विश्व के सात अजूबों में से एक- भव्य कोलोसियम-

विश्व विख्यात रोमन साम्राज्य रोम! विकसित सभ्यता और समृद्ध संस्कृति का स्वामी रोम! रोम यूरोप के भव्य देश इटली की राजधानी है। यहीं रोम के केंद्र में विद्यमान है विशाल ‘कोलोसियम’। मूल लेटिन नाम ‘एम्फीथियेटर फ्लावियम’ है। अंग्रेज़ी में इसको ‘फ्लावियम एम्फीथियेटर’ कहते हैं। यह विश्व के नए सात अजूबों में से एक है। 1980 ई में यूनेस्को ने इसको विश्व विरासत के रूप में मान्यता प्रदान कर दी थी। फ्लावियन वंश के संस्थापक वेस्पेसियन के नाम पर ही इसका नाम ‘फ्लावियम एम्फीथियेटर’ रखा गया। विश्व में यह एम्फीथियेटर ‘कोलोसियम’ के नाम से प्रसिद्ध है।

इस स्थान पर पूर्ववर्ती रोमन सम्राट नीरो ने अपने ऐश-ओ-आराम, शान-शौकत का प्रदर्शन करने के लिए कृत्रिम झील, उसके चारों तरफ बाग,पैवेलियन और पोर्टिको बनवा रखे थे। यहीं पर उसने अपनी एक विशाल कांस्य प्रतिमा का निर्माण करवाया। संभवतः उस विशाल (Collosal)प्रतिमा के कारण ही इस विशाल संरचना का नाम ‘कोलोसियम’ पड़ गया था। उस ऐश्वर्य और सुख-समृद्धि का उपभोग केवल नीरो ही कर सकता था।

निर्माण-

वेस्पेसियन नीरो अधिकृत इस साम्राज्य के ऐश्वर्य का उपभोग जनसामान्य के साथ मिल कर करना चाहता था। उसने इस वैभवसंपन्न राजप्रासाद तथा कृत्रिम झील को तुड़वा कर एक विशाल नए एम्फीथियेटर का निर्माण आरंभ करवाया। उसने केवल नीरो की कांस्य प्रतिमा को यथा स्थान रहने दिया । रोम की जनता के मनोरंजन को ध्यान में रख कर उसने इसका निर्माण नगर के केंद्र में करवाया तथा निर्माण पूरा होने पर जनता के लिए खोल दिया गया। ‘कोलोसियम’ रोम की सांस्कृतिक पहचान बन गया। यह रोमन स्थापत्य कला तथा इंजीनियरिंग का उत्कृष्ट नमूना है।

सन 70-72 में तत्कालीन रोमन सम्राट वेस्पेसियन ने इसका निर्माण कार्य आरंभ करवाया था। दुर्भाग्यवश यह उनके जीवन काल में पूरा नहीं हो पाया। तीसरी मंज़िल तक ही बना था कि सन 79 में उनकी मृत्यु हो गयी। उनके बेटे टाइटस ने निर्माण कार्य जारी रखा और निर्माण पूरा करवाया। बाद में वेस्पेसियन के छोटे बेटे ने इसमें अनेक परिवर्तन करवाए।

नवनिर्मित कोलोसियम के एक अभिलेख पर लिखा है-” युद्ध में जनरल के रूप में प्राप्त धन-सम्पदा से सम्राट वेस्पेसियन ने इस एम्फीथियेटर का निर्माण करवाया था।” सन 70 में वेस्पेसियन ने महान यहूदी क्रान्ति पर विजय प्राप्ति की थी। रोम परम्परा के अनुरूप विजय प्राप्ति के उपलक्ष्य में इस विशाल स्मारक का निर्माण करवाया गया था।

सन 80 में सम्राट टाइटस ने ‘कोलोसियम’ का उदघाटन किया था। उदघाटन समारोह के अवसर पर आयोजित खेलों में 9,000 जंगली जानवर मारे गए थे।उदघाटन के उपलक्ष्य में स्मारक सिक्का भी जारी किया गया था।

वेस्पेसियन के छोटे बेटे डोमिशियन ने ‘कोलोसियम’ में अनेक संशोधन करवाए। अधिक लोगों के बैठने के लिए सबसे ऊपरी मंज़िल के ऊपर एक गैलेरी बनवाई।

