प्रकृति का चमत्कार-ग्रैंड कैन्यन

उत्तरी एरिज़ोना में स्थित ग्रैंड कैन्यन संयुक्त राज्य अमेरिका में पर्यटकों का सर्वाधिक आकर्षण का केंद्र है। विशाल भाग में अनेक अलग-अलग खंड हैं। ग्रैंड कैन्यन नेशनल पार्क इस का सबसे बड़ा खंड है। ग्रैंड कैन्यन सदृश चामत्कारिक, मुग्धकारी दृश्यावली पृथ्वी पर संभवतः कहीं अन्यत्र दिखाई न दे। इसका सौंदर्य वर्णातीत है। शब्दों अथवा चित्रों की परिधि में बांध पाना दुरूह ही नहीं दुस्साहस भी होगा। दर्शक इसे देख कर चित्रलिखित से रह जाते हैं। उनको अपनी आँखों पर विश्वास नहीं होता, बार-बार आँखें मलते हैं, बारबार प्रकृति के इस अजूबे को निहारते हैं। अनन्तकाल से बह रही कोलेरेडो नदी के वेग से कोलेरेडो के रेतीले, बंजर पठार में डेढ़ कि.मी गहरी सर्पीली, बलखाती दरारें डाल दी हैं।

यद्यपि ग्रैंड कैन्यन विश्व की सबसे गहरी घाटी नहीं है तथापि अपने आकार और चित्ताकर्षक परिदृश्य के कारण सम्पूर्ण विश्व के पर्यटकों के विशिष्ट आकर्षण का केंद्र है। प्रकृति के इस अनन्तकालीन चामत्कारिक सौंदर्य की अनुभूति सर्वप्रथम अमेरिका के राष्ट्रपति थियोडोर रूज़वेल्ट ने की थी। 1903 ई में वे यहाँ पर भ्रमणार्थ आए थे। वे यहाँ के प्राकृतिक सौंदर्य को देख कर मंत्रमुग्ध रह गए थे। उसके बाद भी उन्होने यहाँ की कई बार यात्रा की। उस समय कुछ व्यवसायी इस क्षेत्र को पर्यटन स्थल के दृष्टिकोण से रेलमार्ग से जोड़ने तथा कैन्यन के दोनों किनारों पर होटल निर्माण की योजना बना रहे थे। राष्ट्रपति रूज़वेल्ट यह देख कर चिंतित हो गए। 1908 ई में उन्होने प्रकृति की इस अमूल्य धरोहर को ‘एंटिक्विटी एक्ट’ के अंतर्गत राष्ट्रीय स्मारक घोषित कर दिया।

इस घोषणा से नाराज़ हो कर स्थानीय व्यवसायी रेल्फ कैमरून ने फेडरल गवर्नमेंट पर मुक़द्दमा दायर कर दिया। लम्बी लड़ाई के बाद 1920 ई में सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति रूज़वेल्ट के निर्णय को वैधता प्रदान कर दी। राष्ट्रपति रूज़वेल्ट के निर्णय के फलस्वरूप न केवल अमेरिका के अपितु सम्पूर्ण विश्व के पर्यटक ग्रैंड कैन्यन के मुग्धकारी सौंदर्य का आनंद ले रहे हैं तथा भविष्य में भी लेते रहेंगे।1979 ई में यूनेस्को की विश्व विरासत समिति ने इसको विश्व विरासत के रूप में मान्यता प्रदान कर दी।

इतिहास-

ग्रैंड कैन्यन से पृथ्वी के अनंतकालीन भूगर्भीय इतिहास का पता चलता है। 277 मील लम्बी,18 मील चौड़ी और 6,093 फीट से अधिक गहरी घाटी की दीवार की चट्टानें पृथ्वी के इतिहास की एक समयरेखा बताती हैं। इसकी गठन प्रक्रिया 70 मिलियन साल पहले आरंभ होने की संभावना है लेकिन प्रमुख भाग लगभग छह मिलियन साल पहले आकार लेने लगे थे।

ग्रैंड कैन्यन-

ग्रैंड कैन्यन दो प्रमुख खंडों में विभाजित है-1-दूरस्थ उत्तरी रिम, 2- अधिक सुलभ दक्षिणी रिम। घाटी का छोटा दक्षिण-पश्चिमी भाग दो भागों में अवस्थित है-हवापाई और वलापायी। घाटी के प्रत्येक क्षेत्र का अपना विशिष्ट आकर्षण है तथा आगंतुक के मनोरंजन के लिए विभिन्न साधन हैं। पार्क में एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने के लिए दो विकल्प हैं-पैदल अथवा कार( बस)। 34 कि.मी दो लम्बी पगडंडियाँ पार्क के दोनों भाग-उत्तरी रिम तथा दक्षिणी रिम को कोलेरेडो नदी के ऊपर निर्मित ‘काइबा सस्पेंशन ब्रिज’ जोड़ता है। दक्षिणी रिम उत्तरी रिम से 354 कि. मी दूर है। कार से यात्रा करने में पाँच घंटे लग जाते हैं। लैंडस्केप, जलवायु तथा वनस्पति के दृष्टिकोण से उत्तरी और दक्षिणी रिम सर्वथा पृथक हैं। एक पार्क में दो पार्क की तरह हैं। एक ही दिन में घाटी के दोनों किनारों की यात्रा करना असंभव है।

दक्षिणी रिम-

ग्रैंड कैन्यन राष्ट्रीय उद्यान पहली बार जाने पर दक्षिणी रिम से अपनी यात्रा आरंभ करनी चाहिए। यह अधिक सुविधाजनक व आनंदप्रद है। दक्षिणी रिम पूरा साल ,24 घंटे खुला रहता है। आगंतुकों के लिए शिविर, होटल, रेस्तरां आदि की सभी सेवाएँ पूरा साल उपलब्ध रहती हैं। यहाँ स्थित ग्रैंड कैन्यन विलेज संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रीय ऐतिहासिक स्थलों की सूची में सम्मिलित है।

यह गाँव पूरी तरह से पर्यटकों की सेवा पर केन्द्रित है। इस गाँव से रेलवे घाटी तक रास्ता जाता है। 1901ई में विलियम्स शहर से दक्षिणी रिम तक रेलवे के निर्माण के लिए बसाया गया था यह गाँव। गाँव में अनेक ऐतिहासिक इमारतें हैं । इसका ऐतिहासिक केंद्र अमेरिका के राष्ट्रीय ऐतिहासिक स्थलों की सूची में सम्मिलित है।

विजिटर सेंटर-

विजिटर सेंटर से ग्रैंड कैन्यन के किनारों की यात्रा, विशिष्ट दर्शनीय स्थलों की जानकारी, नीचे जाने के लिए अनुभवी गाइड के साथ कोलेरेडो नदी में राफ्टिंग संबंधी विस्तृत जान कारी प्राप्त की जा सकती है। विजिटर सेंटर तथा अन्य विशिष्ट स्थानों पर तैनात वन अधिकारी मानव विकास के इतिहास, वनस्पतियों , फूलपौधों, वन्यप्राणियों एवं भूगर्भ के बारे में रोचक जानकारी प्रदान करते हैं।

लुक आउट स्टुडियो-

Lookout Studio, Grand Canyon

1914 ई में पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रख कर वास्तुकार कोल्टर के डिजाइन के अनुरूप लुक आउट स्टुडियो के निर्माण में स्थानीय चट्टानों का उपयोग किया गया था। यह इमारत अमेरिकी राष्ट्रीय ऐतिहासिक स्थलों के रजिस्टर में सूचीबद्ध है। यहाँ से घाटी की मनमोहक दृश्यावली दिखाई देती है। घाटी की देखरेख के लिए बाहरी छत पर दूरबीनें लगी हैं। घाटी से संबद्ध पुस्तकों की प्रदर्शनी और स्मारिका की एक दुकान है।

