में से एक है। केंद्र का मुख्य बिन्दु क्रास है। यह गुंबद पर स्थित है। प्रमुख केंद्रीय भाग क्रूसाकार भुजा के बेलनाकार चार मेहराबदार स्तंभों पर अवस्थित है। इस प्रकार की संरचनाओं का बेजेंटाइन शैली में निर्माण 11वीं सदी के अंत में हुआ था। पूर्व-पश्चिम दिशा में कैथेड्रल की लंबाई 41.7 मीटर तथा चौड़ाई उत्तर-दक्षिण में 54.6 मीटर है। कुल 2310 वर्ग मीटर क्षेत्र में फैला है।

सेंट सोफिया के 13 गुंबदों में बनी खिड़कियों से भीतर प्रकाश जाने की व्यवस्था है। बेजेंटाइन चर्चों के इतिहास में इतने गुंबदों का निर्माण उल्लेखनीय है। कैथेड्रल की रूपरेखा पिरामिड के आकार की है।

18वीं सदी के आरंभ में कैथेड्रल का नवनिर्माण किया गया था। बाह्य गैलेरी की संरचनाओं में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन कर उन पर नए भव्य गुंबद निर्मित किए गए।

आंतरिक भाग-

कैथेड्रल का आंतरिक भाग भव्य नक्काशी और भित्तिचित्रों से अलंकृत है। कैथेड्रल के भीतर 271 वर्ग मीटर भाग की नक्काशी आज भी संरक्षित है जबकि मूल नक्काशीदार भाग 640 वर्ग मीटर में फैला है। इसी प्रकार 3,000 वर्ग मीटर में उत्कीर्ण भित्तिचित्र संरक्षित हैं जबकि आरंभ में वे 6,000 वर्ग मीटर में फैले थे।

कैथेड्रल के केंद्र में क्राइस्ट -प्रेटोक्रेटर की चित्ताकर्षक प्रतिमा है, उनके साथ चार दिव्य देवदूतों की प्रतिमाएँ हैं।

कैथेड्रल के आंतरिक भाग, अन्य भित्तिचित्रों तथा नक्काशी में ‘ओरण्टा’ (प्रार्थना में लीन वर्जिन) का भव्य चित्रण है। प्रतिमा छह फुट ऊंची है। ऊंचे चबूतरे पर स्थित बहुमूल्य रत्नों से अलंकृत प्रतिमा ने अपने दोनों हाथ ऊपर कर रखे हैं। नीले रंग का परिधान,सोने में लिपटा जामुनी रंग का शाल और लाल बूट पहन रखे हैं।कैथेड्रल में उत्कीर्ण चित्रों के मध्य ‘ओरण्टा’ का चित्र विशिष्ट भव्यता के साथ स्मारिका के रूप में खूबसूरत रंगों में चित्रित है।

सेंट सोफिया कैथेड्रल से बाहर आने का मार्ग 18वीं सदी में निर्मित बेल टावर से है। बायीं तरफ कुलपति व्लादमीर की समाधि तथा नव निर्मित स्क्वेयर के समीप है बेल टावर।

स्क्वेयर के मध्य 1888 ई में निर्मित अश्वारोही बोगदान ख्मोलिंसिकी की प्रतिमा स्थित है।

अपने पोते महान व्लादमीर के सिंहासनारूढ़ होने से 33 साल पहले राजकुमारी ओल्हा ने गुप्त रूप से ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया था। 77 वर्ष बाद सफ़ेद संगमरमर से बनी राजकुमारी ओल्हा की प्रतिमा 1996 ई में स्क्वेयर में स्थापित की गयी। उसके साथ सेंट काइरिल,मेथोडियस तथा एंड्रयू की प्रतिमाएँ हैं।

ये प्रतिमाएँ नवनिर्मित बेल टावर और सेंट माइकेल कैथेड्रल की नूतन स्वर्णिम गुंबंदों के साथ स्थित हैं। 1937 ई में निर्मित इस स्क्वेयर में अब यूक्रेन का विदेश मंत्रालय स्थित ई।