एक भूमिगत सुरंग का निर्माण भी करवाया। ग्लेडिएटर्स ( योद्धाओं) के लिए प्रशिक्षण केंद्र और आयुधाभंडार भी बनवाए। एम्फीथियेटर में लोगों के मनोरंजन के लिए ग्लेडिएटरों यानि योद्धाओं और जानवरों की लड़ाइयाँ लड़वाई जाती थी। समय-समय पर पौराणिक कथाओं पर आधारित नाटकों का मंचन भी किया जाता था।

संरचना-

‘फ्लावियम एम्फीथियेटर’ ( कोलोसियम) के निर्माण से पहले थियेटर का निर्माण सामान्यतः पर्वतों के समीप किया जाता था लेकिन कोलोसियम पूर्ण रूप से स्वतंत्र तथा समतल भूमि पर निर्मित है। छह एकड़ भूमि पर विस्तीर्ण 189 मीटर लम्बा और 156 मीटर चौड़ा है। बाहरी दीवार 48 मीटर ऊंची है। आखाडा( लड़ाई का मैदान) अंडाकार है। यह 287 फुट लम्बा और 18 फुट चौड़ा है। इसके चारों तरफ 15 फुट ऊंची दीवार है। उसके ऊपर दर्शकों के कतारबद्ध बैठने की व्यवस्था है।

बाहरी दीवार के निर्माण में लगभग एक लाख क्यूबिक मीटर पत्थर इस्तेमाल किए गए थे। ये बिना किसी मसाले के लोहे के 300 टन शिकंजों के साथ जोड़े गए थे। भूकंप में बाहरी दीवार टूट चुकी है। उत्तर दिशा की बाहरी दीवार अभी भी संरक्षित है। कोलोसियम के बाहर से दिखने वाले अवशेष मूलतः भीतरी दीवार के हैं।

पुरातत्त्वशेषों में तीन मंज़िलों के ऊपर निर्मित मेहराबदार गलियारों के ऊपर चबूतरे पर एटिक है। यह रस्सियों से बनी जालीदार कनवेस से ढकी है। यह अखाड़े का दो तिहाई भाग है। बीच में ढलुआं है। यहाँ से दर्शकों के पास हवा आती है।

एम्फीथियेटर में 80 प्रवेश द्वार हैं। इनमें से 76 प्रवेश द्वार जन सामान्य के लिए थे। नीचे के प्रवेश द्वार पर लेटिन भाषा में L11 लिखा है-

उत्तरी द्वार से केवल सम्राट व मंत्रीगण ही भीतर जा सकते थे। शेष तीन द्वार गणमान्य व संभ्रांत जनों के लिए आरक्षित थे। इन चारों द्वारों पर सुंदर नक्काशी की हुई थी। अब केवल इन के अवशेष ही देखे जा सकते हैं।

दर्शकों के लिए मनोरंजन कार्यक्रम निःशुल्क थे लेकिन उनको प्रवेश टिकट दिया जाता था। इससे लोगों को अपनी निर्धारित सीट पर बैठने में आसानी होती थी। मिट्टी से बने टिकट पर सीट का नंबर और लाइन लिखी होती थी।

कोलोसियम में 50,000 दर्शकों के बैठने की व्यवस्था थी। उस समय इतनी बड़ी व्यवस्था का निर्माण व सुचारुरूप से संचालन एक आश्चर्यजनक बात है। सीट का निर्धारण समूह और रुतबे के अनुसार किया जाता था। डोमिशियन ने इमारत के सबसे ऊपर एक गैलेरी का निर्माण करवाया था। यहाँ पर निर्धन, गुलाम तथा औरतें खड़े हो कर अथवा लकड़ी की नीची बेंचों पर बैठ कर खेल का आनंद ले सकती थी। कब्र खोदने वालों और पूर्व ग्लेडिएटर्स को अन्दर जाने की मनाही थी।

