आचेन का पवित्र कैथेड्रल-जर्मनी

ऐतिहासिक,स्थापत्यशैली तथा धार्मिक दृष्टिकोण से 805 ई में निर्मित आचेन स्थित विश्व प्रसिद्ध इम्पीरियल कैथेड्रल अत्यधिक महत्त्वपूर्ण संरचना है। जर्मनी की चर्च स्थापत्यशैली पर इसके अद्वितीय डिज़ाइन का प्रभाव परिलक्षित होता है। सदियों तक यहाँ पर राज्याभिषेक होते रहे तथा श्रद्धालु पवित्र तीर्थस्थल के रूप में यहाँ की यात्रा करते रहे।

आचेन कैथेड्रल जर्मनी के प्राचीनतम चर्चों में से एक है। इसमें मध्यकालीन अमूल्य कोष संग्रहीत है। इनमें चार्ल्मग्न का राजसिंहासन (800ई) ; स्वर्णिम वेदी (1000ई); प्रवचन मंच (1020ई); चार्ल्मग्न की स्वर्णिम समाधि (1215ई) तथा वर्जिन मेरी की समाधि (1238ई) उल्लेखनीय हैं। अंतिम समाधि में अतीव प्रभावशाली स्मृतिचिन्ह संग्रहीत हैं तथा आज भी तीर्थयात्रियों के आकर्षण का केंद्र हैं। भव्य कैथेड्रल के कोषागार में भी अनेक बहुमूल्य वस्तुएँ प्रदर्शित हैं।

प्रथम पवित्र रोमन सम्राट चार्ल्मग्न ने 786 ई में राजप्रासाद में गिरजाघर का निर्माण आरंभ करवाया था। राजप्रासाद में निर्मित गिरजाघर ‘ करोलिंगीयन’ स्थापत्यशैली का उत्कृष्ट नमूना है। 1978 ई में यूनेस्को ने इसको विश्वविरासत की सूची में सम्मिलित कर लिया था। आचेन के चार्ल्मग्न के विशाल राजप्रासाद में अब यही दर्शनीय कैथेड्रल शेष बचा है।

कैथेड्रल का डिज़ाइन-

पैलेस के कैथेड्रल का डिज़ाइन मेटज़ के ओडो ने तैयार किया था। उसने इटली में रवेना स्थित बाइजेंटाइन शैली में निर्मित ‘सन वितले’ के चर्च के अनुरूप डिज़ाइन तैयार किया था। फलस्वरूप गिरजाघर की अष्टकोणीय आकृति, धारीदार मेहराब, संगमरमर के फ़र्शों की स्वर्णिम नक्काशी को देख कर आनंद की अपूर्व अनुभूति होती है। 805 ई में इसको इम्पीरियल चर्च के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया गया था।

स्मृतिचिन्ह-

चार्ल्मग्न ने अपने जीवनकाल में यहाँ पर अनेक स्मृतिचिन्ह संग्रहीत किए थे। वे स्मृतिचिन्ह आज भी कैथेड्रल में संरक्षित रखे हैं। इनमें सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण एवं दर्शनीय है-

1- दिव्य वर्जिन का परिधान

2- बाल यीशु के कपड़े

3- सलीब पर लटके यीशु

4- धड़ से अलग होने के बाद जिस कपड़े पर बाप्तिस्त संत जॉन का सिर रखा था।

मध्यकाल में इन स्मृतिचिन्हों को देखने के लिए जर्मनी, आस्ट्रिया, हंगरी, इंग्लैंड, स्वीडन तथा अन्य देशों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते थे। 14वीं शताब्दी के मध्य इन चार भव्य स्मृतिचिन्हों को सात वर्ष के अंतराल पर सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करने की प्रथा चल पड़ी। यह प्रथा आज भी कायम है।

चार्ल्मग्न की समाधि-

चार्ल्मग्न की 814 ई में मृत्यु के बाद उसके शव को गिरजाघर के गायक मंडली के कक्ष में समाधिस्थ कर दिया गया था। 1000 ई में सम्राट ओटो तृतीय ने चार्ल्मग्न की शवपेटिका को खुलवाया। कहा जाता है कि शवपेटिका में उनका शव आश्चर्यजनक रूप से संरक्षित था। वे संगमरमर के राजसिंहासन पर राजसी परिधान तथा सिर पर ताज रखे हुए बैठे थे। उनकी गोद में बाइबल के अंश तथा हाथ में राजदंड था। टाउन हाल के विशाल कमरे की दीवार पर उनको देख रहे सम्राट ओटो व अन्य राजदरबारियों का भित्तिचित्र उत्कीर्ण है।

सम्राट फ्रेडेरिक बरबारोसा ने 1168 ई मेंचार्ल्मग्न की शवपेटिका को दोबारा खुलवाया तथा अस्थिवशेषों को पेरीयन संगमरमर की नक्काशीदार शवपेटिका में रखवाया। सम्राट बरबारोसा के अनुरोध पर चार्ल्मग्न को उसी वर्ष संत घोषित कर दिया गया। वर्ष 1168 में सम्राट बरबारोसा ने समाधि के ऊपर एक भव्य फानूस टंगवाया जो आज भी संरक्षित है। 1215ई में फ्रेडेरिक द्वितीय ने चार्ल्मग्न की अस्थियों को भव्य स्वर्णिम समाधि में रखवाया। मूलरूप से अस्थियाँ अष्टकोणीय हाल में फानूस के नीचे रखी हुई थीं। दस वर्ष बाद चार्टेरस कैथेड्रल में चार्ल्मग्न की स्मृति में एक भव्य खिड़की का निर्माण करवाया गया।

