पैलेस ऑफ वेस्टमिन्सटर,वेस्टमिन्सटर एबे, सेंट मारग्रेट चर्च,वेस्टमिन्सटर

‘पैलेस ऑफ वेस्टमिन्सटर’ समस्त विश्व में प्रजातन्त्र की जन्मभूमि कहा जाता है। इसको ‘हाउस ऑफ पार्लियामेंट’ भी कहते हैं। यह ‘हाउस ऑफ लॉर्ड्स’ तथा ‘ हाउस ऑफ कामन्स’, संसद के दो सदनों का सभास्थल है। वेस्टमिन्सटर लंदन नगर के मध्य थेम्स नदी के उत्तरी किनारे पर स्थित तथा ऐतिहासिक स्थल वेस्टमिन्सटर ऐबे के समीप है।

ब्रिटेन की महारानी के अनेक राजप्रासादों में से एक है। हेनरी अष्टम तक ब्रिटेन के सभी सम्राट इसमें रहते थे। हेनरी ने बाद में अपना आधिकारिक निवास ‘व्हाइट पैलेस,सेंट जेम्स पैलेस’ में स्थानांतरित कर लिया था। सम्राट के स्थानांतरण कर लेने के बाद यह पार्लियामेंट के रूप में प्रयुक्त होने लगा था। शुरू से ही यह राजप्रासाद लंदन की राजनीतिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र रहा। सरकार के वेस्टमिन्सटर तंत्र का नाम इसी पर पड़ा।

पार्लियामेंट की प्रमुख संरचनाएँ हैं-बिगबेन घड़ी वाली अल्बर्ट मीनार से लगा वेस्टमिन्सटर हाल; उसी के समीप हाउस ऑफ कामन्स; उसके बाद हाउस ऑफ लॉर्ड्स तथा दूसरे छोर पर विक्टोरिया टावर।

वेस्टमिन्सटर हाल-

इन संरचनाओं में वेस्टमिन्सटर हाल सबसे पुराना है। आठ सौ साल पुराने इस हाल की ‘हैमरबीम’ पद्धति से निर्मित बरेंडी का सौंदर्य देखते ही बनाता है। अठारहवीं शताब्दी में निर्मित पार्लियामेंट की मूल इमारत उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ में ही जीर्ण-शीर्ण हो गयी थी। कई वर्षों तक ऐसे ही पड़ी रही। पुनर्निर्माण पर कोई निर्णय नहीं लिया गया। अंततः प्रकृति ने ही इस समस्या का समाधान निकाल डाला। 1834ई की भीषण आग की लपटों में पार्लियामेंट जल कर राख़ हो गयी। बचा तो केवल वेस्टमिन्सटर हाल।

पुनर्निर्माण के अतिरिक्त कोई अन्य समाधान नहीं था। पुनर्निर्माण के लिए प्रस्तुत योजनाओं में से चार्ल्स बेरी की योजना स्वीकृत की गयी। चार्ल्स बेरी ने अभिलम्ब गोथिक स्थापत्यशैली में निर्माण करवाया। पुराने राजप्रासाद के स्थान पर भव्य विशाल संरचना निर्मित की गयी। इसमें 1100 कक्ष हैं जो विशाल आँगन की दो शृंखलाओं के इर्द-गिर्द निर्मित हैं। इस नयी संरचना का कुछ भाग 3.24 हेक्टेयर थेम्स पर स्थित है। इस भव्य संरचना को प्रख्यात गोथिक शिल्पी अगस्टस डब्ल्यू एन पूगीन ने सुसज्जित किया था।

दूसरे विश्वयुद्ध में जर्मनी ने इस इमारत को नष्ट करने के कई प्रयास किए। वास्तव में वे टावर ब्रिज और पार्लियामेंट को नष्ट करना चाहते थे। किसी सीमा तक वे अपने उद्देश्य में सफल भी हो गए। ब्रिज तो बच गया लेकिन पार्लियामेंट पूरी तरह से नष्ट हो गयी। आश्चर्य की बात है कि इस बार भी वेस्टमिन्सटर हाल पर इस विभीषिका का कोई प्रभाव नहीं पड़ा।

विश्वयुद्ध की समाप्ति पर स्पीकर ने एक बार फिर नयी इमारत का शिलान्यास रखा। शिलान्यास के लिए ग्यारहवीं से लेकर उन्नीसवीं सदी तक की इमारतों में इस्तेमाल किए गए लकड़ी के उपकरणों का इस्तेमाल किया गया था। वेस्टमिन्सटर हाल के समीप निर्धारित प्रारूप के अनुसार अत्याधुनिक भवनों का पुनर्निर्माण हो गया।

अविनाशी वेस्टमिन्सटर हाल ब्रिटेन के इतिहास की अनेक घटनाओं का मूक साक्षी है। प्राचीनतम इंग्लिश गिरजा, वेस्टमिन्सटर ऐबे का निर्माण करवाने वाले सम्राट ‘एडवर्ड दी कंफेसर’ की मृत्यु यहीं पर हुई थी। अनेक ऐतिहासिक महत्त्व के निर्णय यहीं पर लिए गए।