मंत्रालय के बायीं तरफ व्लादमीर शहर है। व्लादमीर ‘महान’ ने सर्वप्रथम 10वीं शताब्दी में ईसाई धर्म को राजकीय धर्म घोषित किया था तथा ‘टिथे चर्च’ की स्थापना की थी। आय का दसवां भाग चर्च के निर्माण के लिए अनुदान स्वरूप देने के कारण चर्च का नाम ‘टिथे’ पड़ गया। यह रस कीव का पत्थरों से निर्मित पहला चर्च था। टिथे चर्च की स्थापना 989 ई में हुई थी। यहीं पर व्लादमीर की समाधि है।

एंड्रयू पहाड़ी पर निर्मित हमनाम सेंट एंड्रयू चर्च का भव्य डिजाइन इटली के प्रख्यात वास्तुकार रस्ट्रेली ने तैयार किया था। 18वीं सदी में सेंट पिटसबर्ग का डिजाइन भी उसी ने तैयार किया था।

यहाँ पर कीव की खूबसूरत , लोकप्रिय गलियाँ हैं। यह कलाकारों का प्रिय स्थान है तथा कैफ़े , स्मृतिचिन्ह खरीदने के लिए सर्वोत्तम स्थान है।

पेचेर्स्क मठ परिसर-

कीव नगर के केंद्र से लगभग 3 कि.मी दूर पेचेर्स्क मठ परिसर है। यहाँ पर 1051ई में स्थापित चर्च, गुफाएँ तथा संग्रहालय है। इस मनोरम स्थल का भ्रमण करने के लिए पूरा दिन भी कम है। यहाँ पर यूरोपीय स्क्वेयर से रास्ता जाता है। रास्ते में यूक्रेन की सुप्रीम काउंसिल का भवन है। उसके पीछे बराक शैली में निर्मित मेरिन्स्की राजप्रासाद है। ज़ार एलेक्ज़ेंडर द्वितीय और साम्राज्ञी मारिया के स्वागत के लिए 1868 ई में इसको नया रंग-रूप प्रदान किया गया था।

अरसेनलना मेट्रो स्टेशन के समीप है ‘जनवरी क्रान्ति स्ट्रीट’। यह स्ट्रीट मठ परिसर तक जाती है। मठ परिसर इनिपरो नदी तक फैला है। जंगलों से ढकी ढलानों पर ऊंचा सिर किए गुंबदों तथा मीनारों का समूह कीव की सर्वोत्कृष्ट, अविस्मरणीय दृश्यावली है। भूमि के नीचे मार्गों, चर्चों तथा गुफाओं के कारण इस स्थान का नाम पेचेर्स्क पड़ गया। 13वीं शताब्दी में तातारों के आक्रमण में मठ लगभग नष्ट हो गया था। फिर भी मध्यकाल में यह ओर्थोडोक्स ईसाई समुदाय का महत्त्वपूर्ण तीर्थस्थल के रूप में पर्यटन केंद्र रहा। 18वीं शताब्दी में यूक्रेनियन बराक शैली में इसका नवनिर्माण किया गया।

मठ के ऊपरी भाग का प्रमुख प्रवेशद्वार भव्य अलंकृत ‘ट्रिनिटी चर्च से हो कर जाता है।

भीतर कैथेड्रल ऑफ एजंप्शन का 96 मीटर ऊंचा बेल टावर है। यहाँ से बायीं तरफ इनिपरो नदी के तट की मनमोहक दृश्यावली दिखाई देती है।दायीं तरफ ‘माँ मातृभूमि’ की विशाल स्मारिका है। द्वितीय विश्व युद्ध में कीव स्थित यूक्रेन म्यूज़ियम ऑफ हिस्ट्री में प्रदर्शित यह 62 मीटर ऊंची स्टील की विशाल प्रतिमा है। वज़न 560 टन है। माँ मातृभूमि प्रतिमा के दायें हाथ में तलवार तथा बायें हाथ में ढाल जिस पर सोवियत यूनियन का प्रतीक चिन्ह अंकित है।

स्मारक के संबंध में विवादास्पद विचार हैं लेकिन यह निर्विवाद तथ्य है कि एलिवेटर से ऊपर जाने के बाद दीखने वाली दृश्यावली अविस्मरणीय है। बेल टावर के साथ कैथेड्रल का भी नव निर्माण किया गया है।

सेंट निकोलास चर्च-

सेंट निकोलास चर्च कीव का दूसरा रोमन कैथोलिक चर्च है। इस समय इस भवन में रोमन कैथोलिक चर्च के अतिरिक्त ‘नेशनल हाउस ऑफ ऑर्गन एंड चैंबर म्यूज़िक’ भी विद्यमान है। कैथेड्रल का भ्रमण करते समय वहाँ पर संगीत प्रस्तुति मन को आनंदित कर देती है।