वर्ष 1349 में चार्ल्मग्न के अस्थिवशेषों व अन्य स्मृति चिन्हों को प्रदर्शित करने के लिए दो पृथक स्थान बनाए गए। चार्ल्स चतुर्थ ने चार्ल के पवित्र अवशेष स्थल पर चार्ल्मग्न की अस्थियाँ व उनकी एक अर्ध प्रतिमा स्थापित करवायी। ये दोनों कोषागार में प्रदर्शित हैं। 1474 ई से चार्ल्मग्न फ्रेंच सम्राटों के पूर्वजों के रूप में पुजनीय हैं।

गायक भवन-

इस बीच पैलेस के गिरजाघर के गायक भवन का गोथिक स्थापत्यशैली में पुनर्निर्माण किया गया। काँच के नवनिर्मित गिरजाघर को 1414ई में चार्ल्मग्न की 600वीं पुण्यजयंती पर प्रतिष्ठित किया गया था। सम्राट की समाधि को गायक भवन के पूर्वी छोर पर खिसका दिया गया था। आज भी यह वहीं पर है।

वर्तमान आचेन कैथेड्रल-

15वीं शताब्दी में तीर्थयात्रियों की भीड़ में वृद्धि देख कर अन्य कई छोटे गिरजाघर व प्रकोष्ठ निर्मित किए गए। यह विशाल परिसर ही वर्तमान में आचेन कैथेड्रल के नाम से प्रसिद्ध है। सौभाग्य से दोनों विश्व युद्धों में कैथेड्रल को कोई विशेष क्षति नहीं पंहुची। 1978 ई में यूनेस्को की विश्व विरासत सूची में सम्मिलित होने वाले 12 स्थलों में से यह एक था। यूरोप के तीन तथा जर्मनी का एकमात्र स्थल था। जीर्णोद्धार कार्य दो सदियो में 2006 ई में पूरा हुआ।

अष्टकोणीय प्रतीक-

आचेन कैथेड्रल का गुंबद अष्टकोणीय आकार में निर्मित है। चार्ल्मग्न ‘आठ’ की संख्या को अत्यधिक महत्त्व देता था। इसीलिए वेदी के ऊपर का गुंबद अष्टकोणीय है। बाइबल में भी आठ का अंक अधिक दिखाई देता है तथा मध्यकाल में इसे ईसाई धर्म का प्रतीक माना जाता था। एक पूर्ण चक्र को मध्य से चतुर्भुजाकार में काट देने पर अष्टकोण बन जाता है। पूर्णचक्र ईश्वरीय सत्ता का प्रतीक है जब कि चतुर्भुज भौतिक संसार का प्रतिनिधित्व करता है। चार कोने स्वर्ग की चार दिशाओं तथा चार मानवीय गुणों को दर्शाते हैं। चार्ल्स्मग्न ने आठ के अंक में फ्रैंक्स तथा रोमन साम्राज्य; लौकिक एवं पारलौकिक दोनों के शासक तथा शक्ति को निहित देखा। दसवीं सदी में निर्मित राजसिंहासन वेदी के पीछे स्थित है। उसके दोनों हाथों के स्मृतिचिन्ह लौकिक, पारलौकिक जगत की शक्ति के द्योतक हैं। दायें हाथ में लौकिक जगत का प्रतीक राजदंड है तो बायें हाथ में पारलौकिक जगत का प्रतीक गोलाकार चक्र है।

दर्शनीय स्थल-

पश्चिम का बाहरी भाग-

पश्चिमी भाग करोलिंगीयन शैली में निर्मित है। मूल सीढ़ियाँ तथा आले अभी भी संरक्षित हैं। पोर्च का निर्माण 17वीं सदी में तथा पश्चिमी गुंबद का ऊपरी भाग 1879-1884 के बीच निर्मित हुआ था। भव्य पश्चिमी कांस्य प्रवेश द्वार ‘वोल्फ डोर्स’ के नाम से प्रसिद्ध है। ये पुराने मॉडलों की अनुकृतियाँ है तथा इन का वज़न चार टन है। वर्तमान में भीतर जाने के लिए दायीं तरफ एक छोटा, सामान्य सा प्रवेशद्वार है। प्रवेश द्वार के बाद हाल में दूसरी सदी में निर्मित मादा भेड़िये की दो कांस्य प्रतिमाएँ तथा 1000 ई का पुराना विशाल देवदार शंकु (Pinecone)खड़ा है।

राजकीय गिरजाघर –

विश्व में करोलिंगीयन स्थापत्य शैली में निर्मित गिरजाघरों में आचेन कैथेड्रल सर्वाधिक संरक्षित है। अपने विशिष्ट अष्टकोणीय केंद्र के कारण यह अष्टभुज कहलाता है। करोलिंगीयन कालीन स्तम्भ एवं गैलेरी के कांस्य द्वार मौलिक हैं परंतु मूल नक्काशी नष्ट हो गयी है। खूबसूरत संगमरमर के फर्श का निर्माण-काल 1913 ई है। गिरजाघर के केंद्रीय गुंबद से विशाल (4. 2 मीटर) व्यास का कांस्य चक्र , बरबारोसा फानूस लटक रहा है। चार्ल्मग्न को संत की उपाधि मिलने के उपलक्ष्य में फ्रेडेरिक बरबारोसा ने इसको स्थापित करवाया था। 1165-84 के बीच यह आचेन में तैयार किया गया था और बरबारोसा व उसकी पत्नी ने इसको वर्जिन मेरी को समर्पित किया था। विशेष अवसरों पर इसमें मोमबत्तियाँ जला कर प्रकाश किया जाता है जो अतीव मुग्धकारी दिखाई देता है।