विक्टोरिया टावर-

वेस्टमिन्सटर में तीन प्रमुख टावर हैं। इनमें सबसे बड़ा और ऊंचा टावर ‘विक्टोरिया टावर’ है। इसकी ऊंचाई 98.5 मीटर है। यह पैलेस के दक्षिणी कोने में स्थित है। तत्कालीन सम्राट विलियम के सम्मान में इस टावर का डिज़ाइन चार्ल्स बेरी ने तैयार किया था। इसे पैलेस के शाही प्रवेशद्वार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है और यह पार्लियामेंट के पुस्तक संग्रहालय के लिए अग्निरोधक का काम करता है। टावर के तल पर सम्राट के लिए प्रवेशद्वार है। सम्राट इस द्वार से प्रवेश कर पार्लियामेंट का उदघाटन करता है। इसकी ऊंचाई 15.2 मीटर है। मेहराबदार मार्ग कलाकृतियों से सज्जित है। इनमें सेंट जॉर्ज, एंड्रयू, पैट्रिक के अतिरिक्त महारानी विक्टोरिया की प्रतिमा भी है। विक्टोरिया टावर के मुख्य भाग में संसदीय लेखागार के तीस लाख दस्तावेज़ संरक्षित हैं। सबसे ऊपर लोहे से बनी पिरामिडनुमा छत पर ध्वज फहराया जाता है। सम्राट की उपस्थिती में सम्राट का व्यक्तिगत ध्वज तथा झण्डा दिवस पर व संसद के सदन की सभा के समय संघीय ध्वज फहराया जाता है।

बिग बेन-

पैलेस के दक्षिणी कोने पर एक अन्य प्रसिद्ध टावर ‘क्लाक टावर’ है। ‘बिग बेन’ के नाम से प्रसिद्ध यह टावर लंदन की पहचान है। बी.बी.सी के श्रोताओं ने ‘बिग बेन’ की आवाज़ अवश्य सुनी होगी। पार्लियामेंट के अल्बर्ट टावर में 1859ई में इस विशाल घड़ी की स्थापना की गयी थी। तब से आज तक यह घड़ी सुचारु रूप से चल रही है। इसके पेंडुलम का वज़न भले ही दो सौ किलो हो लेकिन घड़ी के समय में एक या आधे सेकेंड का अंतर करना हो तो पैसे के आकार की पेनी को इस्तेमाल किया जाता है। बिजली आने से पहले इसमें चाबी भरने में पाँच घंटे का समय लगता था। वज़न के हिसाब से यह ब्रिटेन की तीसरी सबसे बड़ी घड़ी है। इस का वज़न है 13.8 टन। क्लाक टावर के ऊपर रखी लालटेन आयरन लाइट है। यह केवल तभी जलती है जब अंधेरा हो जाने के बाद भी किसी न किसी सदन की बैठक चलती रहती है। 1885 ई में यह महारानी विक्टोरिया के अनुरोध पर लगाई गयी थी ताकि वे बकिंघम पैलेस से भी देख सकें कि सभी सदस्य उपस्थित हैं या नहीं।

अष्टकोणीय मध्य टावर-

पैलेस के केंद्र में स्थित है सेंट स्टीफन टावर। इसको ‘सेंट्रल टावर’ भी कहते हैं। यह पैलेस के तीन प्रमुख टावरों में सबसे छोटा है। इसकी ऊंचाई 91 मीटर है। दूसरे टावरों के विपरीत इसमें मीनार भी निर्मित है। यह सेंट्रल लॉबी के ठीक ऊपर स्थित है तथा अष्टकोणीय है।

आंतरिक संरचना-

पैलेस ऑफ वेस्टमिन्सटर में 1100 कक्ष, 100 सीढ़ियाँ और 4.8 किलोमीटर लम्बे 91 गलियारे हैं। ये चार मंज़िलों पर निर्मित हैं। ग्राउंड फ्लोर पर कार्यालय, डाइनिंग रूम,और बार है। पहली मंज़िल पर पैलेस के मुख्य कक्ष,वाद-विवाद कक्ष, लॉबी और पुस्तकालय है। ऊपरी दो मंज़िलों को कार्यालय और समिति कक्ष के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।

प्रवेश द्वार-

एक मुख्य प्रवेश द्वार के स्थान पर अलग-अलग वर्गों के लिए अलग-अलग प्रवेश द्वार बने हुए हैं। विक्टोरिया टावर मंज़िल पर टावर के दक्षिण-पश्चिम कोने की तरफ शाही प्रवेश द्वार है। यहाँ से शाही समारोह का आगमन होता है। शाही परम्पराओं के अनुसार संसद का उदघाटन होता है। इसमें शाही सीढ़ियाँ, नॉर्मन बरामदा, रोबिंग रूम,शाही गैलेरी तथा लॉर्ड का कक्ष है। यहाँ पर सभी शाही रस्में सम्पन्न होती हैं। हाउस ऑफ दी लॉर्ड्स के सदस्यों के लिए कुलीन प्रवेशद्वार है। यह पत्थर वाले बरामदे से हो कर जाता है और प्रवेश हाल में जा कर खुलता है। संसद के सदस्य प्रवेश द्वार से भीतर प्रवेश करते हैं। यहाँ कोलाइस्टर की नीचे वाली मंज़िल पर स्थित क्लाकरूम से हो कर पंहुचा जा सकता है। इमारत के पश्चिमी मुख्य द्वार के बीच में है सेंट स्टीफन द्वार। यह द्वार जनता द्वारा निर्वाचित सदस्यों के लिए है।