19वीं सदी के अंत में सभी मूल आदिवासी जन- जातियाँ विलुप्ति के कगार पर थीं। उस समय अमेरिकियों के विचार में निकट भविष्य में सभी मूल आदिवासियों की बीमारी और सफ़ेद लोगों के संपर्क में आने के कारण पूरी तरह से विलुप्त हो जाने की संभावना थी। कुछ यात्रा कंपनियों ने विशेष रूप से दक्षिण-पश्चिम के यात्रियों को इन विलुप्त हो रहे आदिवासियों की जीवनशैली से परिचित करवाने की योजना बनाई। 19वीं शताब्दी के मानकों के अनुसार ‘होपी’ जन जातियों को सभ्य माना जाता था क्योंकि वे पत्थरों के घरों में स्थायी रूप से रहते थे। घर विशिष्ट स्थापत्य शैली के आधार पर निर्मित तथा शांतिपूर्ण थे। पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए सांता फे रेल रोड ने दक्षिण रिम पर एक ‘होपी हाउस’ बनाया। आर्किटेक्ट कोल्टर ने पारंपरिक प्युब्लो स्थापत्य शैली में इसका निर्माण करवाया था। यहाँ पर आगंतुक होपी कारीगरों के शिल्प को देख सकते थे, उनका बनाया हुआ सामान खरीद सकते थे। वर्तमान में इसके भीतर दुकानें, प्रदर्शनी और एक संग्रहालय है।

मार्केट प्लाज़ा-

यह ग्रैंड कैन्यन का शॉपिंग सेंटर है। यहाँ पर सुपरमार्केट, अन्य दुकानें, एक बैंक, एक पोस्टऑफिस और एक कैफे है। मार्केट प्लाज़ा में एक बड़ी कार पार्किंग भी है। किराने की दुकानें, डिपार्टमेंटल स्टोरों की पूरी शृंखला, कपड़े, स्मृति चिन्ह, कैंपिंग के लिए और घाटी में लम्बी यात्रा के लिए आवश्यक सभी सामान किराए पर उपलब्ध है। पूरा साल, प्रतिदिन सुबह 8 बजे से शाम 7 बजे तक खुला रहता है। खुलने का अतिरिक्त समय मौसम के अनुसार बदलता रहता है।

यावपय संग्रहालय भूविज्ञान-

मार्केट प्लाज़ा से 1.6 कि.मी दूर है यावापय भूविज्ञान संग्रहालय में थ्री डी मॉडलों, चित्रों , वृत्तचित्रों के माध्यम से ग्रैंड कैन्यन के जटिल भूगर्भीय इतिहास के बारे में जानकारी प्रदान की जाती है। प्रदर्शनियों द्वारा रॉक लेयर्स की गठन प्रक्रिया तथा कोलेरेडो पठार को ऊपर उठाने तथा ग्रैंड कैन्यन को तराशने की प्रक्रिया समझायी जाती है। संग्रहालय स्मृति चिन्हों के लिए सुंदर स्थान है। यावापय संग्रहालय के समीप ही भूविज्ञान का यावपई पायण्ट पर्यवेक्षण डेक है।

ग्रैंड कैन्यन ट्रेन स्टेशन-

लकड़ी से निर्मित यह ऐतिहासिक रेलवे स्टेशन ग्रैंड कैन्यन विलेज के केंद्र में स्थित है। 1909-1910 ई के मध्य सांता फे कंपनी ने इसका निर्माण करवाया था। यह संयुक्त राज्य अमेरिका में लकड़ी से निर्मित तीन स्टेशनों में से एक है। स्टेशन एल टावर होटल के सामने घाटी के किनारे से केवल 100 मीटर की दूरी पर है। 100 से अधिक सालों से यह पर्यटकों के आगमन और प्रस्थान के लिए प्रारम्भिक बिन्दु के रूप में काम कर रहा है। स्टेशन संयुक्त राज्य अमेरिका के ऐतिहासिक स्मारकों के रजिस्टर में सूचीबद्ध है।

आकर्षण के अन्य प्रमुख स्थल हैं- ‘कुप्पी स्टूडियो'( कोलब स्टुडियो); ‘बकी ओ’नील हाउस’; ‘माथर प्वायंट’।

दक्षिणी रिम लुक आउट-हर्मिट्स रेस्ट रोड-

दक्षिणी रिम के अवलोकन केंद्र दो प्रमुख सड़कों पर स्थित हैं। हर्मिट्स रेस्ट रोड और डेज़र्ट व्यू ड्राइव। हर्मिट्स रेस्ट रोड ‘वेस्ट ड्राइव रिम’ के नाम से भी जानी जाती है। यह हर्मिट्स रेस्ट टर्मिनस के ग्रैंड कैन्यन सूचना केंद्र के समीप स्थित हर्मिट्स रेस्ट ट्रांसफर स्टॉप से 11 कि.मी लम्बा मार्ग है। घाटी के किनारे नौ अवलोकन स्थल हैं। यह मार्ग अत्यधिक लोकप्रिय है। इस पर राष्ट्रीय पार्क की निःशुल्क बसें तथा वाणिज्यिकी बसें चलती हैं। घाटी के किनारे, हर्मिट रेस्ट रोड ने पैदल चलने वालों और साइकिल चालकों के लिए समानान्तर 12.6 कि.मी रास्ता तैयार किया है। यहाँ पर स्वतंत्र रूप से यात्रा तथा भिन्न स्थलों से चित्ताकर्षक दृश्यावली देखी जा सकती है।

मारीकोपा प्वायंट से पुरातन खदानों के पुरातत्त्वशेष तथा 1893 ई में ताँबे, चांदी और वेनेडियम की खदानें और 1956 ई से 1969 ई तक यहाँ की संयुक्त राज्य में यूरेनियम की सबसे बड़ी खदान देखी जा सकती है। उस समय यह खदान पूरे अमेरिका में यूरेनियम का सबसे समृद्ध स्रोत था।

होपी प्वायंट के अवलोकन स्थल से सूर्यास्त और सूर्योदय का मनोहारी दृश्य दिखाई देता है। यहाँ से पश्चिम में कोलेरेडों नदी की सुंदर दृश्यावली दिखाई देती है। इनके अतिरिक्त मोज़ावे प्वायंट,हर्मिट रेस्ट अन्य अवलोकन मंच है।

डेज़र्ट व्यू ड्राइव रोड-

डेज़र्ट व्यू ड्राइव 42 कि.मी लम्बी है। यह ईस्ट रिम ड्राइव के नाम से भी जानी जाती है। यह ग्रैंड कैन्यन विलेज से ले कर डेज़र्ट व्यू वाच टावर और राष्ट्रीय उद्यान के पूर्वी प्रवेश द्वार तक विस्तीर्ण है। डेज़र्ट व्यू वाच टावर से अनेक अवलोकन स्थलों तक सड़क जाती है। प्रमुख हैं-मोरन प्वायंट । यहाँ अवलोकन डेक पर जाने के लिए छोटी साइड रोड है। इस का नाम लैंडस्केप चित्रकार थॉमस मोरन के नाम पर रखा गया था। उन्होने 1873 ई में कोलेरेडो नदी के किनारे एक वैज्ञानिक अभियान में भाग लिया था तथा घाटी को लोकप्रिय बनाने में सहायता की। फलस्वरूप 1908 ई में राष्ट्रीय स्मारक तथा 1919 ई में राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना हुई। 1873 ई में मोरन द्वारा बनाई गयी ग्रैंड कैन्यन की एक पेंटिंग अमेरिकी कांग्रेस की दीवार पर लटकी हुई है।

तुसयान खंडहर-

तुसयान खंडहरों में छिपा है ग्रांड कैन्यन का लम्बा मानव इतिहास। इन खंडहरों और समीपस्थ संग्रहालय में 800 साल पहले प्युबलो इंडियंस की जीवनशैली, सभ्यता, संस्कृति का चित्रण देखने को मिलता है। यह डेज़र्ट व्यू टावर से 5 कि. मी पश्चिम में स्थित है। यहाँ से पार्क के वन अधिकारियों के साथ खंडहर और संग्रहालय का भ्रमण करने की सुविधा उपलब्ध है।

डेज़र्ट व्यू वाच टावर-

प्रसिद्ध वास्तुकार मैरी काल्टर ने इसको प्रागैतिहासिक अमेरिकी टावर के मूल डिजाइन केअनुरूप निर्मित करवाया था। 1932 ई में निर्मित चार मंज़िला 21 मीटर ऊंचा टावर दक्षिणी रिम का सर्वोच्च शिखिर है। टावर की निचली मंज़िल पर स्मृति चिन्हों की दुकान और कैफ़े है। ऊपरी मंज़िलों से कोलेरेडो नदी की सुंदर दृश्यावली दिखाई देती है। टावर की भीतरी दीवारों को कलाकार फ्रेड काबोती ने सुंदर भित्तिचित्रों से सजाया है। 28 मई, 1987 से टावर यू.एस राष्ट्रीय ऐतिहासिक स्थलों की सूची में सम्मिलित है।