हाइपोजियम-

कोलोसियम रणभूमि ( अखाड़े ) के नीचे हाइपोजियम है। यहाँ जाने के लिए लकड़ी का रास्ता बना हुआ है। यह 83 मीटर लम्बा और 14 मीटर चौड़ा है। फर्श लकड़ी और रेत से बना है। अखाड़ा भूमिगत ‘हाइपोजियम’ के ऊपर निर्मित है। अखाड़े (रणभूमि) का फर्श तो नष्ट हो चुका है लेकिन ‘हाइपोजियम’ दिखाई देता है। हाइपोजियम में दो स्तरों पर भूमिगत सुरंगों का जाल बिछा हुआ था। यहाँ पर खूंखार जानवरों को रखने के लिए पिंजरे भी रखे हुए थे। ऊपर अखाड़े में जाने से पहले ग्लेडिएटरस और जानवरों को यहीं पर इकट्ठा किया जाता था। ऊपर अखाड़े में जाने के लिए अलग रास्ते बने हुए थे।

हाइपोजियम कोलोसियम से बाहर कई स्थानों के साथ सुरंगों से जुड़ा हुआ था। जानवरों और ग्लेडिएटर्स को सुरंगों से हाइपोजियम में लाया जाता था। कोलोसियम के पूर्व में निर्मित ‘लुड्र्स मैग्नस’ ग्लेडिएटर्स की बैरेक्स हाइपोजियम के साथ जुड़ी हुई थी। सम्राट तथा संभ्रांत महिलाओं के भीतर जाने के लिए अलग रास्ता बना हुआ था।

हाइपोजियम के भीतर भारी उपकरण रखने का भी प्रावधान था। यहाँ पर अफ्रीका से बड़े जंगली जानवर लाए जाते थे। अखाड़े में उनकी लड़ाइयाँ होती थीं। इन जानवरों में दरयाई घोडा, गैंडा, हाथी, मगरमच्छ, जिराफ, शेर, बाघ,चीते, शुतुरमुर्ग प्रमुख थे। ये लड़ाइयाँ विशाल स्तर पर होती थीं। किंवदंती के अनुसार 107 ई में डेसिया में अकेले टार्जन ने 123 दिनों के अन्दर 11,000 जानवरों और 10,000 ग्लेडिएटर्स को पराजित कर दिया था। टार्जन आज भी बच्चों का पसंददीदा हीरो है। उस पर न जाने कितनी फिल्मे बन चुकी हैं, कहानियाँ लिखी गयी, कार्टून बने? ऐसी ही एक फिल्म से टार्जन का यह चित्र लिया गया है-

विध्वंस तथा पुनर्निर्माण-

सन 217 के भीषण अग्निकांड में एम्फीथियेटर की बाहरी सतह पर निर्मित काष्ठ संरचनाएँ जल कर राख़ हो गयी थीं। बहुत सालों तक उनकी मरम्मत नहीं हुई। सन 250-252 में उनका जीर्णोद्धार करवाया गया। 443 ई में भूकम्प ने दोबारा उसको तहस-नहस कर डाला। 435 ई में यहाँ पर ग्लेडिएटरों की आखिरी लड़ाई हुई थी। 523 ई तक यहाँ पर जानवरों की लड़ाइयाँ होती रही।

धीरे-धीरे इन हिंसक खेलों में जनसामान्य की रुचि समाप्त होने लगी थी। लोगों का मनोरंजन करने में लाखों निर्दोष इन्सान और जानवर अपनी जान गंवा चुके थे। इतिहासकारों के अनुसार इन खूनी खेलों में पाँच लाख जानवरों और दस लाख इन्सानों ने अपनी जान गंवा दी थी। वास्तव में उस समय दूसरे देशों से गुलामों को ला कर ग्लेडिएटर के रूप में प्रशिक्षित किया जाता था। प्रशिक्षण के बाद लोगों के मनोरंजन के लिए अखाड़े में दूसरे योद्धाओं और जानवरों से लड़वाया जाता था। जीतने वाले योद्धा को इनाम और हारने वाले को मौत मिलती थी। खूंखार जानवरों के साथ निहत्थे लड़वाया जाता था। इन खूनी लड़ाइयों को देखते-देखते लोग ऊब गए थे।

छठी शताब्दी में कोलोसियम में एक चर्च की स्थापना की गयी। उसके बाद कुछ भाग आवासीय स्थल तथा रंगारंग कार्यक्रमों के लिए इस्तेमाल होने लगे। 12वीं शताब्दी के आसपास राजाओं ने इसे किले के रूप में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। 1349 ई में आए भीषण भूकंप में बाहरी दक्षिणी भाग पूरी तरह से टूट गया। खंडित भाग के पत्थरों से रोम के महल, चर्च और हस्पतालों का निर्माण करवाया गया।