साम्राज्ञी का रोबिंग कक्ष-

साम्राज्ञी का रोबिंग कक्ष पैलेस के समारोह वाले हाल के दक्षिणी छोर पर स्थित है। जैसा कि नाम से प्रतीत होता है यहाँ पर साम्राज्ञी आधिकारिक पोशाक तथा सिर पर शाही मुकुट को धारण कर पार्लियामेंट की स्टेट ओपनिंग की घोषणा करती है। इस भव्य कक्ष मेंआकर्षण का केन्द्रबिन्दु सम्राट का सिंहासन है। सम्राट यहाँ तीन सीढ़ियों के ऊपर स्थित अपने सिंहासन पर स्कॉटलैंड, इंग्लैंड तथा आयरलैंड के सैनिकों की सुरक्षा में इन राष्ट्रों के फूलों के प्रतीक से सज्जित मंच पर आसीन होता है। कक्ष के चारों ओर अलंकृत पत्थरों से आग की जगह बनाई गयी है। यहाँ पर सेंट जॉर्ज , सेंट माइकेल की भव्य प्रतिमाएँ प्रतिष्ठित हैं।

शाही गलियारा-

रोबिंग कक्ष के दक्षिण में शाही गलियारा है। यह पैलेस के विशाल कक्षों में से एक है। इसका मुख्य उद्देश्य पार्लियामेंट की स्टेट ओपनिंग के शाही जलूस को मंच उपलब्ध करवाना है। इस जलूस को सड़क के दोनों किनारों पर लगी खिड़कियों से बाहर से भी देखा जा सकता है। यहाँ पर विदेशी अतिथियों का स्वागत करने की व्यवस्था भी है। यहाँ पर दीवारों पर लगी पेंटिंग्स में ब्रिटिश सैन्य इतिहास के महत्त्वपूर्ण क्षण संरक्षित हैं। ऊपर लगी काँच की खिड़कियों पर इंग्लैंड और स्कॉटलैंड के सैनिकों का सुंदर चित्रण है।

राजकुमार का कक्ष-

राजकुमार का कमरा शाही गलियारे और लॉर्ड कक्ष के मध्य निर्मित एक छोटा उपकक्ष है। यहाँ पर लॉर्ड्स के सदस्य हाउस से सम्बद्ध विषयों पर विचार-विमर्श करने के लिए आते हैं। इस कक्ष में टंगे चित्रों में ट्यूडर इतिहास का चित्रण है। 28 आयल पेंटिंग्स ट्यूडर शासन के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालती हैं। इस कक्ष में महारानी विक्टोरिया की प्रतिमा भी स्थापित है ।

उनके दोनों ओर न्याय तथा दया की प्रतिमाएँ स्थित हैं। महारानी राजदंड और लारल के साथ सिंहासन पर बैठी हुई हैं। यह इस बात का प्रतीक है कि साम्राज्ञी ही शासन तथा सरकार चलाती हैं।

लॉर्ड’स चैंबर-

हाउस ऑफ लॉर्ड’स का कार्यस्थल पैलेस ऑफ वेस्टमिन्सटर के दक्षिणी भाग में स्थित है। इस के कक्ष भव्य रूप से अलंकृत हैं। चैंबर में बैठने की सीटों के साथ-साथ महल के लॉर्ड’स वाले भाग का फर्नीचर लाल रंग का है। चैंबर के ऊपरी भाग को अलंकृत काँच की खिड़कियों तथा धर्म, शौर्य, व कानून का प्रतिनिधित्व करने वाले व्यंजनात्मक भित्ति चित्रों से सजाया गया है। सभा के सदस्य तीन ओर लाल बेंचों पर बैठते हैं। अध्यक्ष के दायीं तरफ आध्यात्मिक सदस्य ( इंग्लैंड के स्थापित चर्च के आर्कबिशप तथा बिशप) तथा बायीं तरफ अस्थायी सदस्य बैठते हैं। सत्तापक्ष के सदस्य आध्यात्मिक पक्ष के साथ तथा विपक्ष के सदस्य अस्थायी सदस्यों के साथ बैठते हैं।

प्रतिदिन दोपहर के समय दो-तीन घंटे, आवश्यकता होने पर उससे भी अधिक टी.वी पर पार्लियामेंट की कार्यवाही का सीधा प्रसारण होता है।

वेस्टमिन्सटर ऐबे-

लंदन में वेस्टमिन्सटर पैलेस में गोथिक शैली में निर्मित विशाल गिरजाघर वेस्टमिन्सटर ऐबे है। यह वेस्टमिन्सटर पैलेस के पश्चिम में स्थित है। ब्रिटिश साम्राज्य के विशिष्ट पूजास्थलों में से एक तथा शाही परिवार के राज्याभिषेक का परम्परागत स्थल है। यह अब पूर्णरूप से राजपरिवार की निजी सम्पत्ति है। इस सम्पूर्ण क्षेत्र का विकास तथा निर्माण राजपरिवार ने किया है। अतः यहाँ पर राजा और धर्म को एकसाथ देखा जा सकता है।