कीव नगर के केंद्र में स्थित पेजेज़्हन स्ट्रीट पैदल भ्रमण करने के लिए सर्वोत्तम स्थान है। आधुनिक शान-ओ-शौकत, शानदार प्लेग्राउंड , नयी आकृतियों में बिछी बेंचें, समकालीन सुन्दर प्रतिमाएँ स्ट्रीट को मनोहारी रूप प्रदान कर रही हैं। स्थानीय लोगों के साथ-साथ पर्यटकों के लिए भी विशिष्ट आकर्षण का केंद्र हैं। भ्रमण करते समय परिदेश जैसी अलौकिक अनुभूति होती है।

विशेष-

प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर विश्व धरोहर कीव नगर का भ्रमण स्वयं में सुखद, रोमांचक अनुभूति है। प्रमुख यूरोपीयन हवाई उड़ानें -आस्ट्रियन,के.एल.एम, ब्रिटिश एयरवेज, लुफ्तहंसा नियमित रूप से कीव जाती हैं। अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट एयर यूक्रेन सभी यूरोपीय नगरों से जुड़ा है। इसलिए कीव पूरे विश्व के साथ सम्बद्ध है। कीव में बजट के अनुरूप खान-पान एवं आवास की सुविधा है। सर्दियों में जाते समय पर्याप्त गर्म कपड़े ले जाने अत्यावश्यक हैं।

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प्रमीला गुप्ता।

दंबूला के गुफा मंदिर (श्री लंका)

श्री लंका की राजधानी कोलम्बो से 150 कि.मी दूर स्थित दंबूला के गुफा मंदिर ‘दंबूला के स्वर्ण मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हैं।यह श्रीलंका का सर्वाधिक विस्तृत एवं संरक्षित गुफा मंदिर परिसर है। यह समीपवर्ती समतल क्षेत्र से 160 मीटर ऊंची चट्टान पर अवस्थित है। चट्टान के आसपास लगभग 90 गुफाएँ हैं। प्रमुख आकर्षण का केंद्र पाँच गुफाएँ हैं। ये अपनी स्थापत्यशैली तथा भित्तिचित्रों के कारण विश्वविख्यात हैं। इनमें निर्मित प्रतिमाएँ एवं भित्तिचित्र भगवान बुद्ध के जीवन से सम्बद्ध हैं। इन गुफाओं में भगवान बुद्ध की 153 प्रतिमाएँ, श्री लंका के तीन सम्राटों तथा चार अन्य देवी-देवताओं, जिन में विष्णु व गणेश की प्रतिमाएँ भी सम्मिलित हैं, स्थित हैं। गुफाओं के विभिन्न भागों में लगभग 2100 वर्ग मीटर में दानव ‘मरा’ की माया तथा भगवान बुद्ध के प्रथम उपदेश को आकर्षक रूप में उत्कीर्ण किया गया गया है।

दंबूला का भव्य स्वर्ण मंदिर-

इतिहास एवं निर्माण-

श्रीलंका में बौद्धधर्म के प्रवेश से पहले प्रागैतिहासिक काल में इन गुफाओं में श्री लंका के मूलवासियों के रहने के प्रमाण उपलब्ध हैं। दंबूला गुफा परिसर के समीप के ईबंकटुवा क्षेत्र में प्राप्त 2700 साल पुराने नरकंकाल इस के साक्षी हैं।

यह गुफा मंदिर परिसर ई.पू पहली शताब्दी में अस्तित्व में आया था। इस मंदिर परिसर के सर्वाधिक चित्ताकर्षक गुफाएँ झुकी हुई चट्टानों के भीतर अवस्थित हैं। इनमें असंख्य भव्य नक्काशीदार भित्तिचित्र उत्कीर्ण हैं। इनके अतिरिक्त 1938 ई में स्थापित मेहराबदार स्तंभों तथा भव्य प्रवेशद्वार ने इनके सौंदर्य में अत्यधिक वृद्धि कर दी है। गुफाओं के आंतरिक भाग, विशेषरूप से छतों पर, में धार्मिक चित्र उत्कीर्ण हैं। इनमें भगवान बुद्ध, बोधिसत्वों के साथ-साथ अन्य देवी-देवताओं का चित्रांकन भी है। भगवान बुद्ध को विशेष रूप से प्रतिष्ठित करने के कारण ये गुफाएँ बौद्ध विहार कहलाती हैं।

