बुद्ध की जन्मस्थली -लुम्बिनी-

भारत के बिहार राज्य की उत्तरी सीमा के निकट वर्तमान नेपाल में भगवान बुद्ध की जन्मस्थली ‘लुम्बिनी’ स्थित है। नेपाल में कपिलवस्तु के रुपेनधेनी ज़िले में है ‘लुम्बिनी’। भगवान बुद्ध की जीवनयात्रा यहीं से आरंभ होती है। यहाँ पर बौद्ध धर्म के सभी सम्प्रदायों ने अपनी-अपनी विचारधारा के अनुरूप मंदिर, गुम्पा,विहार स्थापित कर रखे हैं। हूणों के आक्रमणों के बाद यह स्थान गुमनामी के अंधेरे में खो गया था। 1866 ई में इस स्थान की खोज की गयी और इसका जीर्णोद्धार किया गया। 1997 ई में यूनेस्को ने इसको ऐतिहासिक महत्त्व की विश्व धरोहर घोषित कर दिया।

लुम्बिनी में बुद्ध की अपेक्षा उनकी माता मायादेवी की अधिक मान्यता है। बुद्ध की माता व पिता के निवासगृहों के बीच एक पवित्र उद्यान ‘लुम्बिनी’ है। ससुराल से मायके जाते समय माया देवी ने उनको यहीं पर जन्म दिया था। लुम्बिनी में मायादेवी अर्थात महामाया का चिरस्थायी मंदिर है। इसको ‘प्रदिमोक्ष’ वन भी कहा जाता है। अनेक सदियों से यह स्थान जनसामान्य की दृष्टि से ओझल था। 1896 ई में डॉ. फ्यूहरर ने अशोक स्तम्भ की खोज की थी। 1990 ई के प्रारम्भ में उत्खनन में प्राप्त शिलालेखों से इस बात की पुष्टि हो गयी कि भगवान बुद्ध का जन्म इसी स्थान पर हुआ था। चीनी यात्री फ़ाहयान और हुआन त्सांग ने भी इसका वर्णन किया है। कुछ समय से पुरातत्त्वविद यहाँ पर उत्खनन कर पुरातत्त्वशेषों का संरक्षण कर रहे हैं। वर्तमान में माया देवी मंदिर के इर्द-गिर्द चारदीवारी है। इसके भीतर प्राचीन मंदिर के अवशेष संरक्षित हैं।

बुद्ध जन्म का दृश्य-

मान्यता के अनुसार मायादेवी ने लुम्बिनी के एक तालाब के किनारे अपने ऊपर के पेड़ की एक शाखा को हाथ में लिए खड़ी अवस्था में ही बुद्ध को जन्म दिया था। तीनों लोकों के देव-ब्रह्मा, विष्णु,महेश स्वयं बुद्ध को अपने हाथों में लेने के लिए वहाँ पधारे थे। किंवदंती के अनुसार जन्म के तुरंत बाद सिद्धार्थ सात कदम चले थे। उनके चरणों ने जहां धरती का स्पर्श किया वहाँ कमल के पुष्प खिल उठे। इस घटना को बुद्ध के जीवन की पहली चामत्कारिक घटना माना जाता है। बुद्ध जन्म के इस दृश्य का चित्रांकन अनेक बौद्ध स्थलों में देखने को मिलता है। इस दृश्य में मायादेवी के साथ बुद्ध की दाई प्रजापति गौतमी का चित्र भी है।

बाल बुद्ध-

जन्म प्रतिमा कक्ष –

4.8 कि.मी लम्बे तथा 1.6 कि.मी चौड़े लुम्बिनी क्षेत्र में अनेक स्मारक हैं। वर्तमान मंदिर सफ़ेद पत्थरों से निर्मित है। मंदिर के भीतर प्राचीन मंदिर व स्तूप अवस्थित हैं। यहीं एक तरफ बड़ी-बड़ी ईंटों को चौरस आकार में रखा हुआ है। इस सभामंडप जैसे स्थान की एक दीवार पर एक प्रतिमा उत्कीर्ण है। प्रतिमा की आकृति धूमिल पड़ गयी है।यह अन्य स्थानों पर उत्कीर्ण माया देवी की प्रतिमा के सदृश दिखाई देती है। इस कक्ष में केवल बुद्ध के जन्म को दर्शाती प्रतिमाएँ हैं। संभवतः पुरातत्त्वविदों ने इसीलिए इस कक्ष को ‘जन्म प्रतिमा कक्ष’नाम दिया है।