उत्तरी रिम-

ग्रैंड कैन्यन के उत्तरी रिम की यात्रा कठिन एवं दुरूह है । पूर्ण रूप से स्वस्थ एवं अभ्यस्त पर्यटक ही इस यात्रा का आनन्द ले पाते हैं। उत्तरी किनारे की वादियों में बसे छिटपुट आदिवासियों के रोचक एवं मनोरंजक किस्से सुन कर मन खुश हो जाता है। यहाँ का सर्वाधिक लोकप्रिय प्वायंट ‘ब्राइट एंजल प्वायंट’ है। इसकी लोकप्रियता का कारण है समीपस्थ ग्रैंड कैन्यन लॉज काटेज़ और उत्तरी रिम विजिटर सेंटर है।

देवदार वृक्षों के सघन जंगलों में बनी प्राकृतिक पगडंडियों पर चलते हुए यहाँ के मुग्धकारी दृश्य को आत्मसात किया जा सकता है। किनारे के किसी समतल स्थान से नीचे झाँकने पर मिस्र के पिरामिड, एज़टेक मंदिर सदृश अनेक भव्य गुंबद व आकृतियाँ दिखाई देती हैं

फ़ैन्टम रेंच-

कोलेरेडो नदी के उत्तर में दो नदियों के संगम पर फैन्टम क्रीक और ब्राइट एंजल क्रीक के समीप एक छोटा सा गाँव फैन्टम रेंच स्थित है। ग्रैंड कैन्यन के कारण इस की लोकप्रियता में भी निरंतर वृद्धि हो रही है। अमेरिका के राष्ट्रीय उद्यानों में फैन्टम रेंच सर्वाधिक लोकप्रिय स्थान है। इसके कमरों को प्रायः एक साल पहले बुक कर लिया जाता है।

फैन्टम रेंच में काटेज़,पुरुषों ,महिलाओं के लिए दो डोरमीटरी, एक रेस्तरां, एक आपातकालीन कक्ष, एक रेंजर स्टेशन,एक कैम्प ग्राउंड तथा कोलेरेडो नदी में राफ्टिंग पर्यटन में भाग लेने वालों के लिए एक समुद्र तट है । मकान स्थानीय पत्थरों तथा लकड़ी से निर्मित हैं। उद्यानों के बीच खेत तक पगडंडियों पर पैदल चल कर अथवा खच्चरों पर बैठ कर पंहुचा जा सकता है।

सभ्यता-संस्कृति से परिचय-

ग्रैंड कैन्यन नेशनल पार्क में अनेक म्यूज़ियम व विजिटर सेंटर हैं । इनमें आडियो,वीडियो, चित्रों, पोस्टरों के माध्यम से ग्रैंड कैन्यन की उत्पत्ति, विकास, इतिहास, एवं भूगर्भीय विशेषताओं को अतीव सुंदर व रोचक ढंग से प्रस्तुत किया जाता है। यहाँ की ‘श्राइन ऑफ एजिस’ में पिछले पैंतीस साल से अगस्त-सितंबर के बीच संगीत समारोह आयोजित किया जाता है। इसमें विश्व प्रसिद्ध संगीतकार भाग लेते हैं।

मानसिक तथा शारीरिक रूप से स्वस्थ पर्यटक यहाँ पर पैदल यात्रा का आनंद ले सकते हैं। टेढ़े-मेढ़े, ऊबड़-खाबड़ रास्तों और गर्मी के कारण यात्रा में कठिनाई अवश्य होती है। कठिन होने पर भी पैदल चलते हुए नीचे की मुग्धकारी दृश्यावली देखने का अपना अलग आनंद और रोमांच है।

यात्रा से लौटते समय ग्रैंड कैन्यन के दक्षिणी रिम पर स्थित वरकैम्प स्टोर अवश्य जाएँ। 1906 ई में वरकैम्प ने पर्यटकों के लिए यह स्टोर खोला था। आज भी यह स्टोर पर्यटकों की सेवा कर रहा है। यहाँ पर आदिवासियों द्वारा तैयार क्या गया हस्तशिल्प का सामान

और स्मृति चिन्ह मिलते हैं।

विशेष-कैसे जाएँ?

एरिज़ोना की राजधानी फोएनिक्स सम्पूर्ण विश्व के साथ हवाई मार्ग से जुड़ी है। फोएनिक्स के अंतर्राष्ट्रीय एयर पोर्ट पर उतरने के बाद राष्ट्रीय विमान सेवा अथवा कार/ टैक्सी से ग्रैंड कैन्यन पंहुच सकते हैं। राष्ट्रीय उद्यान की यात्रा सुविधाजनक बनाने के लिए अपनी कार/टैक्सी कारपार्क में छोड़ दें तथा निःशुल्क बस सेवा का उपयोग करें। पार्क के प्रवेश द्वार पर निःशुल्क समाचार पत्र गाइड लें। इसमें सभी कार पार्कों का नक्शा रहता है।

कब जाएँ?

मई से सितंबर के मध्य पर्यटकों की भीड़ रहती है। आराम से घूमने-फिरने के लिए संभव हो तो यह समय न चुनें।

क्या ले जाएँ?

बढ़िया मजबूत जूते,हैट, धूप का चश्मा,दूरबीन, फ्लैशलाइट तथा मौसम के अनुरूप कपड़े ले जाएँ।

ग्रैंड कैन्यन की यात्रा की योजना बनाने से पहले ठहरने, भोजन व अन्य जानकारी के लिए पार्क की वेब साइट पर संपर्क कर सकते हैं।

==================================

प्रमीला गुप्ता

विश्व के सात अजूबों में से एक- भव्य कोलोसियम-

विश्व विख्यात रोमन साम्राज्य रोम! विकसित सभ्यता और समृद्ध संस्कृति का स्वामी रोम! रोम यूरोप के भव्य देश इटली की राजधानी है। यहीं रोम के केंद्र में विद्यमान है विशाल ‘कोलोसियम’। मूल लेटिन नाम ‘एम्फीथियेटर फ्लावियम’ है। अंग्रेज़ी में इसको ‘फ्लावियम एम्फीथियेटर’ कहते हैं। यह विश्व के नए सात अजूबों में से एक है। 1980 ई में यूनेस्को ने इसको विश्व विरासत के रूप में मान्यता प्रदान कर दी थी। फ्लावियन वंश के संस्थापक वेस्पेसियन के नाम पर ही इसका नाम ‘फ्लावियम एम्फीथियेटर’ रखा गया। विश्व में यह एम्फीथियेटर ‘कोलोसियम’ के नाम से प्रसिद्ध है।

इस स्थान पर पूर्ववर्ती रोमन सम्राट नीरो ने अपने ऐश-ओ-आराम, शान-शौकत का प्रदर्शन करने के लिए कृत्रिम झील, उसके चारों तरफ बाग,पैवेलियन और पोर्टिको बनवा रखे थे। यहीं पर उसने अपनी एक विशाल कांस्य प्रतिमा का निर्माण करवाया। संभवतः उस विशाल (Collosal)प्रतिमा के कारण ही इस विशाल संरचना का नाम ‘कोलोसियम’ पड़ गया था। उस ऐश्वर्य और सुख-समृद्धि का उपभोग केवल नीरो ही कर सकता था।

निर्माण-

वेस्पेसियन नीरो अधिकृत इस साम्राज्य के ऐश्वर्य का उपभोग जनसामान्य के साथ मिल कर करना चाहता था। उसने इस वैभवसंपन्न राजप्रासाद तथा कृत्रिम झील को तुड़वा कर एक विशाल नए एम्फीथियेटर का निर्माण आरंभ करवाया। उसने केवल नीरो की कांस्य प्रतिमा को यथा स्थान रहने दिया । रोम की जनता के मनोरंजन को ध्यान में रख कर उसने इसका निर्माण नगर के केंद्र में करवाया तथा निर्माण पूरा होने पर जनता के लिए खोल दिया गया। ‘कोलोसियम’ रोम की सांस्कृतिक पहचान बन गया। यह रोमन स्थापत्य कला तथा इंजीनियरिंग का उत्कृष्ट नमूना है।