पाँच गुफाएँ-

मंदिर में विभिन्न आकार की पाँच भव्य गुफाएँ हैं। अनुराधापुर व पोलोनरुवा साम्राज्य के अंतर्गत निर्मित ये गुफाएँ श्री लंका में स्थित अनेक गुफा मंदिरों में सर्वाधिक भव्य तथा चित्ताकर्षक हैं। ये 150 मीटर ऊंची चट्टान पर स्थित है। यहाँ जाने के लिए दंबूला चट्टान के ढलुआं रास्ते से हो कर गुजरना पड़ता है। चारों तरफ की मनमोहक दृश्यावली, 19 कि.मी दूर स्थित सिगिरिया के किले का आकर्षक दृश्य देख कर पर्यटक मंत्रमुग्ध रह जाते हैं। साँझ के झुटपुटे में असंख्य पक्षी गुफा के प्रवेश द्वार पर आ बैठते हैं। सबसे बड़ी गुफा पूर्व से पश्चिम तक 52 मीटर लम्बी, प्रवेशद्वार से पीछे तक 23 मीटर चौड़ी और सर्वाधिक ऊंचाई 7 मीटर है। इनमें वालागम्बा, निशंक मला एवं भगवान बुद्ध के प्रिय शिष्य आनन्द का भी चित्रण है।

गुफा 1-दैवी सम्राट गुफा-

देवराज गुफा ‘दैवी सम्राट गुफा’ के नाम से प्रसिद्ध है पहली गुफा। प्रवेश द्वार पर लिखित पहली शताब्दी के ब्राह्मी अभिलेख में इसका निर्माण काल पहली शताब्दी है। इस गुफा में चट्टान काट कर भगवान बुद्ध की 14 मीटर लम्बी लेटी हुई प्रतिमा प्रतिष्ठित है। बुद्ध के चरणों में उनके प्रिय शिष्य आनन्द तथा सिर की ओर विष्णु की प्रतिमा है। माना जाता है कि इन की दैवी शक्तियों से ही इस गुफा निर्माण हुआ था। अनेक बार इस में रंग-रोगन हुआ। अंतिम बार संभवतः 20वीं सदी में पेंट हुआ था।

गुफा 2, महान सम्राटों की गुफा-

यह इस परिसर की सबसे बड़ी गुफा है। इस के भीतर भगवान बुद्ध की विभिन्न मुद्राओं में 56 प्रतिमाएँ हैं। इनके अतिरिक्त सम्राट तथा विष्णु की प्रतिमाएँ भी है। श्रद्धालु इन पर पुष्पमाल अर्पण करते हैं। ई.पू पहली शताब्दी में विहार को प्रतिष्ठित करने वाले सम्राट वत्तागामिनी अभय, 12वीं शताब्दी में 50 प्रतिमाओं को स्वर्णमंडित करवाने वाले सम्राट निशंक मला की प्रतिमाएँ भी स्थित हैं। इसी कारण से इस गुफा को ‘महान सम्राटों की गुफा’ अथवा ‘महाराजा गुफा’ कहा जाता है। चट्टान को काट कर बनाई गयी गुफा में भगवान बुद्ध की बायीं तरफ बोधिसत्व मैत्रेय तथा अवलोकितेश्वर की काष्ठ प्रतिमाएँ हैं। यहाँ पर एक झरना भी है जिससे पानी टपकता रहता है। कहा जाता है कि पानी में चिकित्सकीय गुण विद्यमान हैं। गुफा की छत पर 18वीं सदी में भगवान बुद्ध के जीवन से सम्बद्ध चित्र उत्कीर्ण हैं। कुछ चित्रों में देश के इतिहास की महत्त्वपूर्ण घटनाओं का भी चित्रण है।