जीर्णोद्धार-

1832 ई में थॉमस कोल ने कोलोसम की भीतरी दीवारों और आस पास सलीब के निशान और जंगली पौधे देखे-

19वीं शताब्दी में उनको वहाँ से हटा दिया गया। 1807,1827 ई में कोलोसियम के बाहरी हिस्से की मरम्मत की गयी। 1827, 1831, 1930 ई में भीतरी भाग का जीर्णोद्धार किया गया। समय और प्रदूषण से होने वाली टूट-फूट को 1993 तथा 2000 ई में ठीक किया गया।

सहायक भवन-

कोलोसियम के कारण उसके आसपास कई प्रकार के उद्योग स्थापित हो गए थे। एम्फीथियेटर के लिए सहायक भवनों का निर्माण हो गया था। पूर्व में ‘लुड्र्स मैग्नस’ नामक ग्लेडिएटर्स प्रशिक्षण केंद्र के पुरातत्त्वशेष आज भी विद्यमान है। यह कोलोसियम के साथ भूमिगत सुरंग से जुड़ा हुआ था। इसके अतिरिक्त भी अन्य कई प्रशिक्षण केंद्र हैं। अस्त्र-शस्त्र रखने के लिए आयुधागार था। उपकरण रखने, ज़ख्मी ग्लेडिएटर्स के उपचार के लिए तथा मृतकों को दफनाने के लिए अलग-अलग स्थान थे।

अंतर्राष्ट्रीय मृत्युदंड विरोधी प्रतीक-

पिछले कई सालों से कोलोसियम मृत्युदंड विरोधी अंतर्राष्ट्रीय अभियान का प्रतीक बन गया है। 1984 ई में मृत्युदंड समाप्त कर दिया गया था। 2,000 ई में कोलोसियम के सामने अनेक मृत्युदंड विरोधी प्रदर्शन हुए और पूरे विश्व में मृत्यु दंड के विरुद्ध विरोध किया गया। अब यदि किसी देश में मृत्युदंड समाप्ति का कानून पारित होता है तो रोम प्रशासन कोलोसियम में सफ़ेद के स्थान पर सुनहरी रोशनी करता है। सुनहरी रोशनी में जगमगाता कोलोसियम-

रंगारंग कार्यक्रम-

खंडहर के रूप में परिवर्तित हो जाने के कारण कोलोसियम के भीतर विशाल कार्यक्रमों का आयोजन संभव नहीं। भीतर कुछ सौ व्यक्ति ही बैठ सकते हैं। इस पर भी अनेक रंगारंग कार्यक्रमों की पृष्ठभूमि में कोलोसियम रहता है। 435 ई में ग्लेडिएटर्स और 435 ई में जानवरों की लड़ाइयाँ बंद हो गयी थी।

अब यहाँ पर रोमन कैथोलिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। पोप ने कोलोसियम को एक पवित्र स्थान घोषित कर दिया था। हर साल ‘गुड फ्राइडे’ के दिन एम्फीथियेटर तक एक शोभायात्रा निकाली जाती है। इसकी अगुवाई स्वयं पोप करते हैं। उनके हाथ में ‘वे ऑफ दी क्रास’ नाम की मशाल रहती है।

कोलोसियम आज रोम में पर्यटकों के लिए विशिष्ट आकर्षण का केंद्र है। प्रतिवर्ष लाखों पर्यटक यहाँ पर आते हैं। स्थापत्य कला और इंजिनियरिंग के इस अद्वितीय कौशल को देख कर अचंभित रह जाते हैं। इटली के विनाशकारी भूकंपों में ध्वस्त हो जाने के बाद भी आज भी यह प्राचीन रोम की गौरवगाथा के प्रतीक के रूप में जीवंत साक्षी बन कर खड़ा है। अब कोलोसियम की बाहरी दीवार की ऊपरी मंज़िल पर ‘ईरोस’ को समर्पित एक संग्रहालय है। इटली की मुद्रा यूरो के सिक्कों पर भी कोलोसियम का चित्र अंकित है।

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प्रमीला गुप्ता

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