सीमा शिला-

‘जन्म प्रतिमा कक्ष’ के कुछ फुट नीचे एक शिला पत्थर रखा हुआ है। अनियमित आकार की इस शिला पर मानव पैर का हल्का निशान है। मान्यता है कि यह निशान बाल सिद्धार्थ के पाँव का निशान है। इस को सुदृढ़ काँच के केस में संरक्षित रखा हुआ है। इसके पास अगणित सिक्के राके हुए हैं। इन को श्रद्धालु भक्ति भाव से यहाँ पर भेंट स्वरूप रख जाते हैं। इस शिला को देखने के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है।

अशोक स्तम्भ-

माया देवी मंदिर के पीछे अशोक स्तम्भ स्थित है। इस पर पाली भाषा में लिखा हुआ है कि सम्राट अशोक स्वयं भगवान बुद्ध के जन्म स्थान के दर्शन करने के लिए लुम्बिनी आए थे और इस स्तम्भ को स्थापित करवाया था। स्तम्भ पर लिखा है-‘ हिता बुद्धे जाते शाक्यमुनिती’ अर्थात शाक्य मुनि बुद्ध का जन्म इसी स्थान पर हुआ था।

पुष्करिणी (पवित्र तालाब)-

यह पवित्र तालाब माया देवी मंदिर के साथ ही स्थित है। सिद्धार्थ के जन्म के बाद माया देवी ने इस तालाब में स्नान किया था। बौद्ध धर्मावलम्बी इस स्थान को अत्यधिक पवित्र मानते हैं। वर्तमान तालाब नवनिर्मित है। इस तालाब के पास एक बोधि वृक्ष है। समीप ही बुद्ध को समर्पित एक छोटा सा मंदिर है। यहाँ कुछ बोधिवृक्षों के नीचे लकड़ी के गोलाकार पटरे रखे हैं। इन पर भक्त जन ध्यान,साधना करते हैं। यही नहीं इन वृक्षों पर कतार में रंग-बिरंगे झंडे फहरा रहे हैं।

स्तूप

मंदिर के आसपास अनेक स्तूप हैं। अधिकांश स्तूपों के अवशेष बचे हैं । कुछ स्तूप वर्गाकार आधारशिला पर निर्मित हैं तो कुछ गोलाकार आधारशिला पर। 16 स्तूपों के आधार को ‘मन्नत स्तूप’ कहते हैं। मन्नत पूरी होने के बाद श्रद्धालुओं ने इन का निर्माण करवाया था।

संग्रहालय-

अब तक जो स्थान खंडहर प्रतीत होता था, पुनर्निर्माण के बाद भक्तगणों के मंत्रोच्चारण से जीवंत हो उठा है। लुम्बिनी विकास न्यास ने एक महत्त्वाकांक्षी योजना के अंतर्गत इसको विश्वस्तरीय पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने का निर्णय लिया है। इस दृष्टिकोण से इस क्षेत्र को नहर के माध्यम से दो भागों में बांटा गया है। नहर के एक ओर लाल रंग की ईंटों से आधुनिक स्थापत्य शैली में निर्मित संरचना लुम्बिनी संग्रहालय है। यहाँ आस्ट्रेलिया मंदिर में माया देवी की चित्ताकर्षक प्रतिमा है। चीनी मंदिर में हुआन त्सांग की भव्य प्रतिमा स्थित है। जर्मन मंदिर में अप्रतिम, मनोरम भित्ति चित्र उत्कीर्ण हैं। नेपाल मंदिर में बुद्ध की विशाल प्रतिमा मुग्धकारी है। संग्रहालय का भवन चित्ताकर्षक है लेकिन भीतर मौलिक कलाकृतियों के स्थान पर उनकी प्रतिकृतियाँ रखी हुई हैं। विशिष्ट बौद्ध स्थलों के छाया चित्र भी देखे जा सकते हैं।

लुम्बिनी उद्यान-

यह शांत मनोरम स्थल है। यहाँ पर सुंदर पक्षी और रंग-बिरंगी तितलियाँ देख कर तन-मन में नूतन ऊर्जा का संचरण हो जाता है। सर्दी के मौसम में यहाँ की झीलों में सारस इत्यादि अनेक प्रवासी पक्षी डेरा डाले रखते हैं। लुम्बिनी घने जंगलों के बीच एक विशाल उद्यान है।

परम ज्योति, लुम्बिनी उद्यान-

केंद्र में बह रही नहर में नौका में सैर करते समय नहर के दक्षिण छोर पर 1986 ई से प्रज्वलित परम ज्योति दिखाई देती है। यह विश्व में शांति, सौहार्द के संदेश का प्रतीक है।