फानूस का डिजाइन अलौकिक यरूशलम का प्रतिनिधित्व करता है। यह ईश्वरीय परिकल्पना पर आधारित है लेकिन इसमें केवल आठ स्तम्भ हैं जबकि ईश्वरीय वाणी में दस स्तंभों का वर्णन है। अष्टभुज के गुंबद की भव्य नक्काशी अत्यधिक चित्ताकर्षक है। उसमें प्रभु यीशु को 24 देवदूतों से घिरे हुए दिखाया गया है। आधारशिला से अष्टभुज पर 31 मीटर की ऊंचाई पर गुंबद शोभायमान है। सदियों तक इसको उत्तरी यूरोप का सर्वोच्च गुंबद होने का गौरव प्राप्त होता रहा।

अष्टभुज में वेदी के दायीं तरफ ‘अवर लेडी ऑफ आचेन’ हाथों में नन्हें, चंचल यीशु को लिए खड़ी हैं। प्रतिमा का निर्माण काल 14वीं सदी है। वह कैथेड्रल के संरक्षक देव का प्रतिनिधित्व करती है तथा उसमें चमत्कारिक शक्ति है। 17 वीं सदी से उन पर वस्त्र तथा आभूषण चढ़ाने का प्रचलन है।

ऊपरी गैलेरी में संगमरमर का भव्य राजसिंहासन दर्शनीय है। इस पर 936-1531 ई के बीच 32 पवित्र रोमन सम्राटों का राज्याभिषेक हुआ था। यह राजसिंहासन करोलिंगीयन कालीन है। मान्यता के अनुसार सम्राट चार्ल्मग्न भी राजसिंहासन पर बैठता था यद्यपि उसका राज्याभिषेक रोम में हुआ था। संगमरमर की छह सीढ़ियों के ऊपर स्थित राजसिंहासन पुराने संगमरमर से बना सामान्य सिंहासन है।

गैलेरी के सुंदर स्तम्भ पूर्णरूप से अलंकृत हैं। चार्ल्मग्न ने 32 स्तंभों को रोम तथा रवेना की पुरानी इमारतों से मंगवाया था। उनमें से अधिकांश को फ्रेंच क्रान्ति के समय लूट लिया गया था। बाद में उनमें से 22 स्तंभों को वापिस ला कर गैलेरी में पुनर्स्थापित कर दिया गया। स्तंभों के बीच की जालियों का निर्माण भी चार्ल्मग्न के समय में हुआ था। उन पर रोमन,केल्टिक तथा फ्रेंकिश प्रभाव को दर्शाती खूबसूरत आकृतियाँ बनी हैं।

गोथिक गायक भवन तथा कोषागार-

वेदी के आगे 1414 ई में गोथिक शैली में निर्मित गायक भवन (काँच का गिरजाघर) मुग्धकारी दर्शनीय स्थल है। दीवारों में 100 फीट ऊंची रंग-बिरंगी खिड़कियाँ लगी हैं। मूल खिड़कियां आग में बुरी तरह जल गयी थी, द्वितीय विश्व युद्ध की बमबारी में पूरी तरह नष्ट हो गयी। 1950 ई में काँच की नयी रंग-बिरंगी खिड़कियाँ लगाई गयी।

अष्टभुज के सामने प्रमुख वेदी ‘ पला-द-आरो’ नामक भव्य स्वर्णिम द्वार है। इसका निर्माण काल 1000 ई है। स्वर्णिम पैनल लकड़ी के फ्रेम में जड़े हैं। ‘पला-द-आरो’,’मंडोरला’ ( बादाम के आकार का आभामंडल) के मध्य दाढ़ीविहीन यीशु बैठे हैं, एक हाथ में क्रास पकड़ कर आशीर्वाद दे रहे हैं और दूसरे हाथ में पुस्तक ले रखी है। उनके साथ वर्जिन मेरी, संत माइकेल व बाइबल के चार लेखकों के प्रतीक के रूप में चार छोटे पदक उत्कीर्ण हैं। दस अन्य पैनलों पर यीशु के मनोभावों का चित्रण है।

गायक भवन के समीप दायीं तरफ एक अन्य खजाना है-सोने का भव्य प्रवचन मंच। 1020 ई में निर्मित इसको सम्राट हेनेरिक द्वितीय ने प्रतिस्थापित किया था। स्वर्णजड़ित मंच पर हीरे,जवाहरात, बहुमूल्य रत्न लगे हैं। इनमें पुराने काँच के कटोरे भी हैं। केवल पात्र ही असामान्य नहीं हैं अपितु इसमें मिस्र की हाथीदांत से बनी छह सुंदर मूर्तियाँ भी हैं।