सातवीं शताब्दी में पहले-पहल पंहुचे ईसाईयों ने थेम्स की तटीय थार्नी आइलैंड ( वर्तमान वेस्टमिन्सटर) पर एक छोटा सा लकड़ी का गिरजाघर बनवाया था। वह तीन-चार सौ साल तक तो जैसे-तैसे टिका रहा बाद में टूटने लगा। ग्यारहवीं शताब्दी में धर्मपरायण इंग्लिश सम्राट ‘एडवर्ड दी कंफेसर” ने देश की सत्ता संभाली। 1042-1052 ई के बीच पापमोचक एडवर्ड ने गिरजाघर के पुनर्निर्माण का कार्य शुरू करवाया। रोमन शैली में निर्मित यह इंग्लैंड का पहला गिरजाघर था। 28 दिसंबर,1065 ई को इसकी विधिवत प्रस्थापना करवायी गयी। एक सप्ताह बाद 5 जनवरी, 1065 ई को एडवर्ड की मृत्यु हो गयी। एक सप्ताह बाद उनको गिरजाघर में ही दफना दिया गया। गिरजाघर का निर्माण कार्य 1090 ई में पूरा हुआ। नौ साल बाद एडवर्ड की पत्नी एडिथ को उनके बगल में दफना दिया गया। उनके उत्तराधिकारी हेराल्ड द्वितीय का राज्याभिषेक इसी गिरजाघर में हुआ था। विगत नौ सौ साल से इंग्लैंड के प्रत्येक राजा या महारानी का राज्याभिषेक इसी गिरजाघर में सम्पन्न होता आ रहा है।

वर्तमान गिरजाघर का निर्माण 1245 ई में हेनरी अष्टम के आदेश पर आरंभ हुआ था। उन्होने इस स्थान को अपनी कब्र के रूप में भी चुना था। 1503 ई में हेनरी सप्तम ने इसमें एक लम्बवत शैली में प्रार्थनाघर बनवाया जो वर्जिन मेरी को समर्पित था ।

इसको हेनरी सप्तम का प्रार्थनाघर अथवा लेडी प्रार्थनाघर भी कहा जाता है। इस के निर्माण के लिए अधिकांश पत्थर फ्रांस में केन, पोर्टलैंड में आइल तथा फ्रांस की ही लोइर घाटी से आयात किए गए थे। इसके भव्य पश्चिमी प्रवेश द्वार पर चित्ताकर्षक आकृतियाँ, प्रतिमाएँ उत्कीर्ण हैं।

अधिकांश महाराजा-महारानियों के विवाह इसी गिरजाघर में सम्पन्न हुए तथा जब तक यहाँ पर पर्याप्त स्थान उपलब्ध रहा वे यहीं पर समाधिस्थ रहे। एडवर्ड दी कंफेसर का नाम इनमें उल्लेखनीय है। इस संत सम्राट की स्मृति में ऐबे के भीतर एक छोटा सा मंदिर भी है। अब भी राजपरिवार के सदस्यों के विवाह यहीं पर सम्पन्न करने की परम्परा चली आ रही है।

इंग्लैंड का पहला छापाखाना ऐबे में ही शुरू हुआ था। शायद इसी लिए छपाई प्रमुख को ‘मास्टर’ के स्थान पर ‘फादर’ कहने का प्रचलन आरंभ हो गया।

यहाँ पर अज्ञात सैनिकों की स्मृति में एक प्रतीकात्मक स्मारक है, वहाँ युद्ध से न लौटे हुए जवानों की स्मृतियाँ मौजूद हैं।

उन्नीसवीं शताब्दी से पहले तक ऑक्सफोर्ड तथा कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के बाद वेस्टमिन्सटर इंग्लैंड का तीसरा सबसे बड़ा विद्यालय था। यहीं पर किंग जेम्स बाइबिल, ओल्ड टेस्टामेंट के प्रथम तीन भाग तथा न्यू टेस्टामेंट के अंतिम आधे भाग का अनुवाद किया गया था। बीसवीं सदी में नयी बाइबिल को भी यहीं पर संग्रहीत किया गया। 15 नवम्बर, 1940 ई के ब्लीट्ज़ के कारण वेस्टमिन्सटर को मामूली क्षति पंहुची।

पोयट’स कार्नर-

ऐबे में ‘पोयट’स कार्नर’ प्रसिद्ध दर्शनीय स्थल है। यहाँ पर अनेक महान कवि, दार्शनिक, राजनीतिज्ञ, राजनयिक, अनुसंधानकर्त्ता, कलाकार, सैनिक और वैज्ञानिक चिरनिद्रा में लीन हैं। इन में शेक्सपियर, चौसर,डीलन, थॉमस, डेविड, वर्ड्सवर्थ, डॉ.जान्सन उल्लेखनीय नाम हैं। 6 सितम्बर, 1997 ई को एलिज़ाबेथ की दूसरी बहू, वेल्स की राजकुमारी डायना स्पेन्सर का अंतिम संस्कार इसी गिरजाघर में किया गया था।