सन 70-72 में तत्कालीन रोमन सम्राट वेस्पेसियन ने इसका निर्माण कार्य आरंभ करवाया था। दुर्भाग्यवश यह उनके जीवन काल में पूरा नहीं हो पाया। तीसरी मंज़िल तक ही बना था कि सन 79 में उनकी मृत्यु हो गयी। उनके बेटे टाइटस ने निर्माण कार्य जारी रखा और निर्माण पूरा करवाया। बाद में वेस्पेसियन के छोटे बेटे ने इसमें अनेक परिवर्तन करवाए।

नवनिर्मित कोलोसियम के एक अभिलेख पर लिखा है-” युद्ध में जनरल के रूप में प्राप्त धन-सम्पदा से सम्राट वेस्पेसियन ने इस एम्फीथियेटर का निर्माण करवाया था।” सन 70 में वेस्पेसियन ने महान यहूदी क्रान्ति पर विजय प्राप्ति की थी। रोम परम्परा के अनुरूप विजय प्राप्ति के उपलक्ष्य में इस विशाल स्मारक का निर्माण करवाया गया था।

सन 80 में सम्राट टाइटस ने ‘कोलोसियम’ का उदघाटन किया था। उदघाटन समारोह के अवसर पर आयोजित खेलों में 9,000 जंगली जानवर मारे गए थे।उदघाटन के उपलक्ष्य में स्मारक सिक्का भी जारी किया गया था।

वेस्पेसियन के छोटे बेटे डोमिशियन ने ‘कोलोसियम’ में अनेक संशोधन करवाए। अधिक लोगों के बैठने के लिए सबसे ऊपरी मंज़िल के ऊपर एक गैलेरी बनवाई।

एक भूमिगत सुरंग का निर्माण भी करवाया। ग्लेडिएटर्स ( योद्धाओं) के लिए प्रशिक्षण केंद्र और आयुधाभंडार भी बनवाए। एम्फीथियेटर में लोगों के मनोरंजन के लिए ग्लेडिएटरों यानि योद्धाओं और जानवरों की लड़ाइयाँ लड़वाई जाती थी। समय-समय पर पौराणिक कथाओं पर आधारित नाटकों का मंचन भी किया जाता था।

संरचना-

‘फ्लावियम एम्फीथियेटर’ ( कोलोसियम) के निर्माण से पहले थियेटर का निर्माण सामान्यतः पर्वतों के समीप किया जाता था लेकिन कोलोसियम पूर्ण रूप से स्वतंत्र तथा समतल भूमि पर निर्मित है। छह एकड़ भूमि पर विस्तीर्ण 189 मीटर लम्बा और 156 मीटर चौड़ा है। बाहरी दीवार 48 मीटर ऊंची है। आखाडा( लड़ाई का मैदान) अंडाकार है। यह 287 फुट लम्बा और 18 फुट चौड़ा है। इसके चारों तरफ 15 फुट ऊंची दीवार है। उसके ऊपर दर्शकों के कतारबद्ध बैठने की व्यवस्था है।

बाहरी दीवार के निर्माण में लगभग एक लाख क्यूबिक मीटर पत्थर इस्तेमाल किए गए थे। ये बिना किसी मसाले के लोहे के 300 टन शिकंजों के साथ जोड़े गए थे। भूकंप में बाहरी दीवार टूट चुकी है। उत्तर दिशा की बाहरी दीवार अभी भी संरक्षित है। कोलोसियम के बाहर से दिखने वाले अवशेष मूलतः भीतरी दीवार के हैं।

पुरातत्त्वशेषों में तीन मंज़िलों के ऊपर निर्मित मेहराबदार गलियारों के ऊपर चबूतरे पर एटिक है। यह रस्सियों से बनी जालीदार कनवेस से ढकी है। यह अखाड़े का दो तिहाई भाग है। बीच में ढलुआं है। यहाँ से दर्शकों के पास हवा आती है।

एम्फीथियेटर में 80 प्रवेश द्वार हैं। इनमें से 76 प्रवेश द्वार जन सामान्य के लिए थे। नीचे के प्रवेश द्वार पर लेटिन भाषा में L11 लिखा है-

उत्तरी द्वार से केवल सम्राट व मंत्रीगण ही भीतर जा सकते थे। शेष तीन द्वार गणमान्य व संभ्रांत जनों के लिए आरक्षित थे। इन चारों द्वारों पर सुंदर नक्काशी की हुई थी। अब केवल इन के अवशेष ही देखे जा सकते हैं।

दर्शकों के लिए मनोरंजन कार्यक्रम निःशुल्क थे लेकिन उनको प्रवेश टिकट दिया जाता था। इससे लोगों को अपनी निर्धारित सीट पर बैठने में आसानी होती थी। मिट्टी से बने टिकट पर सीट का नंबर और लाइन लिखी होती थी।

कोलोसियम में 50,000 दर्शकों के बैठने की व्यवस्था थी। उस समय इतनी बड़ी व्यवस्था का निर्माण व सुचारुरूप से संचालन एक आश्चर्यजनक बात है। सीट का निर्धारण समूह और रुतबे के अनुसार किया जाता था। डोमिशियन ने इमारत के सबसे ऊपर एक गैलेरी का निर्माण करवाया था। यहाँ पर निर्धन, गुलाम तथा औरतें खड़े हो कर अथवा लकड़ी की नीची बेंचों पर बैठ कर खेल का आनंद ले सकती थी। कब्र खोदने वालों और पूर्व ग्लेडिएटर्स को अन्दर जाने की मनाही थी।

हाइपोजियम-

कोलोसियम रणभूमि ( अखाड़े ) के नीचे हाइपोजियम है। यहाँ जाने के लिए लकड़ी का रास्ता बना हुआ है। यह 83 मीटर लम्बा और 14 मीटर चौड़ा है। फर्श लकड़ी और रेत से बना है। अखाड़ा भूमिगत ‘हाइपोजियम’ के ऊपर निर्मित है। अखाड़े (रणभूमि) का फर्श तो नष्ट हो चुका है लेकिन ‘हाइपोजियम’ दिखाई देता है। हाइपोजियम में दो स्तरों पर भूमिगत सुरंगों का जाल बिछा हुआ था। यहाँ पर खूंखार जानवरों को रखने के लिए पिंजरे भी रखे हुए थे। ऊपर अखाड़े में जाने से पहले ग्लेडिएटरस और जानवरों को यहीं पर इकट्ठा किया जाता था। ऊपर अखाड़े में जाने के लिए अलग रास्ते बने हुए थे।

हाइपोजियम कोलोसियम से बाहर कई स्थानों के साथ सुरंगों से जुड़ा हुआ था। जानवरों और ग्लेडिएटर्स को सुरंगों से हाइपोजियम में लाया जाता था। कोलोसियम के पूर्व में निर्मित ‘लुड्र्स मैग्नस’ ग्लेडिएटर्स की बैरेक्स हाइपोजियम के साथ जुड़ी हुई थी। सम्राट तथा संभ्रांत महिलाओं के भीतर जाने के लिए अलग रास्ता बना हुआ था।

हाइपोजियम के भीतर भारी उपकरण रखने का भी प्रावधान था। यहाँ पर अफ्रीका से बड़े जंगली जानवर लाए जाते थे। अखाड़े में उनकी लड़ाइयाँ होती थीं। इन जानवरों में दरयाई घोडा, गैंडा, हाथी, मगरमच्छ, जिराफ, शेर, बाघ,चीते, शुतुरमुर्ग प्रमुख थे। ये लड़ाइयाँ विशाल स्तर पर होती थीं। किंवदंती के अनुसार 107 ई में डेसिया में अकेले टार्जन ने 123 दिनों के अन्दर 11,000 जानवरों और 10,000 ग्लेडिएटर्स को पराजित कर दिया था। टार्जन आज भी बच्चों का पसंददीदा हीरो है। उस पर न जाने कितनी फिल्मे बन चुकी हैं, कहानियाँ लिखी गयी, कार्टून बने? ऐसी ही एक फिल्म से टार्जन का यह चित्र लिया गया है-