गोथिक गायक भवन में काँच के बॉक्स में रखी दो स्वर्णिम समाधियाँ हैं। अष्टभुज के समीप वर्जिन मेरी की समाधि है, पिछवाड़े में चार्ल्मग्न की समाधि है। वर्जिन मेरी की समाधि का निर्माणकार्य 1238 ई में पूरा हुआ था। इसमें उपरोक्त आचेन के चार भव्य स्मृति चिन्ह संरक्षित हैं। अंतिम छोर पर यीशु तथा पोप लियो तृतीय की प्रतिमाएँ हैं। लम्बी तरफ के कोनों पर सामने की तरफ मेडोना, शिशु तथा चार्ल्मग्न के चित्र उत्कीर्ण हैं। शेष लम्बाई पर 12 देवदूतों के चित्र उत्कीर्ण हैं। छत के पैनलों पर मेरी के जीवन से सम्बद्ध चित्र अंकित हैं।

चार्ल्मग्न की समाधि का निर्माण 1215 ई में हुआ था। इसमें अभी भी सम्राट के अस्थिवशेष संरक्षित हैं। सामने वाले कोने पर चार्ल्मग्न को पोप लियो तृतीय तथा राजदरबार के सदस्य रेम्स के आर्कबिशप टुर्पीन के बीच सिंहासन पर बैठे हुए दिखाया गया है। ऊपर से प्रभु यीशु सम्राट को आशीर्वाद दे रहे हैं।

समाधि की लम्बाई में चार्ल्मग्न तथा फ्रेडेरिक द्वितीय के मध्य शासन करने वाले 16 सम्राटों के चित्र उत्कीर्ण हैं। दूसरे कोने पर वर्जिन मेरी श्रेष्ठ देवदूतों गैब्रियल तथा माइकेल के साथ चित्रित हैं। उनके ऊपर विश्वास,दया, आशा के विशिष्ट गुण अंकित हैं। छत पर चार्ल्मग्न के जीवन से सम्बद्ध ,विशेष रूप से मूर्स के साथ संघर्ष के चित्र उत्कीर्ण हैं। एक चित्र में उन्हें राजकीय गिरजाघर को वर्जिन मेरी को समर्पित करते हुए दिखाया गया है।

1420 ई में पूर्ण किए गए रंगीन काँच की खिड़कियों के मध्य के स्तंभों पर 14 प्रतिमाएँ स्थित हैं- वर्जिन मेरी, 12 देवदूत तथा चार्ल्मग्न की प्रतिमाएँ। गुंबद के ऊपर छत पर भव्य आकृतियाँ चित्रित हैं। गायक भवन की दीवारों पर बाइबल से उद्धृत भित्तिचित्र (1880-!913) उत्कीर्ण हैं।

आचेन नगर में भव्य आचेन कैथेड्रल के अतिरिक्त भी अन्य कई दर्शनीय स्थल हैं। यह सम्पूर्ण विश्व के साथ हवाई मार्ग से जुड़ा है। आचेन का MST एयरपोर्ट प्रमुख नगरों के साथ सम्बद्ध है तथा कुछ ही समय में आचेन पंहुचा जा सकता है। जर्मनी के डसलडोर्फ तथा फ्रैंकफ़र्ट अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट MST से जुड़े हैं। फ्रेंकफ़र्ट, कोलोन, ब्रसल्स तथा पैरिस से तीव्र गति वाली ट्रेन भी चलती है।

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प्रमीला गुप्ता

भव्य सेलेमिए मस्जिद-तुर्की

ओटोमन शैली में निर्मित भव्य, विशिष्ट संरचनाओं में से एक सेलेमिये मस्जिद को ‘नगर का ताज’ कहा जाता है। इसको ‘सुल्तान की आखिरी बिल्डिंग’ भी कहा जाता है। 16वीं सदी की यह स्थापत्य शैली ओटोमन साम्राज्य की भव्यता तथा राजनैतिक शक्ति की परिचायक थी। मस्जिद का सौंदर्य देख कर पर्यटक,दर्शक मंत्रमुग्ध रह जाते हैं।

निर्माण –

आकाश को छूती,सुरुचिपूर्ण, सुव्यवस्थित गुंबद, ऊंची पतली मीनारें ओटोमन कालीन मस्जिद स्थापत्यशैली की विशेषता रही हैं। तुर्की के एडरिने नगर में स्थित सेलेमिये मस्जिद स्थापत्य शैली के दृष्टिकोण से ऐसी ही एक आश्चर्यजनक संरचना है। प्रख्यात वास्तुशिल्पी सिनान की देखरेख में इसका निर्माणकार्य सम्पन्न हुआ था।

सेलेमिये मस्जिद तुर्की के महानगर एडरिने में स्थित है। सुलेमान महान के बेटे सलीम द्वितीय ने 1568-1574 ई के बीच इसका निर्माण करवाया था। एडरिने सलीम का प्रिय नगर था। जब उसके पिता 1548 ई में पर्शिया में विजय अभियान चला रहे थे तब वह इस नगर के बाहर शिकार का आनंद लेता था।

सेलेमिये मस्जिद का निर्माण ओटोमन साम्राज्य के उत्कर्ष काल में हुआ था। साम्राज्य के विस्तार केसेलेमिये साथ-साथ सुल्तान सलीम ने नगर के केन्द्रीकरण की आवश्यकता को अनुभव किया। तत्कालीन वास्तुशिल्पी सिनान से मस्जिद के निर्माण के लिए अनुरोध किया,ऐसी मस्जिद जो अपने आप में विशिष्ट हो तथा नगर के केन्द्रीकरण की आवश्यकता को पूरा कर सके।