विश्व शांति मंदिर-

विश्व शांति मंदिर के नाम से प्रसिद्ध शांति का प्रतीक जापान का शांति पेगोडा पर्यटकों के विशिष्ट आकर्षण का केंद्र है। । प्रमुख परिसर के बाहर स्थित पारम्परिक पेगोडा शैली में निर्मित भव्य संरचना है। जापान के बौद्ध श्रद्धालु ने इसके निर्माण पर एक मिलियन डालर खर्च किए थे। सफ़ेद रंग की इस संरचना में भगवान बुद्ध की स्वर्णिम प्रतिमा स्थित है। भव्य संरचना के केंद्र में गुंबद है। वहाँ तक पंहुचने के लिए सीढ़ियाँ हैं। दूसरी मंज़िल पर गुंबद के इर्द-गिर्द परिपथ है। विश्व शांति के प्रतीक इस शांत, सौम्य स्थल पर जाने पर पर्यटकों को अहिंसा तथा एकात्मकता की अनुभूति होती है।

अन्य दर्शनीय मंदिर व विहार-

नहर के माध्यम से दो भागों में बंटे इस क्षेत्र के एक ओर माया देवी का मंदिर है तो दूसरी ओर सफ़ेद रंग का विशाल विश्व शांति पेगोडा स्थित है। नहर के पश्चिम में कोरिया, चीन, जर्मनी, कनाडा, आस्ट्रिया, वियतनाम, लद्दाख, नेपाल के महायान सम्प्रदाय के मंदिर हैं।पूर्व में थेरवाद सम्प्रदाय के म्यांमार, कम्बोडिया के मंदिर हैं। दोनों ओर के मंदिरों में पृथक-पृथक ध्यान केंद्र हैं।पूरे क्षेत्र का भ्रमण करने के लिए काफी पैदल चलना पड़ता है।

कोरिया का भव्य विहार-

कोरिया की विशिष्ट स्थापत्य शैली में निर्मित यह विहार ‘दाए-शुंग-शाक्य-सा’ के नाम से प्रसिद्ध है। इसकी छत पर सुंदर, चित्ताकर्षक चित्र उत्कीर्ण हैं। श्रद्धालुओं व अन्य तीर्थयात्रियों के लिए यहाँ पर कुछ दिन रहने व खाने-पीने की व्यवस्था है। कुछ दिन रहने पर यात्रियों को जीवन में उपलब्ध नित्यप्रति की सुविधाओं से विरक्त बौद्ध भिक्षुओं का आत्मसंयम से परिपूर्ण शांत जीवन देखने को मिलता है।उसको देखने पर सुखद आत्मानुभूति होती है।

म्यांमार का स्वर्णिम मंदिर-

मंदिर परिसर में म्यांमार स्वर्णिम मंदिर प्राचीनतम संरचनाओं में से एक है।बागान मंदिरों की शैली के अनुरूप इसका नुकीला शिखर सर्वाधिक चित्ताकर्षक है। भीतर तीन प्रार्थना सभागार हैं। मंदिर के प्रांगण में दक्षिण बर्मा की शैली में निर्मित विशाल स्वर्णमंडित ‘लोकमनी पुला पेगोडा’ है।

कंबोडियन विहार-

कम्बोडिया के प्रख्यात मंदिर ‘अंगकोर वत’ मंदिर की स्थापत्य शैली के अनुरूप ही यह विहार निर्मित है। यह संरचना बहुत मुग्धकारी और ऊर्जा से परिपूर्ण है। प्रमुख आकर्षण है बाहर की चौकोर रेलिंग पर बने 50 मीटर हरे रंग के साँप। बाहर दीवारों पर मनमोहक, सूक्षम चित्र उत्कीर्ण हैं।

विशेष-

लुम्बिनी के विशाल क्षेत्र में केवल धार्मिक स्थलों के निर्माण की ही अनुमति है। दुकानें,होटल, रेस्टौरेंट स्थापित करने की अनुमति नहीं है।

काठमाण्डू से सड़क मार्ग से लुम्बिनी पंहुचने में पाँच घंटे लगते हैं और भैरहवा से तीस मिनट का रास्ता है। भैरहवा में समीपस्थ एयरपोर्ट गौतम बुद्ध एयरपोर्ट है।

लुम्बिनी नेपाल की तराई में पूर्वोत्तर रेलवे की गोरखपुर-नौतनवाँ लाइन के नौतनवाँ स्टेशन से बीस मील और गोरखपुर-गोंडा लाइन के नौगढ़ स्टेशन से दस मील दूर है। नौगढ़ से वहाँ तक जाने के लिए पक्की सड़क है। जाने के लिए वाहन सुविधापूर्वक मिल जाते हैं।

लुम्बिनी जाने के लिए अक्तूबर-दिसम्बर और अप्रैल-मई का समय सर्वोत्तम है।

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प्रमीला गुप्ता

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