विध्वंस तथा पुनर्निर्माण-

सन 217 के भीषण अग्निकांड में एम्फीथियेटर की बाहरी सतह पर निर्मित काष्ठ संरचनाएँ जल कर राख़ हो गयी थीं। बहुत सालों तक उनकी मरम्मत नहीं हुई। सन 250-252 में उनका जीर्णोद्धार करवाया गया। 443 ई में भूकम्प ने दोबारा उसको तहस-नहस कर डाला। 435 ई में यहाँ पर ग्लेडिएटरों की आखिरी लड़ाई हुई थी। 523 ई तक यहाँ पर जानवरों की लड़ाइयाँ होती रही।

धीरे-धीरे इन हिंसक खेलों में जनसामान्य की रुचि समाप्त होने लगी थी। लोगों का मनोरंजन करने में लाखों निर्दोष इन्सान और जानवर अपनी जान गंवा चुके थे। इतिहासकारों के अनुसार इन खूनी खेलों में पाँच लाख जानवरों और दस लाख इन्सानों ने अपनी जान गंवा दी थी। वास्तव में उस समय दूसरे देशों से गुलामों को ला कर ग्लेडिएटर के रूप में प्रशिक्षित किया जाता था। प्रशिक्षण के बाद लोगों के मनोरंजन के लिए अखाड़े में दूसरे योद्धाओं और जानवरों से लड़वाया जाता था। जीतने वाले योद्धा को इनाम और हारने वाले को मौत मिलती थी। खूंखार जानवरों के साथ निहत्थे लड़वाया जाता था। इन खूनी लड़ाइयों को देखते-देखते लोग ऊब गए थे।

छठी शताब्दी में कोलोसियम में एक चर्च की स्थापना की गयी। उसके बाद कुछ भाग आवासीय स्थल तथा रंगारंग कार्यक्रमों के लिए इस्तेमाल होने लगे। 12वीं शताब्दी के आसपास राजाओं ने इसे किले के रूप में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। 1349 ई में आए भीषण भूकंप में बाहरी दक्षिणी भाग पूरी तरह से टूट गया। खंडित भाग के पत्थरों से रोम के महल, चर्च और हस्पतालों का निर्माण करवाया गया।

जीर्णोद्धार-

1832 ई में थॉमस कोल ने कोलोसम की भीतरी दीवारों और आस पास सलीब के निशान और जंगली पौधे देखे-

19वीं शताब्दी में उनको वहाँ से हटा दिया गया। 1807,1827 ई में कोलोसियम के बाहरी हिस्से की मरम्मत की गयी। 1827, 1831, 1930 ई में भीतरी भाग का जीर्णोद्धार किया गया। समय और प्रदूषण से होने वाली टूट-फूट को 1993 तथा 2000 ई में ठीक किया गया।

सहायक भवन-

कोलोसियम के कारण उसके आसपास कई प्रकार के उद्योग स्थापित हो गए थे। एम्फीथियेटर के लिए सहायक भवनों का निर्माण हो गया था। पूर्व में ‘लुड्र्स मैग्नस’ नामक ग्लेडिएटर्स प्रशिक्षण केंद्र के पुरातत्त्वशेष आज भी विद्यमान है। यह कोलोसियम के साथ भूमिगत सुरंग से जुड़ा हुआ था। इसके अतिरिक्त भी अन्य कई प्रशिक्षण केंद्र हैं। अस्त्र-शस्त्र रखने के लिए आयुधागार था। उपकरण रखने, ज़ख्मी ग्लेडिएटर्स के उपचार के लिए तथा मृतकों को दफनाने के लिए अलग-अलग स्थान थे।

अंतर्राष्ट्रीय मृत्युदंड विरोधी प्रतीक-

पिछले कई सालों से कोलोसियम मृत्युदंड विरोधी अंतर्राष्ट्रीय अभियान का प्रतीक बन गया है। 1984 ई में मृत्युदंड समाप्त कर दिया गया था। 2,000 ई में कोलोसियम के सामने अनेक मृत्युदंड विरोधी प्रदर्शन हुए और पूरे विश्व में मृत्यु दंड के विरुद्ध विरोध किया गया। अब यदि किसी देश में मृत्युदंड समाप्ति का कानून पारित होता है तो रोम प्रशासन कोलोसियम में सफ़ेद के स्थान पर सुनहरी रोशनी करता है। सुनहरी रोशनी में जगमगाता कोलोसियम-

रंगारंग कार्यक्रम-

खंडहर के रूप में परिवर्तित हो जाने के कारण कोलोसियम के भीतर विशाल कार्यक्रमों का आयोजन संभव नहीं। भीतर कुछ सौ व्यक्ति ही बैठ सकते हैं। इस पर भी अनेक रंगारंग कार्यक्रमों की पृष्ठभूमि में कोलोसियम रहता है। 435 ई में ग्लेडिएटर्स और 435 ई में जानवरों की लड़ाइयाँ बंद हो गयी थी।

अब यहाँ पर रोमन कैथोलिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। पोप ने कोलोसियम को एक पवित्र स्थान घोषित कर दिया था। हर साल ‘गुड फ्राइडे’ के दिन एम्फीथियेटर तक एक शोभायात्रा निकाली जाती है। इसकी अगुवाई स्वयं पोप करते हैं। उनके हाथ में ‘वे ऑफ दी क्रास’ नाम की मशाल रहती है।

कोलोसियम आज रोम में पर्यटकों के लिए विशिष्ट आकर्षण का केंद्र है। प्रतिवर्ष लाखों पर्यटक यहाँ पर आते हैं। स्थापत्य कला और इंजिनियरिंग के इस अद्वितीय कौशल को देख कर अचंभित रह जाते हैं। इटली के विनाशकारी भूकंपों में ध्वस्त हो जाने के बाद भी आज भी यह प्राचीन रोम की गौरवगाथा के प्रतीक के रूप में जीवंत साक्षी बन कर खड़ा है। अब कोलोसियम की बाहरी दीवार की ऊपरी मंज़िल पर ‘ईरोस’ को समर्पित एक संग्रहालय है। इटली की मुद्रा यूरो के सिक्कों पर भी कोलोसियम का चित्र अंकित है।

==========================================

प्रमीला गुप्ता

इत्सुकुशिमा शिंतो समाधि

जापान के हिरोशिमा क्षेत्र,हत्सुकायची में स्थित मियाजिमा द्वीप, जिसे इत्सुकुशिमा द्वीप भी कहते है, में विश्व प्रसिद्ध इत्सुकुशिमा शिंतो समाधि स्थित है । यह सेतो अंतःस्थलीय सागर पर तैरती हुई दिखाई देती है तथा सागर में द्वीप पर तैरने वाली विश्व की एकमात्र समाधि है।मियाजिमा द्वीप पुरातन काल से ही शिंतो मतावलम्बियों की आस्था का केंद्र रहा है। संभवतः यहाँ पर प्रथम शिंतो भवनों का निर्माण छठी शताब्दी में हुआ होगा। वर्तमान संरचनाओं -भव्य तोरी गेट, सागर में स्तंभों पर टिके भवन, पाँच मंज़िला पेगोडा, का निर्माण काल 12वीं शताब्दी है। एक-दूसरे से जुड़े भवनों का कलात्मक सौंदर्य तथा तकनीकी कौशल दर्शनीय है। विभिन्न रंगों से सुशोभित पर्वतों तथा सागर के मध्य स्थित ये भवन अद्वितीय मनोहारी हैं। ये प्रकृति तथा पुरुष का अनुपम संगम स्थल हैं। 1996 ई में यूनेस्को की विश्व विरासत समिति ने इस क्षेत्र को विश्व विरासत की सांस्कृतिक धरोहर के रूप में मान्यता प्रदान कर दी थी।

तोरी गेट-

मियाजिमा द्वीप पर स्थित इत्सुकुशिमा समाधि का जल पर तैरता हुआ भव्य सिंदूरी ‘तोरी’ गेट विशिष्ट आकर्षण का केंद्र है –