विश्व में अनेक शाही कब्रिस्तान हैं । कुछ कब्रिस्तान आकर्षक भी हैं। संभवतः यही एक ऐसा स्थान है जहां राजा अपने श्रेष्ठ प्रजाजनों के साथ विश्राम कर रहे हैं। राजा के साथ राजसी बड़प्पन जुड़ा है लेकिन किसी श्रेष्ठ लोकोत्तर व्यक्ति को भी यहाँ पर बराबर का स्थान मिलता है। यही है इस ‘थार्नी आइलैंड’ की विशेषता।

17 दिसम्बर, 2010 ई को पोप बेनेडिक्ट 16 इस गिरजाघर में आने वाले पहले पोप थे।

सेंट मारग्रेट’स चर्च, वेस्टमिंस्टर-

सेंट मारग्रेट चर्च वेस्टमिन्सटर के पार्लियामेंट स्क्वेयर में स्थित है। यह लंदन स्थित हाउस ऑफ कामन्स का चर्च है तथा एंटीओक की मारग्रेट को समर्पित है। पैलेस ऑफ वेस्टमिन्सटर , वेस्टमिन्सटर ऐबे के साथ इसको भी 1987 ई में यूनेस्को ने विश्वविरासत घोषित कर दिया था।

बेनेडिक्ट पादरियों ने ऐबे के आसपास के क्षेत्र में रह रहे सामान्य लोगो के देवस्थान के रूप में 12वीं शताब्दी में इस चर्च की स्थापना की थी। सम्राट हेनरी सप्तम ने इस के नवनिर्माण के आदेश दिये थे। 1482-1523 ई के माध्य इस का नवनिर्माण हुआ। 1523 ई में इसकी प्रतिस्थापना हुई थी। सुधारवादी प्रक्रिया शुरू होने से पहले यह लंदन का कैथोलिक परम्परा के रूप में प्रतिष्ठित अंतिम चर्च है। दोनों तरफ सेंट मेरी तथा सेंट जॉन की भव्य अलंकृत प्रतिमाएँ शोभायमान हैं। परिसर के भीतर कई अन्य गिरजाघर हैं।

1614 ई में सेंट मारग्रेट चर्च पैलेस ऑफ वेस्टमिन्सटर का निजी चर्च बन गया था। 1734-1738 ई के मध्य उत्तर-पश्चिमी टावर का पुनर्निर्माण किया गया। पूरी संरचना में पोर्टलैंड पत्थर लगाया गया। 1877ई में सर जॉर्ज गिल्बर्ट स्काट ने चर्च के भीतरी भाग का जीर्णोद्धार कर उसको वर्तमान भव्य स्वरूप प्रदान किया। ब्रिटेन में प्रतिवर्ष अक्तूबर में कोप्टिक आर्थोडॉक्स चर्च यहाँ पर नववर्ष की प्रार्थना सभा का आयोजन करता है। 2016 ई में बिशप एंगोलस ने यहाँ पर धर्मोपदेश दिया था। सेंट मारग्रेट चर्च का पादरी वेस्टमिन्सटर ऐबे का एक पादरी होता है।

यहाँ पर न केवल स्थानीय लोगों के विवाह सम्पन्न होते हैं अपितु अन्य वर्गों के लोगों के विवाह के लिए भी यह लोकप्रिय स्थान है। पार्लियामेंट के सदस्य, कुलीन वर्ग के लोग, हाउस ऑफ लॉर्ड’स तथा हाउस ऑफ कामन्स के सदस्य भी यहाँ पर बंधन में बंध सकते हैं।

1987 ई में पैलेस ऑफ वेस्टमिन्सटर तथा,वेस्टमिन्सटर ऐबे के साथ इसको भी विश्वविरासत के रूप में मान्यता प्रदान कर दी गयी थी। लंदन सम्पूर्ण विश्व के साथ सम्बद्ध है । यहाँ पर खान-पान, आवास की प्रत्येक सुविधा उपलब्ध है। वैसे भी लंदन एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल है।

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प्रमीला गुप्ता

विश्व के सात आश्चर्यों में से एक-पेट्रा

अपनी अद्वितीय स्थापत्यशैली के कारण जॉर्डन स्थित पेट्रा की गणना विश्व के सात आश्चर्यों में होती है। यह ‘होर’ नामक पहाड़ की ढलान पर पर्वतों के बीच एक संकरी घाटी में स्थित है। ‘होर’ पहाड़ मृत सागर से अकाबा की खाड़ी तक फैली ‘अरबा वादी’ तक फैला है। मूल निवासी नाबातियन इस पुरातन नगर को ‘रेकेम’ के नाम से जानते थे।