सलीम ने इस स्थान का चुनाव केवल अपनी पसंद के आधार पर नहीं किया था बल्कि इसके भौगोलिक, ऐतिहासिक महत्त्व को भी ध्यान में रखा था। ओटोमन साम्राज्य के यूरोपीय क्षेत्र में स्थित एडरिने 15 वीं शताब्दी में इस्तांबुल से पहले ओटोमन साम्राज्य की राजधानी रह चुका था तथा सत्रहवीं शताब्दी तक साम्राज्य का दूसरा महत्त्वपूर्ण नगर था। ओटोमन साम्राज्य में प्रवेश करने के लिए यूरोपवासियों को एडरिने से हो कर गुजरना पड़ता था। यात्रियों पर ओटोमन साम्राज्य की शान-ओ-शौकत प्रदर्शित करने के विचार से सुल्तान सलीम द्वितीय ने इस भव्य संरचना के निर्माण का निर्णय लिया। यही नहीं उस समय इस्तांबुल में गोल्डन हॉर्न तथा पहाड़ियों पर अनेक भव्य मस्जिदें निर्मित थीं अतः एडरिने नगर के सौंदर्य में वृद्धि करने के लिए एक भव्य मस्जिद के निर्माण का विचार सर्वथा उपयुक्त था। कावक मेदिनी उपनगर में निर्मित सेलेमिये मस्जिद परिसर की अत्याधुनिक स्थापत्यशैली के सामने पुरातन, पारम्परिक शैली धूमिल पड़ गयी थी।

संरचना –

सेलेमिये मस्जिद के निर्माण में एक सीमारेखा थी। मस्जिद की इमारत बाहरी गुंबदों तथा भीतर से एकीकृत होनी चाहिए थी न कि अलग-अलग खंडों में विभाजित। इस लक्ष्य प्राप्ति के लिए एक ही मार्ग था-वह था अनेक गुंबदों के स्थान पर केंद्र में एक विशाल गुंबद का निर्माण। सिनान ने ऐसा ही किया। प्रख्यात लेखक ओरहान पामुक के अनुसार-” केंद्र में निर्मित गुंबद साम्राज्य के राजनैतिक, आर्थिक परिवर्तनों के केन्द्रीकरण का परिचायक है ।” सिनान के एक अन्य मित्र लेखक के विचार में-‘ सिनान ने मस्जिद के निर्माण की प्रेरणा इस्तांबुल स्थित हेगीया सोफिया मस्जिद से ली थी।’

इस संदर्भ में स्वयं सिनान कहते हैं-” मैं इस धारणा को मिथ्या सिद्ध करना चाहता था कि हेगीया सोफिया जैसी संरचना का निर्माण असंभव है। सुल्तान के अनुरोध पर मैंने एक स्मारक, एक मस्जिद के निर्माण का काम हाथ में लिया था तथा हेगीया सोफिया मस्जिद के गुंबद से ऊंचे गुंबद का निर्माण करवाया।” इसकी ऊंचाई 31 मीटर है। सिनान ने मस्जिद निर्माण के लिए सर्वश्रेष्ठ तथा सुंदर स्थान चुना। मस्जिद के निर्माण में उस का श्रेष्ठ बुद्धिकौशल, सृजनात्मक डिजाइन तथा अपूर्व तकनीक परिलक्षित होती है। 2,475 वर्ग मीटर विशाल क्षेत्र में निर्मित मस्जिद में 384 खिड़कियाँ हैं इनसे आंतरिक भाग प्रकाश से आलोकित हो जाता है। खिड़कियों की संख्या में हेगीया सोफिया पीछे रह गयी है। रेम्ब्रां ने अपनी पेंटिंग्स में प्रकाश का उपयोग इसी भांति किया था।

मस्जिद की केंद्रीय संरचना को आकर्षक बनाने के लिए पारम्परिक शैली की भिन्न आकार वाली गुंबदों को डिजाइन से निकाल दिया। सिनान के विचार में छोटे तथा आंशिक गुंबदों का समूह विशाल गुंबद को ढक लेगा। केंद्रीय गुंबद को दर्शनीय बनाने के लिए बाहरी प्रांगण के चारों कोनों पर 71 मीटर ऊंची मीनारें मस्जिद के चारों ओर आकाश में राकेट के समान ऊपर उठती हुई दिखाई देती हैं। केंद्र में ऊपर की ओर उठते भव्य गुंबद पर आंशिक गुंबद, टावर तथा दीवारें हैं। मान्यता के अनुसार गोलाकार स्थापत्यशैली मानवीय एकता का प्रतीक तथा जीवन चक्र के सामान्य सिद्धान्त को प्रतिपादित करती है। मस्जिद के बाहरी तथा आंतरिक भाग की दृश्य,अदृश्य सममितियाँ ईश्वरीय संपूर्णता को साधारण पत्थर तथा गुंबद की सामान्य शक्तिशाली संरचना के माध्यम से प्रतिबिम्बित करती हैं।

संरचना में स्वच्छ, खुला आंतरिक भाग विशेष रूप से दर्शनीय है। बाहरी अलंकृत भाग ओटोमन साम्राज्य की शक्ति,समृद्धि का प्रतीक है। भीतरी सामान्य सममित भाग इस तथ्य को स्थापित करता है कि ईश्वर के साथ संवाद तथा संबंध को स्थापित करने के लिए सुल्तान को सदैव हृदय से विनम्र तथा आस्थापूर्ण होना चाहिए। भीतर प्रवेश करने से पहले शाही शान-ओ-शौकत, धन-वैभव तथा शक्ति को विस्मृत कर देना चाहिए। छोटी-छोटी खिड़कियों से छन कर आता प्रकाश, मद्धम रोशनी तथा अंधकार को दूर कर मानवीय तुच्छता को व्याख्यायित करता है।