यहाँ तक पंहुचने के लिए नौका लेनी पड़ती है। सागर की लहरों पर तैरती नौका पर खड़े हो कर चारों ओर की मनमोहक दृश्यावली देखने पर तन-मन में असीम ऊर्जा का संचरण हो जाता है। तट से तोरी गेट तक पंहुचने में पाँच मिनट लगते हैं। सिंदूरी रंग का यह गेट समाधि के पवित्र क्षेत्र का प्रवेश द्वार है। यह सदियों पुराने कपूर की लकड़ी से बना है। इसका निर्माण 1168 ई में हुआ था। वर्तमान गेट का निर्माण 1875 ई में हुआ था। यह 16 मीटर ऊंचा है तथा इसका वज़न 60 टन है। पानी का बहाव तेज़ होने पर यह जल पर तैरता हुआ दिखाई देता है। कम बहाव होने पर पैदल भी पंहुचा जा सकता है। उस समय लोग तट पर सीपियाँ इकट्ठी करते दिखाई देते हैं। यहाँ से समाधि का चित्ताकर्षक दृश्य दिखाई देता है-

इतिहास-

जापान के हिरोशिमा क्षेत्र में हत्सुयाकची नगर में स्थित यह समाधि ‘अकी’ प्रांत की प्रमुख समाधि है। प्रारम्भ में इसका निर्माण स्थानीय मछुआरों ने सामान्य शिंतो समाधि के रूप में करवाया था।811 ई में यहाँ पर ‘सएकी कुरमोटो’ ने बड़ी संरचना का निर्माण हुआ। आरंभ में यह समाधि शिंतो के ‘तूफान देवता’ की तीन पुत्रियों को समर्पित थी। कमकुरा काल (1185-1333) में जापान के सात सौभाग्य सूचक देवताओं में से एक ‘बेनटेन’ की भी आराधना होने लगी। ‘बेनटेन’ प्रेम, तर्क, ज्ञान, साहित्य, संगीत और सुख-समृद्धि प्रदान करने वाली हिन्दू-बौद्ध मूल की देवी है।उस समय इत्सुकुशिमा में व्यापार व सागर के यात्रियों की संरक्षक देवी के रूप में आराधना होती थी। सभी देवताओं की पूजा-अर्चना एक ही स्थान पर होने के कारण इस क्षेत्र को ‘इत्सुकुशिमा’ की संज्ञा दे दी गयी। इत्सुकुशिमा का अर्थ है-‘देवताओं को समर्पित द्वीप’।

समाधि परिसर में जल के ऊपर स्तंभों पर निर्मित 56 काष्ठ संरचनाएँ हैं। अनेक संरचनाएँ गलियारों तथा पगडंडियों से जुड़ी हैं।

1168 ई में महान शक्तिशाली योद्धा तायरा-नो-कियोमोरी ने इस भव्य समाधि का निर्माण करवाया था। वह युद्धक्षेत्र में विजयप्राप्ति तथा सुख समृद्धि का कारण मियाजिमा में विद्यमान जल देवियों की कृपा दृष्टि मानता था। समाधि सुसानो-ओ-नो-मिकातो की पुत्रियों, सागर,तूफान तथा सूर्यदेवी के भाई अमातरेसू की तीन देवियों को समर्पित है। तायरा-नो-कियोमोरी ने 431.2 हेक्टेयर भूमि पर समाधि निर्मित करवायी। दो परिसरों में 17 भवन तथा तीन अन्य संरचनाएँ स्थित हैं। इनके अतिरिक्त अन्य छोटे-छोटे भवन, मिसेन पर्वत के इर्द-गिर्द आदिकालीन वन तथा विचित्र आकार की चट्टानें हैं। कियोमोरी ने समाधि निर्माण पर अपार धनराशि खर्च की। वह अपने मित्रों,सहयोगियों तथा राजकीय अतिथियों को यह स्थान दिखाने में गौरवान्वित अनुभव करता था। उसने समाधि का निर्माण खाड़ी पर पुलनुमा संरचनाओं के रूप में करवाया ताकि यह पवित्र द्वीप से जल पर तैरती दिखाई दे-

यह आध्यात्मिक शक्ति तथा प्राकृतिक सौंदर्य का अद्भुत समन्वय है। जापान की तीन उत्कृष्ट दृश्यावलियों में से एक है। कालांतर में अन्य महाद्वीपीय धर्मों के प्रभाव तथा अपनी निजी परम्पराओं के साथ जापानी जनजीवन का अविभाज्य अंग बन गया।

स्थापत्य शैली-

इत्सुकुशिमा समाधि जापान की पारंपरिक शिंतो स्थापत्य शैली में निर्मित है। इस में उपासना का केंद्र प्रकृति के उपादान पर्वत, नदी, चट्टानें, वृक्ष पशु विशेष रूप से सूर्य , चंद्रमा होते हैं। इनमें दैवी शक्तियाँ निहित रहती हैं। समाधि के भवन भव्य आवासीय शिंतो स्थापत्य शैली का अद्वितीय उदाहरण हैं। इनमें मानव निर्मित तथा प्राकृतिक तत्त्वों का अपूर्व सम्मिश्रण देखने को मिलता है।

समाधि बौद्ध तथा शिंतो की मिश्रित स्थापत्य शैलियों में निर्मित है। तोरी गेट के सामने तथा पृष्ठभूमि में पवित्र मिसेन पर्वत के मध्य निर्मित सागर की मनमोहक दृश्यावली को दर्शाते अनेक लम्बे लकड़ी के गलियारों से जुड़े विशाल भवन प्रमुख रूप से शिंदेन -जुकुरी शैली; हिआन कालीन (794-1185) इम्पीरियल स्थापत्य शैली में निर्मित हैं। यद्यपि इन के लाल स्तंभों पर- शिंतो स्थापत्य शैली का प्रभाव देखने को मिलता है तथापि ग्लेजड टाइल्स के स्थान पर साइप्रस की छाल से बनी छतें इम्पीरियल स्थापत्य शैली की द्योतक हैं।

परिसर में चिकित्साशास्त्र के आचार्य बुद्ध याकुशी को समर्पित पाँच मंज़िला बौद्ध पेगोडा है। इसका निर्माण 1407 ई में हुआ था।

परिसर का विशालतम भवन सेंजोककू असेंबली हाल है। प्रतिष्ठित राजनयिक और जनरल तोयोतोमी हिदेयोशी (1587-1598) ने 16वीं शताब्दी में इसका निर्माण करवाया था। जापानी शब्द ‘सेंजोककु’ का अर्थ है- मैट अर्थात 18 वर्ग फुट। इसकी विशिष्टता यह है की हाल लगभग 857 मैट पर निर्मित है। यह बौद्ध भिक्षुओं के प्रार्थना करने के लिए बनवाया गया था। वर्तमान में इस का उपयोग इसके संस्थापक की समाधि के रूप में होता है।

खूबसूरत रंगों से दमकते अंतहीन गलियारे देख कर पर्यटक मंत्रमुग्ध रह जाते हैं। स्तंभों पर स्थित गलियारों से सागर का अनूठा दृश्य,खारे पानी की सौंधी-सौंधी महक से आभास हो जाता है कि समाधि वास्तव में जल पर स्थित है। प्रत्येक स्तम्भ के आगे और पीछे एक अतिरिक्त पाया है। यह रयोबो शिंतो शैली का प्रतीक है। अप्रत्यक्ष रूप से यहाँ शिंतो स्थापत्य शैली पर मध्यकालीन जापानी स्थापत्य शैली का प्रभाव भी परिलक्षित होता है।

नोह रंगमंच-

प्रमुख समाधि के सामने ‘नोह’ रंगमंच है। इसका निर्माण काल 1590 ई के आसपास है। विशिष्ट अवसरों पर जापान के पारम्परिक नृत्य ‘नोह’ की प्रस्तुति होती है। यह वर्ष में नौ बार प्रस्तुत किया जाता है। इसके अतिरिक्त अन्य रंगारंग कार्यक्रम भी आयोजित होते रहते हैं। प्रमुख हैं-जल पर शानदार आतिशबाज़ी का प्रदर्शन तथा वाद्ययंत्रों पर संगीत की प्रस्तुति-‘कंगेन उत्सव’।

कोषागार-

कोषागार में संरक्षित हैं प्रसिद्ध हेयके नोक्यो अर्थात तायरा के धर्मसूत्रों के 32 हस्तलिखित अभिलेख। इनमें कमल सूत्र तथा अन्य सूत्रों को कियोमोरी, उसके पुत्रों तथा अन्य परिजनों ने लिपिबद्ध किया था। प्रत्येक व्यक्ति ने केवल एक अभिलेख लिखा था।