सात हज़ार साल पहले पेट्रा व आसपास का क्षेत्र बसा हुआ था। अनुमान है कि नबातियन कबीले के लोग यहाँ पर रहते थे। ई पू . छठी शताब्दी में नबातियों ने इस बंजर रेगिस्तान में अपनी राजधानी स्थापित की थी। गुलाबी चट्टानों से बना होने के कारण इसको ‘गुलाबी शहर’ भी कहा जाता है। पेट्रा शहर की गुलाबी बलुआ पत्थरों से बनी नक्काशीदार भव्य इमारतें, कुशल जल प्रणाली अपने आप में अद्वितीय है। पेट्रा का वैश्विक, सांस्कृतिक मूल्य यहाँ पर स्थित भव्य मकबरों, मंदिरों की स्थापत्य शैली, विशिष्ट धार्मिक स्थलों, बरसाती पानी के संचयन के लिए निर्मित नहरों, बांधों, जलाशयों तथा शहर में पानी की सप्लाई के लिए बलुआ पत्थरों की पाइप लाइनों,तांबे की खदानों, मंदिरों, चर्चों व अन्य सार्वजनिक इमारतों के पुरातत्त्वशेषों के कारण है। इमारतों के बाहरी भाग पर रोमन स्थापत्य शैली की छाप अंकित है। अमूल्य वैश्विक सांस्कृतिक धरोहर के रूप में यूनेस्को की विश्व विरासत समिति ने इसको 1985ई में विश्व विरासत घोषित कर दिया था। 2007 ई में यहाँ के ‘अल-खजनेह’ को विश्व के सात आश्चर्यों में से एक माना गया।

इतिहास-

नबातियों द्वारा पारम्परिक शैली में चट्टानों को काट कर बनाए गए नक्काशीदार मंदिर, शाही मकबरे व ‘अल-खजनेह’ विशिष्ट हैं। ई पू. पहली शताब्दी से अंतिम शताब्दी तक की अद्भुत स्थापत्यकला व कलात्मक सौन्दर्य मुग्धकारी है। प्रागैतिहासिककाल से मध्यकाल तक की स्थापत्य शैली में निर्मित संरचनाओं,स्मारकों के पुरातत्त्वशेष उन विलुप्त सभ्यताओं के प्रतीक हैं जो यहाँ पर आती रहीं। सदियों तक गुमनामी के अंधेरे में विलीन पेट्रा को ‘विलुप्त नगर’ (The lost city) कहा जाता है।

पुरातत्त्वशेष इस बात की पुष्टि करते हैं कि नबाती कबीले के लोग अत्यधिक सुविधासम्पन्न थे। वे जलप्रणाली के विशेषज्ञ तथा कुशल व्यापारी थे। उनके गाज़ा,बसरा, दमस्कश के साथ व्यापारिक संबंध थे। यह आश्चर्य की बात है कि इतने समृद्ध शहर के अवशेष सदियों तक जनसामान्य की दृष्टि से ओझल रहे। 1812 ई में स्विस अन्वेषक जॉन लुडविग बरकार्ट ने इस विलुप्त शहर को ढूंढ निकाला था। यूनेस्को के विचार में ये संरचनाएँ विश्व की अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर हैं। मृत सागर के उत्तरी तट पर कामरान की वादी की ग्यारह गुफाओं में प्राप्त अभिलेखों में इस स्थान का ज़िक्र है। उस समय इस स्थान का नाम ‘रेकेम’ था। इन अभिलेखों में 900 दुर्लभ दस्तावेज़ संरक्षित हैं। इनमें ‘हेब्र्यु’ भाषा में लिखी दुर्लभ बाइबल भी है। ये अभिलेख 1947-1956 के बीच प्राप्त हुए । इतिहासकर इन में लिखी सामग्री का गहन अध्ययन करने में जुटे हैं। उनके मतानुसार इन अभिलेखों में लिखी सामग्री से विश्व के इतिहास में नाटकीय परिवर्तन आने की संभावना है।

इतिहासकारो, पुरातत्त्वविदों के लिए इस शहर का निर्माण काल आज भी एक रहस्य बना हुआ है। इस रहस्य को जानने के लिए उनके पास कोई भी विश्वसनीय प्रमाण नहीं है। हार कर निर्माण काल को निर्धारित करने के लिए उन्होने स्थापत्यशैली का सहारा लिया है। अनेक संरचनाओं में ग्रीक, रोमन तथा सीरियन शैली का प्रभाव परिलक्षित होता है। तत्कालीन स्थानीय स्थापत्य शैली कहीं नहीं दिखाई देती है। यहाँ की मूल सभ्यता का आकलन करने के लिए पुरातत्त्वविद यूनानी सभ्यता के मकबरों को आधार मान कर अध्ययन कर रहे हैं। ये संरचनाएँ प्राचीनतम संरचनाएँ हैं। आकलन के अनुसार ये ई पू. छठी शताब्दी से प्राचीन नहीं हैं।

प्रवेश द्वार-

इस क्षेत्र का प्रवेशद्वार पूर्व में मूसा वादी से है।वहाँ से एक संकरी, अंधेरी खाई से अंदर जाने का रास्ता है। इसके दोनों तरफ ऊंची चट्टानें हैं।इस्लामिक अभिलेखों के अनुसार पेट्रा उस स्थान पर स्थित है जहां पर मूसा नबी ने एक पत्थर पर छड़ी मारी थी और वहाँ से अक्षय जलधारा निकल पड़ी थी । इसी कारण से यह घाटी ‘मूसा वादी’ के नाम से प्रसिद्ध है। यह खाई तीन-चार मीटर चौड़ी तथा एक मील लम्बी है। प्रवेशद्वार बांध से शुरू हो कर ‘अल खजेनह’ तक जाता है। चट्टानों पर दोनों ओर बलुआ पत्थरों से चित्ताकर्षक आकृतियाँ उत्कीर्ण हैं। प्रवेशद्वार के दोनों ओर पानी के लिए पाइप लाइनें बिछी हैं। सिक अर्थात प्रवेश द्वार से बाहर ‘बब-अल-सिक नामक घाटी में वर्गाकार विशाल स्मारक हैं। इन चट्टानों को ‘जिन चट्टानें’ भी कहा जाता है। यहीं पर है ‘ओबेलिस्क समाधि’ (मकबरा)।