विशाल परिसर में धार्मिक चिन्ह व अन्य विशिष्ट स्थल –

मस्जिद के भीतर इस्लाम के अनेक धार्मिक चिन्ह अंकित हैं। उदाहरण स्वरूप मस्जिद के नौ दरवाज़ों पर कुरान की आयतें उत्कीर्ण हैं। अद्वितीय विवरणात्मक संगमरमर की शिल्पकला, सुसज्जित टाइलें, काष्ठकला संरचना को भव्यता प्रदान करती है। मस्जिद की ओर जाते समय चार सुंदर मीनारें पर्यटकों का स्वागत करती हैं।

इस विशाल परिसर में मस्जिद के अतिरिक्त लायब्रेरी, हॉस्पिटल, स्कूल, मदरसा ( इस्लाम तथा विज्ञान का शिक्षण संस्थान इस्लामिक एकेडेमी) भी स्थित है। दार-उल-हदिश ( अल हदीथ स्कूल) तथा पंक्तिबद्ध दुकानें हैं। मस्जिद की लायब्रेरी में 2,000 हबुस्तलिखित पांडुलिपियाँ तथा 50 पुस्तकें संग्रहीत हैं।

रहस्यमय चित्रांकन-

मस्जिद का सर्वाधिक आकर्षक,रहस्यमय चित्रांकन है-‘ उलटा ट्यूलिप’। इतिहासकार अभी तक इस उल्टे ट्यूलिप के रहस्य को सुलझा नहीं पाएँ हैं। किंवदंती के अनुसार मस्जिद के स्थान पर पहले ट्यूलिप का गार्डन था। मस्जिद के लिए गार्डन के मालिक को अपना गार्डन बेचना पड़ा। ट्यूलिप गार्डन के बदकिस्मत मालिक के प्रति सहानुभूति दिखाने के विचार से ऐसा किया गया है। खेद प्रकट करने के लिए ट्यूलिप के फूल को उल्टा चित्रित किया गया है। सूर्यास्त के धूमिल प्रकाश में सेलेमिए मस्जिद का मुग्धकारी सौंदर्य अविस्मरणीय है।

बुल्गारिया द्वारा आक्रमण-

1913 ई में बुल्गारिया की तोपों ने एडरिने की मस्जिद के ऊपर गोले बरसाए। गुंबद के सुदृढ़ निर्माण के कारण मस्जिद को ज़्यादा क्षति नहीं पंहुची। मुस्तफा कमाल पाशा के आदेश पर क्षतिग्रस्त भाग की मरम्मत नहीं करवायी गयी ताकि भावी पीढ़ियाँ इससे सबक ले सकें। गुंबद का ऊपरी भाग तथा केंद्र के नीले क्षेत्र की बायीं तरफ गहरे लाल रंग के केलिग्राफ के समीप का क्षतिग्रस्त भाग आज भी देखा जा सकता है।

तुर्की 1982-1995 के 10,000 लीरा के नोट के पीछे सेलेमिये मस्जिद का चित्र अंकित है। मस्जिद अपनी अन्य संरचनाओं सहित 2011 ई में यूनेस्को द्वारा विश्व विरासत की सूची में सम्मिलित कर ली गयी थी।

केंद्र में स्थित होने के कारण मस्जिद तक सुगमतापूर्वक पंहुचा जा सकता है। इस्तांबुल जाएँ तो एडेरिने स्थित सेलेमिये मस्जिद को देखना न भूलें। यहाँ पर तुर्की के स्वादिष्ट व्यंजनों का स्वाद भी चखा जा सकता है।

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प्रमीला गुप्ता

वैभवशाली नागरिक सभ्यता का प्रतीक-मोहन-जो-दड़ो

1921 ई में जब दयाराम साहनी ने हड़प्पा क्षेत्र में उत्खनन कार्य आरंभ किया तब पूरा विश्व भारत के प्राचीनतम सांस्कृतिक वैभव को देख कर स्तब्ध रह गया था। विश्व के समक्ष 2,500 ई पू भारत की एक ऐसी सभ्यता सामने आई जिस की तुलना में विश्व की अन्य प्राचीनतम सभ्यताओं का विकासक्रम नगण्य था। यह तथ्य तत्कालीन पुस्तकों से , उनमें लिखित सामग्री अथवा अन्य पठनीय लेखों से नहीं अपितु वहाँ से उत्खनित सामग्री से प्रकट हुआ था । हड़प्पा और मोहन-जो-दड़ो नामक दो स्थानों पर विश्व की प्राचीनतम सभ्यता के पुरातत्त्वशेष प्राप्त हुए हैं। इसको ‘हड़प्पा सभ्यता’ अथवा ‘सिंधु सभ्यता’ भी कहा जाता है। यद्यपि इसका विस्तार बलूचिस्तान, सिंध , हरियाणा, गुजरात,पंजाब , राजस्थान, पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक था तथापि मोहन-जो-दड़ो में सर्वाधिक वैभवशाली पुरातत्त्वशेष प्राप्त हुए हैं.