गुफा 3,महा अलूत विहार अथवा महान बौद्ध विहार-

प्रख्यात बौद्ध पुनरुद्धारक सम्राट किर्ति राज सिंह के शासनकाल में पारम्परिक कैंडी शैली में छत तथा दीवारों पर चित्रांकन किया गया था। भगवान बुद्ध की 50 प्रतिमाओं के अतिरिक्त यहाँ पर सम्राट की प्रतिमा भी स्थित है। मंदिर के इन कक्षों में सिंहला मूर्ति कला तथा सिंहल कला के कई युगों का इतिहास निहित है। भगवान बुद्ध की प्रतिमाएँ विभिन्न आकार व मुद्राओं में निर्मित हैं। सबसे ऊंची प्रतिमा की ऊंचाई 15 मीटर है। एक गुफा की छत पर बुद्ध के 1500 चित्र उत्कीर्ण हैं।

गुफा 4,5 पश्चिम विहार एवं देविना अलूत विहार-

ये दोनों गुफाएँ पहली तीन गुफाओं की अपेक्षा छोटी हैं तथापि दोनों ही गुफाओं की स्थापत्य कला अद्वितीय हैं। दोनों की आंतरिक साज-सज्जा व भगवान बुद्ध की प्रतिमाएँ दर्शनीय हैं।

संरक्षण-

विशिष्ट स्थापत्यशैली एवं कला के कारण 1991 ई में इस ऐतिहासिक परिसर को यूनेस्को की विश्व विरासत समिति ने इसको विश्व विरासत के रूप में मान्यता प्रदान कर दी थी। विश्व विरासत घोषित किए जाने के बाद इसके संरक्षण व संवर्धन में तीव्रता से विकास हुआ। इस परिसर को अधिकाधिक वैज्ञानिक तरीके से संरक्षित और आकर्षक बनाए रखने के लिए सतत प्रयास किए जा रहे हैं। भित्तिचित्रों के संरक्षण पर अधिक बल दिया जा रहा है। 1960 के दशक में इन भित्तिचित्रों की साफ-सफाई करवायी गयी थी। 1930 के दशक में निर्मित संरचनाओं पर 1982 के बाद अधिक ध्यान केन्द्रित किया गया। इस परियोजना में श्री लंका की विभिन्न एजेंसियों के साथ यूनेस्को महत्त्वपूर्ण सहयोग प्रदान कर रहा है।

दंबूला गुफा मंदिर परिसर सदैव धार्मिक स्थल के रूप में सक्रिय रहा है। दर्शनीय हैं बौद्ध भिक्षुओं की चित्ताकर्षक प्रतिमाएँ-

यूनेस्को द्वारा निर्धारित विश्व विरासत के मानकों की आपूर्ति करने के विचार से विभिन्न संरक्षण परियोजनाओं के अंतर्गत इसके अवसंरचनात्मक विकास पर विशेष ध्यान केन्द्रित किया गया है। इस परिसर को आकर्षक बनाने के लिए विश्वस्तरीय प्रकाश की व्यवस्था की गयी वहीं पर्यटकों के लिए संग्रहालय तथा सुविधा केंद्र भी स्थापित किए गए।

यहाँ स्थित पुरातात्त्विक संरचनाओं को सुरक्षित रखने के विचार से वर्ष 2003 में यूनेस्को की निरीक्षण टीम ने परिसर के संरक्षित भाग की वृद्धि करने का प्रस्ताव रखा था। बाद की परियोजनाओं के अंतर्गत गुफाओं व अन्य स्थानों की साफ-सफाई की अपेक्षा इस परिसर को मानवीय एवं पर्यावरणीय क्षति से सुरक्षित रखने पर अधिक बल दिया गया। मंदिर तक पंहुचने के लिए 360 सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं-

मंदिर के प्रवेश द्वार के समीप पंहुचते ही पर्यटक वहाँ की मुग्धकारी दृश्यावली को देख कर सारी थकान भूल जाते हैं।

अन्य दर्शनीय स्थल-

विश्व विरासत स्वर्ण मंदिर के अतिरिक्त भी दंबूला में कई अन्य दर्शनीय स्थल हैं।

नाग केसर वन (Iron Wood Forest)

किंवदंती के अनुसार नागकेसर वन (Iron Wood Forest) में 10वीं सदी में सम्राट दपूला ने एक पूजा स्थल का निर्माण करवाया था। इसे ‘जथिका नमल उयना’ भी कहते हैं। श्री लंका के राष्ट्रीय वृक्ष ‘ना’ के इस घने वन में ट्रेकिंग का सुंदर मार्ग है। पर्यावरण के दृष्टिकोण से वन अतीव महत्त्वपूर्ण है। पर्यावरणविदों तथा प्रकृति के शोधार्थियों के लिए यह अध्ययन का विषय है।