अल-खजनेह (कोषागार)

प्रवेशद्वार अर्थात ‘सिक’ यहाँ की सर्वाधिक सुंदर इमारत ‘अल-खजनेह’ तक जाता है। वास्तव में यह एक शाही मकबरा है। स्थानीय अफवाहों के आधार पर इसका नाम ‘अल-खजनेह’ (कोषागार) पड़ गया।

कुछ लोगों ने यह अफवाह फैला दी कि यहाँ पर एक बड़े घड़े में लुटेरों ने लूट का माल छिपा रखा है। इन अफवाहों को सुन कर बेदुइन अरबों ने उस खजाने को पाने के लिए यहाँ पर धावा बोल दिया। घड़े को तोड़ने के लिए अंधाधुंध गोलियां बरसा दीं। उनको शायद इस बात का अहसास नहीं था कि वह एक मजबूत चट्टान से बना हुआ था। आज भी उस स्थान पर गोलियों के निशान मौजूद है।

भव्य मंदिर-

ई पू. पहली शताब्दी के अंत में चित्ताकर्षक,भव्य मंदिर का निर्माण बहुत तेज़ी से हुआ। इस निर्माण कार्य को संभवतः अलेक्ज़ेंडरिया के प्रशिक्षित वास्तुशिल्पियों ने सम्पन्न किया।

मंदिर की चारदीवारी के साथ छह खूबसूरत पगडंडियाँ थीं। ऊपर तीन स्तंभों पर नक्काशीदार तीन हाथियों के सिर सुशोभित थे। मंदिर पर रंगीन प्लास्टर किया था तथा पानी के लिए पाइप लाइनें बिछी हुई थीं।

सम्राट अरेटस चतुर्थ ने पहली शताब्दी के मध्य अनेक संरचनाओं का निर्माण करवाया था। उसी समय संभवतः मंदिर का भी नव निर्माण करवाया हो। मंदिर से स्तंभों वाली गली से बाइजेंटाइन चर्च का मनोरम दृश्य दिखाई देता है। एक अभिलेख से ज्ञात होता है कि सम्राट अरेटस ने नबातियों के प्रमुख देव ‘दुसरा’ के मंदिर के साथ थियेटर बनाने का भी आदेश दिया था। अतः मंदिर के साथ थियेटर भी निर्मित है। अन्य किसी स्थान पर किसी मंदिर में स्तंभों वाली गली तथा थियेटर निर्मित होने का प्रमाण नहीं मिलता है। कुछ पुरातत्त्वविदों के मतानुसार यहाँ पर मंदिर नहीं अपितु प्रशासनिक कार्यालय थे। जो भी हो पुरातत्त्वविद आज भी इन रहस्यों की गुत्थी सुलझाने में माथा-पच्ची कर रहे हैं।

मठ-

कुछ पुरातत्त्वविदों,व पर्यटकों के विचार में मठ ‘अल खजनेह’ का विस्तीर्ण तथा बेहतर प्रतिरूप है। यहाँ तक पंहुचने के लिए 800 सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं। पुराने पेट्रा में निर्मित म्यूज़ियम के समीप से मठ तक जाने का मार्ग शुरू हो जाता है। ऊपर जाने के लिए खच्चर,टट्टू मिल जाते हैं। मार्ग के आरंभ में धूल भरी पगडंडियों के पीछे नक्काशीदार मकबरे हैं।

स्तंभों के बीच स्थित गली-

मेहराबदार प्रवेशद्वार के सामने पेट्रा शहर में स्तंभों के बीच अवस्थित गली के पुरातत्त्वशेष प्राप्त हुए हैं। यह पृष्ठभूमि में दीख रहे थियेटर से कस्र-अल बिंत ( Qasr al-Bint) की पुराने बाज़ार तक जाते हैं। मूल संरचना नबातियन शैली का प्रतिनिधित्व करती है। रोमन काल में इसका नवनिर्माण हुआ होगा। यह प्राचीन पेट्रा का प्रमुख बाज़ार होगा। 106 ई में गली की चौड़ाई मीटर कर दी गयी थी।

शाही मकबरे-

भव्य मंदिर के सामने शाही मकबरे हैं। किंवदंतियों के अनुसार यह शहर की व्यापारिक, वाणिज्यकी गतिविधियों का प्रमुख केंद्र था। बाइजेंटाइन काल की चौथी,पाँचवीं तथा छठी शताब्दी तक यह स्थान गली के रूप में इस्तेमाल होता रहा। आवाजही की सुविधा को ध्यान में रख कर इस को आयताकार तथा वृत्ताकार में निर्मित किया गया था। मध्य में जलनिकासी के लिए नीचे पाइप लाइने बिछी हुई हैं।