‘मोहन-जो-दड़ो’ एक सिंधी शब्द है। इसका अर्थ है-‘ मूर्दों का टीला’। वास्तव में इस का मूल नाम ‘मूर्दों का टीला’ नहीं था, मूल नाम आज भी अज्ञात है। इतिहासकारों, पुरातत्त्ववेत्ताओं ने क्षेत्रीय नामों के आधार पर इस नगर का नाम ‘मोहन-जो-दड़ो रख दिया।

खोज-

मोहन-जो-दड़ो की पुरातात्त्विक खोज 1922 ई में राखाल दास बैनर्जी ने की थी। भारतीय पुरातात्त्विक सर्वेक्षण के तत्कालीन महानिदेशक जॉन मार्शल के निरीक्षण में उत्खनन कार्य आरंभ हुआ। उत्खनन में बड़ी मात्रा में इमारतें, धातुओं की मूर्तियाँ, मोहरें तथा अन्य सामान मिला। पिछले सौ वर्षों में अबतक इस नगर के केवल एक तिहाई भाग की खोज हो सकी है। अब काफी समय से उत्खनन कार्य बंद है। अनुमानतः यह क्षेत्र 200 हेक्टेयर भूमि पर फैला हुआ था। वर्तमान में पाकिस्तान में सक्खर जिले में स्थित है। यह विश्व का प्राचीनतम, सुनियोजित तथा विकसित नगर माना जाता है।

विश्व की चार प्राचीन नदी घाटी सभ्यताओं-पुरातन मिस्र, मेसोपोटेमिया, क्रेटे, मोहन-जो-दड़ो में मोहन-जो-दड़ो की सभ्यता सर्वाधिक विकसित थी। 1980 ई में यूनेस्को ने मोहन-जो-दड़ो के पुरातत्त्वशेषों को सांस्कृतिक विश्व विरासत की सूची में स्थान दिया था।

इस सभ्यता के प्रकाश में आने से भारत का गौरवशाली इतिहास प्रागैतिहासकाल से बहुत पीछे चला जाता है। जिस समय पाश्चात्य जगत अज्ञानता के अंधकार में विलीन था उस समय एशिया महाद्वीप के भारत में अत्यधिक विकसित सभ्यता का साम्राज्य था।

मोहन-जो-दड़ो की खुदाई में प्राप्त लिपि को समझने में आज भी भाषाविद, इतिहासकार माथा-पच्ची कर रहे हैं। आज भी रहस्य बरकरार है।

नगर निर्माण-

यह एक तथ्य है कि मोहन-जो-दड़ो अपने समय का उत्कृष्ट रूप से नियोजित नगर था। पुरातत्त्वशेषों में अनेक ऐसे उपकरण प्राप्त हुए हैं जिन का उपयोग आज भी निर्माण कार्यों में किया जाता है। वहाँ की चौड़ी सड़कों और गलियों में आराम सेघूमा जा सकता है। यह नगर आज भी वहीं पर स्थित है। यहाँ की सड़कें चौड़ी थी तथा उत्तर से दक्षिण व पूर्व से पश्चिम की ओर जाती थीं। इमारतें ऊंचे-ऊंचे चबूतरों पर अलग खंडों में बनी हुई थी। इमारतों का निर्माण पक्की ईंटों से किया गया था। दीवारों की मोटाई, सीढ़ियों , दीवारों में काटी गयी नालियों से स्पष्ट है कि इमारतें बहुमंज़िली भी होती थी। घरों में आँगन, कमरे, शौचालय आदि की व्यवस्था होती थी। नालियों की व्यवस्थता तथा स्वच्छता का जैसा प्रबंध मोहन-जो-दड़ो में है वैसा विश्व के किसी भी देश में शताब्दियों तक देखने को नहीं मिलता।

प्रसिद्ध जलकुंड-

मोहन-जो-दड़ो की प्रसिद्ध इमारतों में ‘विशाल स्नानागार’ विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यह दैव-मार्ग गली में स्थित लगभग 40 फीट लम्बा और 25 फीट चौड़ा जलकुंड है। इसकी गहराई 7 फीट है। भीतर जाने के लिए उत्तर और दक्षिण में सीढ़ियाँ बनी हैं। कुंड के तीन ओर साधुओं के लिए कक्ष बने थे। उत्तर में दो पंक्तियों में आठ स्नानघर थे। इन का निर्माण बहुत कुशलता के साथ किया गया था। किसी भी स्नानघर का द्वार दूसरे स्नानघर के सामने नहीं खुलता था। जलरोधी बनाने के लिए जलकुंड का फर्श ईंटों को अच्छी तरह से घिस कर बनाया गया था। दीवारों के पीछे 2.54 से.मी मोटे बिटूमेन का लेप किया गया था। कुंड में पानी भरने के लिए समीप ही कुआं था और गंदे पानी की निकासी के लिए ऊंची मेहराबदार नाली थी। जॉन मार्शल के अनुसार उस समय उपलब्ध सामग्री से इससे अधिक सुंदर और मजबूत निर्माण कर पाना असंभव था।

अन्नागार-

जलकुंड के पश्चिम में एक विशाल अन्नागार था। यह सत्ताईस खंडों में विभाजित था। इसमें संग्रहीत अनाज को भूमितल की नमी से बचाने के लिए हवा गुजरने के लिए बीच में एक संकरी गली थी। ऊपरी भाग लकड़ी के खंभों पर टिका था। उस समय जब सिक्कों का प्रचलन नहीं रहा होगा तब अन्नागार का महत्त्व आर्थिक रूप से अत्यधिक रहा होगा। कर अनाज के रूप में वसूल किया जाता होगा और वेतन भी अनाज के ही रूप में दिया जाता होगा।