इस पवित्र शिंतो समाधि को प्रदूषण मुक्त रखना अनिवार्य है। 1876 ई से इसके समीप जन्म-मृत्यु का निषेध है। आज भी गर्भवती महिलाएं प्रसव के समय अन्यत्र चली जाती हैं। गंभीर रूप से बीमार तथा वृद्ध जन जिनकी मृत्यु निकट है, दूर चले जाते हैं। द्वीप पर मृत का अंतिम संस्कार करना वर्जित है।

मियाजामा द्वीप-

मियाजामा का पूरा द्वीप समाधि के अंतर्गत आता है। इस द्वीप पर ईश्वर का आवास माना जाता है। जनसामान्य की इसमें अटूट आस्था है। जापान के पौराणिक आख्यानों के अनुसार यहाँ पर जल से सम्बद्ध अनेक देवियों का वास है। सागर पर स्थित समाधि की दृश्यावली मुग्ध कारी है। हो भी क्यों न? अनेक दैवी शक्तियों का वासस्थल जो है।

सूर्यास्त के बाद काले सागर पर अगणित बिजलियों के प्रकाश में आलोकित समाधि को देख कर पर्यटक भाव विभोर हो जाते हैं। यहाँ पर आने का सर्वोत्तम समय पतझड़ ऋतु है। उस समय पूरा द्वीप शरत कालीन सौन्दर्य से सजा रहता है। यहाँ आने पर जापान की गूढ रहस्यात्मकता और सौन्दर्य की अनुभूति होती है।

पाँच सितम्बर, 2004 को भयंकर सोंगडा तूफान में समाधि को भारी क्षति पंहुची थी। चलने के लिए बने पुल, छतें, आंशिक रूप से क्षति ग्रस्त हो गए थे। उस समय मरम्मत करने के लिए समाधि को अस्थायी रूप से बंद कर दिया गया था।

हिरोशिमा शांति म्यूज़ियम-

चुकोगु जिले का प्रमुख नगर है हिरोशिमा। द्वितीय विश्व महायुद्ध में वहाँ पर अणु बमों की वर्षा हुई थी। असंख्य लोग काल कवलित हो गए थे। यहाँ पर स्थित म्यूज़ियम में उस विध्वंसक घटना की स्मृतियाँ संग्रहीत है।

मियाजामा द्वीप जाने के लिए हिरोशिमा से ‘मियाजीमगुची’ के लिए ट्रेन लेनी पड़ती है। यह समीपस्थ रेलवे स्टेशन है। ट्रेन 25 मिनट में वहाँ पंहुचा देती है। मियाजीमगुची से मियाजिमा के तोरी गेट तक जाने के लिए नाव लेनी पड़ती है। नाव पाँच मिनट में ‘तोरी’ गेट तक पंहुचा देती है। सम्पूर्ण विश्व के पर्यटक इस समाधि को देखने के लिए आते हैं।

——————————————–

प्रमीला गुप्ता

बुद्ध की जन्मस्थली -लुम्बिनी-

भारत के बिहार राज्य की उत्तरी सीमा के निकट वर्तमान नेपाल में भगवान बुद्ध की जन्मस्थली ‘लुम्बिनी’ स्थित है। नेपाल में कपिलवस्तु के रुपेनधेनी ज़िले में है ‘लुम्बिनी’। भगवान बुद्ध की जीवनयात्रा यहीं से आरंभ होती है। यहाँ पर बौद्ध धर्म के सभी सम्प्रदायों ने अपनी-अपनी विचारधारा के अनुरूप मंदिर, गुम्पा,विहार स्थापित कर रखे हैं। हूणों के आक्रमणों के बाद यह स्थान गुमनामी के अंधेरे में खो गया था। 1866 ई में इस स्थान की खोज की गयी और इसका जीर्णोद्धार किया गया। 1997 ई में यूनेस्को ने इसको ऐतिहासिक महत्त्व की विश्व धरोहर घोषित कर दिया।

लुम्बिनी में बुद्ध की अपेक्षा उनकी माता मायादेवी की अधिक मान्यता है। बुद्ध की माता व पिता के निवासगृहों के बीच एक पवित्र उद्यान ‘लुम्बिनी’ है। ससुराल से मायके जाते समय माया देवी ने उनको यहीं पर जन्म दिया था। लुम्बिनी में मायादेवी अर्थात महामाया का चिरस्थायी मंदिर है। इसको ‘प्रदिमोक्ष’ वन भी कहा जाता है। अनेक सदियों से यह स्थान जनसामान्य की दृष्टि से ओझल था। 1896 ई में डॉ. फ्यूहरर ने अशोक स्तम्भ की खोज की थी। 1990 ई के प्रारम्भ में उत्खनन में प्राप्त शिलालेखों से इस बात की पुष्टि हो गयी कि भगवान बुद्ध का जन्म इसी स्थान पर हुआ था। चीनी यात्री फ़ाहयान और हुआन त्सांग ने भी इसका वर्णन किया है। कुछ समय से पुरातत्त्वविद यहाँ पर उत्खनन कर पुरातत्त्वशेषों का संरक्षण कर रहे हैं। वर्तमान में माया देवी मंदिर के इर्द-गिर्द चारदीवारी है। इसके भीतर प्राचीन मंदिर के अवशेष संरक्षित हैं।

बुद्ध जन्म का दृश्य-

मान्यता के अनुसार मायादेवी ने लुम्बिनी के एक तालाब के किनारे अपने ऊपर के पेड़ की एक शाखा को हाथ में लिए खड़ी अवस्था में ही बुद्ध को जन्म दिया था। तीनों लोकों के देव-ब्रह्मा, विष्णु,महेश स्वयं बुद्ध को अपने हाथों में लेने के लिए वहाँ पधारे थे। किंवदंती के अनुसार जन्म के तुरंत बाद सिद्धार्थ सात कदम चले थे। उनके चरणों ने जहां धरती का स्पर्श किया वहाँ कमल के पुष्प खिल उठे। इस घटना को बुद्ध के जीवन की पहली चामत्कारिक घटना माना जाता है। बुद्ध जन्म के इस दृश्य का चित्रांकन अनेक बौद्ध स्थलों में देखने को मिलता है। इस दृश्य में मायादेवी के साथ बुद्ध की दाई प्रजापति गौतमी का चित्र भी है।

बाल बुद्ध-

जन्म प्रतिमा कक्ष –

4.8 कि.मी लम्बे तथा 1.6 कि.मी चौड़े लुम्बिनी क्षेत्र में अनेक स्मारक हैं। वर्तमान मंदिर सफ़ेद पत्थरों से निर्मित है। मंदिर के भीतर प्राचीन मंदिर व स्तूप अवस्थित हैं। यहीं एक तरफ बड़ी-बड़ी ईंटों को चौरस आकार में रखा हुआ है। इस सभामंडप जैसे स्थान की एक दीवार पर एक प्रतिमा उत्कीर्ण है। प्रतिमा की आकृति धूमिल पड़ गयी है।यह अन्य स्थानों पर उत्कीर्ण माया देवी की प्रतिमा के सदृश दिखाई देती है। इस कक्ष में केवल बुद्ध के जन्म को दर्शाती प्रतिमाएँ हैं। संभवतः पुरातत्त्वविदों ने इसीलिए इस कक्ष को ‘जन्म प्रतिमा कक्ष’नाम दिया है।

सीमा शिला-

‘जन्म प्रतिमा कक्ष’ के कुछ फुट नीचे एक शिला पत्थर रखा हुआ है। अनियमित आकार की इस शिला पर मानव पैर का हल्का निशान है। मान्यता है कि यह निशान बाल सिद्धार्थ के पाँव का निशान है। इस को सुदृढ़ काँच के केस में संरक्षित रखा हुआ है। इसके पास अगणित सिक्के राके हुए हैं। इन को श्रद्धालु भक्ति भाव से यहाँ पर भेंट स्वरूप रख जाते हैं। इस शिला को देखने के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है।

अशोक स्तम्भ-

माया देवी मंदिर के पीछे अशोक स्तम्भ स्थित है। इस पर पाली भाषा में लिखा हुआ है कि सम्राट अशोक स्वयं भगवान बुद्ध के जन्म स्थान के दर्शन करने के लिए लुम्बिनी आए थे और इस स्तम्भ को स्थापित करवाया था। स्तम्भ पर लिखा है-‘ हिता बुद्धे जाते शाक्यमुनिती’ अर्थात शाक्य मुनि बुद्ध का जन्म इसी स्थान पर हुआ था।