गुलाबी पत्थरों का पहाड़ (Pink-Quartz Mountain)-

गुलाबी पत्थरों का पर्वत लगभग 500 मिलियन पुरानी पर्वत शृंखला है। यहाँ पर सफ़ेद गुलाबी तथा जामुनी रंग के पत्थरों का संग्रह है। दक्षिण एशिया की सर्वोच्च पर्वत शृंखला के शिखर पर पैदल चढ़ कर पर्यटक मीलों दूर की मुग्धकारी दृश्यावली का आनंद लेने के लिए आते हैं। गुलाबी पत्थरों का होने पर भी इस को उस रूप में पहचान पाना कठिन है।

रनगिरि दंबूला अंतर्राष्ट्रीय स्टेडियम-

दंबूला के समीप मध्य प्रांत में दंबूला मंदिर से अधिग्रहीत 60 एकड़ भूमि पर निर्मित है ‘रनगिरि दंबूला अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम’। इस में 16,800 दर्शकों के बैठने की व्यवस्था है। यहाँ से दंबूला टैंक और दंबूला चट्टान दिखाई देती है। स्टेडियम का निर्माण कार्य रिकार्ड 167 दिनों में पूरा हो गया था। मार्च,2000 में श्रीलंका व इंग्लैंड के बीच एक दिवसीय क्रिकेट मैच से इसका शुभारंभ हुआ था। 2003 ई में यहाँ पर फ़्लडलाइट्स लगाई गयी।

विशेष-

बंदरनायके अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा, कटुनयका पूरे विश्व के साथ जुड़ा हुआ है। यहाँ से दंबूला जाने के लिए सुविधापूर्वक बस अथवा टैक्सी मिल जाती है। दंबूला श्रीलंका के प्रमुख नगरों से सड़क मार्ग से जुड़ा है। यह श्रीलंका की राजधानी कोलम्बो के समीप है अतः कोलम्बो अथवा कैंडी से किराए पर कार ले कर जाना एक बेहतर विकल्प है।

मई-अगस्त, अक्तूबर-जनवरी की वर्षा ऋतु को छोड़ कर बाकी समय यहाँ की यात्रा सुखद है। दंबूला में विशाल, अत्याधुनिक मार्केट है। गलियों में बाइसिकलों, कृषि उपकरणों, घर में इस्तेमाल होने वाले बर्तनों व अन्य सामान का ढेर देखा जा सकता है।

वास्तव में दंबूला गुफाओं की सैर स्वयं में ‘एक पंथ दो काज’ है। प्रकृति के संसर्ग में कला, सौंदर्य की अनुभूति।

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प्रमीला गुप्ता

A Mother and The Three Sons

Beautiful and meaning ful story. Imyself 78 years old and understand the feelings of mother. congratulations.

Kamal's Blogging Café

-Kamal Shrestha, 25 July 2020; shyresk@gmail.com

There was a small family living in a countryside area— a mother and three sons. The mother was so much loving and caring to them. She grew them well and had given a good education. Once they had received their degree from the university, they left home in search of good job opportunities in the biggest city.

They found good careers for them as they had expected there in the biggest city. They were very honest and hardworking guys. They invested their full time in the business of a company. So they were able to expand the business of the company worldwide soon. They received numerous awards and prizes. Their life were full of happiness, excitement and prosperous one touching the height of success as sky-crapper buildings.

So many years after, they became rich and prestigious people in the world and thought to have…

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Author’s Note : Journey so Far

इतने कम समय में इतनी उपलब्धियां।!साहित्य के शीर्ष पुरुष बनो, हार्दिक शुभकामनाएँ।

The Thinking Pen

Here I am, feeling ecstatic, overwhelmed and nervous while writing this post. I started this blog because writing is my emotional outlet and I needed a place to vent my thoughts. I never thought that I will receive this kind of outreach or appreciation for my thoughts. Its been almost two months, I started this blog on the night of 12th may and I remember every single detail that I had planned about this.

17 posts, 8 award nominations, and countless reblogs later, I stand before you. Dear readers, this post is for you. A big thank you to the 500+ readers who became a part of my journey.

So, what makes this blog special for me. I love reading. I was completely new to the WordPress platform and it was here that I found a new perspective to explore. I have connected with people around the world, and…

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