ओपन स्टेडियम-

पुरातत्त्विक दृष्टिकोण से यह संरचना अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है। नबातियन साम्राज्य में सम्राट अरेटस चतुर्थ के शासन काल में पेट्रा सांस्कृतिक तथा राजनैतिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र था। निर्माण कार्य भी पूरे ज़ोर-शोर से चल रहा था। कहते हैं कि ‘हेरोड दी महान’ द्वारा निर्मित थियेटर को देख कर नबातियन सम्राट के मन में भी थियेटर निर्माण का विचार आया। थियेटर के भीतर लगभग 4,000 दर्शकों के बैठने की व्यवस्था थी। डिजाइन के दृष्टिकोण से रोमन दिखाई देने पर भी इस पर नबातियन स्थापत्य शैली की छाप स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है। बाद में अरेटस के बेटे मैकस द्वितीय ने इसमें कुछ परिवर्तन करवाया।

धर्म-

ये अमूल्य स्मारक 264 वर्ग कि.मी क्षेत्र में पंक्तिबद्ध रूप से निर्मित हैं। नबाती कबीले के लोगों ने इसको बसाया था। उनकी भाषा ‘आर्मेक’ थी। वे ‘दुशरा’ देवता तथा ‘उज्जा’,’अलत’, व ‘मनह’ नामक तीन देवियों की पूजा करते थे। इनके अतिरिक्त वे अपने सम्राटों की पूजा भी देवरूप में करते थे। उनके पौराणिक आख्यान, सम्राटों के नाम, शासन प्रणाली सब अतीत के गर्भ में विलुप्त हो चुकी है। पाँचवीं शताब्दी में ईसाई मतावलम्बियों ने इस क्षेत्र में प्रवेश किया था। उसके बाद का इतिहास लिखित रूप में उपलब्ध है।

विलुप्त सभ्यता-

363 ई में आए भूकंप में यहाँ की जलप्रणाली नष्ट हो गयी थी। शहर में जलप्राप्ति का कोई साधन नहीं बचा था अतः लोग जीवन-यापन के लिए दूसरे स्थानों पर विस्थापित हो गए थे। सागर मार्ग भी नष्ट हो गया था। परिणाम स्वरूप पेट्रा का व्यापार, सुख-समृद्धि सब विलुप्त हो गया। डाकुओं,लुटेरों ने इसको अपना ठिकाना बना लिया। वे आते और यहाँ से अमूल्य, ऐतिहासिक सम्पदा लूट कर ले जाते। नक्काशीदार ग्रेनाइट पत्थरों से निर्मित कुछ इमारतें ही शेष बची हैं जो पेट्रा के गौरव शाली इतिहास की साक्षी हैं। इस अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर के अवशेषों को प्रतिवर्ष अगणित पर्यटक देखने के लिए आते हैं। कोविड-19 महामारी के चलते आज यहाँ पर सन्नाटा पसरा है।

विश्व साहित्य, लोकमञ्च पर पेट्रा की लोकप्रियता-

सन 1845 में ब्रिटिश कवि विलियम बुरगोन को उनकी कविता ‘पेट्रा’ के लिए ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी का ‘नौडीगेट’ पुरस्कार मिला था।

पेट्रा का उल्लेख अनेक उपन्यासों यथा-‘Left Behind Series’, ‘ Appointment with Death; ‘ The Eagle in the Sand; ” The Red Sea Sharks’ में मिलता है।

अंग्रेज़ महिला ने पेट्रा बेदुइन के साथ 2004-2013 तक उम सेयहोन में बिताए गए समय को कलमबद्ध किया ।

‘Indiana Jones and the Last Crusade; Arabian Nights; Passion in the Desert; Mortal Combat ; Sinbad and the Eye of the Tigar, फिल्मों में भी पेट्रा के चित्र देखे जा सकते है।

अनेक टी.वी सीरियलों में भी खूबसूरत पेट्रा देखा जा सकता है।

विशेष-

लाल-गुलाबी रंग के पत्थरों से निर्मित ‘गुलाबी सिटी’ पेट्रा के समीप दो अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट-अकाबा एयरपोर्ट तथा वादी अरबा एयरपोर्ट है। जॉर्डन पंहुचने के बाद पेट्रा तक जाने के लिए परिवहन के अनेक विकल्प हैं। अम्मान से पेट्रा तक आने-जाने के लिए पूरे दिन का टिकट लिया जा सकता है। इसके अतिरिक मिनी बसें भी चलती हैं। अम्मान से पेट्रा तक दो घंटे का सफर है। अम्मान में रहने, खाने-पीने की समुचित व्यवस्था है।

पेट्रा के दर्शनीय स्थलों को देखने के लिए प्रातःकाल अथवा शाम का समय सर्वोपयुक्त है। दिन में रेगिस्तान की तपती गर्मी में पर्यटक बेहाल हो जाते हैं। शाम को ढलते सूरज की सतरंगी किरणों की रोशनी में देदीप्यमान नक्काशदार बलुआ पत्थरों की अद्वितीय संरचनाओं को देखने में अलौकिक आनंद आता है। तो क्यों नहीं जीवन में एक बार इस अलौकिक आनंद की अनुभूति की जाए।

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प्रमीला गुप्ता