पुष्करिणी (पवित्र तालाब)-

यह पवित्र तालाब माया देवी मंदिर के साथ ही स्थित है। सिद्धार्थ के जन्म के बाद माया देवी ने इस तालाब में स्नान किया था। बौद्ध धर्मावलम्बी इस स्थान को अत्यधिक पवित्र मानते हैं। वर्तमान तालाब नवनिर्मित है। इस तालाब के पास एक बोधि वृक्ष है। समीप ही बुद्ध को समर्पित एक छोटा सा मंदिर है। यहाँ कुछ बोधिवृक्षों के नीचे लकड़ी के गोलाकार पटरे रखे हैं। इन पर भक्त जन ध्यान,साधना करते हैं। यही नहीं इन वृक्षों पर कतार में रंग-बिरंगे झंडे फहरा रहे हैं।

स्तूप

मंदिर के आसपास अनेक स्तूप हैं। अधिकांश स्तूपों के अवशेष बचे हैं । कुछ स्तूप वर्गाकार आधारशिला पर निर्मित हैं तो कुछ गोलाकार आधारशिला पर। 16 स्तूपों के आधार को ‘मन्नत स्तूप’ कहते हैं। मन्नत पूरी होने के बाद श्रद्धालुओं ने इन का निर्माण करवाया था।

संग्रहालय-

अब तक जो स्थान खंडहर प्रतीत होता था, पुनर्निर्माण के बाद भक्तगणों के मंत्रोच्चारण से जीवंत हो उठा है। लुम्बिनी विकास न्यास ने एक महत्त्वाकांक्षी योजना के अंतर्गत इसको विश्वस्तरीय पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने का निर्णय लिया है। इस दृष्टिकोण से इस क्षेत्र को नहर के माध्यम से दो भागों में बांटा गया है। नहर के एक ओर लाल रंग की ईंटों से आधुनिक स्थापत्य शैली में निर्मित संरचना लुम्बिनी संग्रहालय है। यहाँ आस्ट्रेलिया मंदिर में माया देवी की चित्ताकर्षक प्रतिमा है। चीनी मंदिर में हुआन त्सांग की भव्य प्रतिमा स्थित है। जर्मन मंदिर में अप्रतिम, मनोरम भित्ति चित्र उत्कीर्ण हैं। नेपाल मंदिर में बुद्ध की विशाल प्रतिमा मुग्धकारी है। संग्रहालय का भवन चित्ताकर्षक है लेकिन भीतर मौलिक कलाकृतियों के स्थान पर उनकी प्रतिकृतियाँ रखी हुई हैं। विशिष्ट बौद्ध स्थलों के छाया चित्र भी देखे जा सकते हैं।

लुम्बिनी उद्यान-

यह शांत मनोरम स्थल है। यहाँ पर सुंदर पक्षी और रंग-बिरंगी तितलियाँ देख कर तन-मन में नूतन ऊर्जा का संचरण हो जाता है। सर्दी के मौसम में यहाँ की झीलों में सारस इत्यादि अनेक प्रवासी पक्षी डेरा डाले रखते हैं। लुम्बिनी घने जंगलों के बीच एक विशाल उद्यान है।

परम ज्योति, लुम्बिनी उद्यान-

केंद्र में बह रही नहर में नौका में सैर करते समय नहर के दक्षिण छोर पर 1986 ई से प्रज्वलित परम ज्योति दिखाई देती है। यह विश्व में शांति, सौहार्द के संदेश का प्रतीक है।

विश्व शांति मंदिर-

विश्व शांति मंदिर के नाम से प्रसिद्ध शांति का प्रतीक जापान का शांति पेगोडा पर्यटकों के विशिष्ट आकर्षण का केंद्र है। । प्रमुख परिसर के बाहर स्थित पारम्परिक पेगोडा शैली में निर्मित भव्य संरचना है। जापान के बौद्ध श्रद्धालु ने इसके निर्माण पर एक मिलियन डालर खर्च किए थे। सफ़ेद रंग की इस संरचना में भगवान बुद्ध की स्वर्णिम प्रतिमा स्थित है। भव्य संरचना के केंद्र में गुंबद है। वहाँ तक पंहुचने के लिए सीढ़ियाँ हैं। दूसरी मंज़िल पर गुंबद के इर्द-गिर्द परिपथ है। विश्व शांति के प्रतीक इस शांत, सौम्य स्थल पर जाने पर पर्यटकों को अहिंसा तथा एकात्मकता की अनुभूति होती है।

अन्य दर्शनीय मंदिर व विहार-

नहर के माध्यम से दो भागों में बंटे इस क्षेत्र के एक ओर माया देवी का मंदिर है तो दूसरी ओर सफ़ेद रंग का विशाल विश्व शांति पेगोडा स्थित है। नहर के पश्चिम में कोरिया, चीन, जर्मनी, कनाडा, आस्ट्रिया, वियतनाम, लद्दाख, नेपाल के महायान सम्प्रदाय के मंदिर हैं।पूर्व में थेरवाद सम्प्रदाय के म्यांमार, कम्बोडिया के मंदिर हैं। दोनों ओर के मंदिरों में पृथक-पृथक ध्यान केंद्र हैं।पूरे क्षेत्र का भ्रमण करने के लिए काफी पैदल चलना पड़ता है।

कोरिया का भव्य विहार-

कोरिया की विशिष्ट स्थापत्य शैली में निर्मित यह विहार ‘दाए-शुंग-शाक्य-सा’ के नाम से प्रसिद्ध है। इसकी छत पर सुंदर, चित्ताकर्षक चित्र उत्कीर्ण हैं। श्रद्धालुओं व अन्य तीर्थयात्रियों के लिए यहाँ पर कुछ दिन रहने व खाने-पीने की व्यवस्था है। कुछ दिन रहने पर यात्रियों को जीवन में उपलब्ध नित्यप्रति की सुविधाओं से विरक्त बौद्ध भिक्षुओं का आत्मसंयम से परिपूर्ण शांत जीवन देखने को मिलता है।उसको देखने पर सुखद आत्मानुभूति होती है।

म्यांमार का स्वर्णिम मंदिर-

मंदिर परिसर में म्यांमार स्वर्णिम मंदिर प्राचीनतम संरचनाओं में से एक है।बागान मंदिरों की शैली के अनुरूप इसका नुकीला शिखर सर्वाधिक चित्ताकर्षक है। भीतर तीन प्रार्थना सभागार हैं। मंदिर के प्रांगण में दक्षिण बर्मा की शैली में निर्मित विशाल स्वर्णमंडित ‘लोकमनी पुला पेगोडा’ है।

कंबोडियन विहार-

कम्बोडिया के प्रख्यात मंदिर ‘अंगकोर वत’ मंदिर की स्थापत्य शैली के अनुरूप ही यह विहार निर्मित है। यह संरचना बहुत मुग्धकारी और ऊर्जा से परिपूर्ण है। प्रमुख आकर्षण है बाहर की चौकोर रेलिंग पर बने 50 मीटर हरे रंग के साँप। बाहर दीवारों पर मनमोहक, सूक्षम चित्र उत्कीर्ण हैं।

विशेष-

लुम्बिनी के विशाल क्षेत्र में केवल धार्मिक स्थलों के निर्माण की ही अनुमति है। दुकानें,होटल, रेस्टौरेंट स्थापित करने की अनुमति नहीं है।

काठमाण्डू से सड़क मार्ग से लुम्बिनी पंहुचने में पाँच घंटे लगते हैं और भैरहवा से तीस मिनट का रास्ता है। भैरहवा में समीपस्थ एयरपोर्ट गौतम बुद्ध एयरपोर्ट है।

लुम्बिनी नेपाल की तराई में पूर्वोत्तर रेलवे की गोरखपुर-नौतनवाँ लाइन के नौतनवाँ स्टेशन से बीस मील और गोरखपुर-गोंडा लाइन के नौगढ़ स्टेशन से दस मील दूर है। नौगढ़ से वहाँ तक जाने के लिए पक्की सड़क है। जाने के लिए वाहन सुविधापूर्वक मिल जाते हैं।

लुम्बिनी जाने के लिए अक्तूबर-दिसम्बर और अप्रैल-मई का समय सर्वोत्तम है।

—————————————-

प्रमीला गुप्ता