कृषि-

खुदाई में इस बात के प्रमाण मिले हैं कि यह सभ्यता कृषि और पशुपालन पर आधारित रही होगी। यहाँ पर खेती के लिए सिंध के पत्थरों और राजस्थान के तांबे से बनाए गए उपकरणों का उपयोग होता था। उत्खनन में गेंहू, सरसों, कपास, जौ और चने की खेती के प्रमाण मिले हैं। यहाँ पर कई प्रकार की खेती होती थी। कपास को छोड़ कर अन्य सभी बीज़ यहाँ पर मिले हैं। विश्व में सूट के सबसे पुराने दो कपड़ों में से एक का नमूना यहीं पर मिला था। खुदाई में यहाँ पर कपड़ों की रंगाई करने का एक कारख़ाना भी मिला है।

नगर नियोजन-

मोहन-जो-दड़ो की इमारतें यद्यपि अब खंडहरों में परिवर्तित हो चुकी हैं तथापि सड़कों तथा गलियों के विस्तार को स्पष्ट करने के लिए ये पुरातत्त्वशेष ही पर्याप्त हैं। सड़कों का निर्माण ग्रिड प्रणाली पर आधारित है। पूर्व में सम्पन्न लोगों का इलाका है क्योंकि यहाँ पर बड़े घर,चौड़ी सड़कें तथा बहुत सारे कुएं हैं। नगर की सड़कें इतनी चौड़ी हैं कि दो बैलगाड़ियाँ एक साथ गुजर सकती हैं। बिशेष रूप से उल्लेखनीय बात यह है कि सड़क की तरफ घरों का पिछवाड़ा है, प्रवेशद्वार अंदर गली में है। स्वास्थ्य, प्रदूषण के दृष्टिकोण से नगर निर्माण की योजना अद्वितीय है।

जल-संस्कृति-

इतिहासकारों के मतानुसार मोहन-जो-दड़ो सिंधु घाटी सभ्यता कुएं खोद कर भूजल तक पंहुचने वाली पहली सभ्यता है। यहाँ पर लगभग 700 कुएं पाए गए हैं। बेजोड़ जलनिकासी, कुओं, बावड़ियों और नदियों को देख कर कहा जा सकता है कि ‘मोहन-जो-दड़ो सभ्यता वस्तुतः जल संस्कृति थी।

कला,शिल्प-

मोहन-जो-दड़ो के निवासी उत्कृष्ट शिल्पकार व कलाकार थे। वास्तुकला अथवा नगर निर्माण ही नहीं अपितु धातु और पत्थर की मूर्तियाँ, मृदाभांडों पर मानव, वनस्पति, पशु-पक्षियों का चित्रांकन, मोहरें, उनपर उत्कीर्ण महीन आकृतियाँ, खिलौने, केश विन्यास,आभूषण और सुंदर लिपि से सिंधु सभ्यता की तकनीकी निपुणता के साथ-साथ सुरुचिपूर्ण कला और शिल्प का भी पता चलता है। पुरातत्त्ववेत्ताओं के अनुसार सिंधु सभ्यता की विशेषता उसका सौंदर्यबोध है। यह राजपोषित अथवा धर्मपोषित न हो कर समाजपोषित थी। मोहन-जो-दड़ो उत्खनन में एक विशेषता देखने को मिलती है। यहाँ पर कोई महल,मंदिर अथवा स्मारक नहीं मिले। पुरातत्त्वशेषों के आधार पर यह निष्कर्ष निकलता है कि मोहन-जो-दड़ो में राजसत्ता न हो कर लोकतन्त्र था। लोग सुशासन, विनम्रता और स्वच्छता में विश्वास करते थे। युद्ध का कहीं कोई नामोनिशान नहीं था।

धर्म-

इस सभ्यता में धर्म ने प्रकृति से चल कर देवत्व तक की यात्रा निर्धारित थी। एक ओर वृक्ष पूजा के साक्ष्य मिलते हैं तो दूसरी ओर पशुपति शिव की मूर्ति तथा देवी की पूजा के व्यापक प्रमाण मिलते हैं। यहाँ प्राप्त चित्रण से ज्ञात होता है कि उस समय देवता और दानव दोनों ही उपास्य थे। अध्यात्म और कर्मकांड दोनों विद्यमान थे। धडविहीन ध्यानावस्थित सन्यासी की आकृति आध्यात्मिक चेतना की प्रतीक है तो देवी के सन्मुख पशुबलि के लिए बंधे बकरे की आकृति गहनतम कर्मकांड की प्रतीक। प्रमुख धार्मिक स्वरूप शैवधर्म, शिव आर्यों के पूर्व भारत के मूलवासियों तथा आर्येत्तर जातियों के आराध्य रहे हैं। शिव उत्पादन के देवता के रूप में उपास्य थे। शिव के साथ बैल का चित्रण उनका उस काल के उत्पादक देवता होने का बोध कराता है। आज भी कृषि में बैलों तथा सांडों का उपयोग होता है। शिव पूजा का प्रारम्भ हड़प्पा काल से माना जाता है। पुरातत्त्वशेषों में कुछ मुहरों पर स्वस्तिक तथा सूर्य का चिन्ह इस ओर संकेत करते हैं कि उस समय वैष्णव सम्प्रदाय पूर्णरूप से विकसित न हुआ हो परंतु उसका बीजारोपण हो चुका था। आदिकाल से ही सभ्यताओं में शक्ति पूजा का विधान रहा है। सिंधु घाटी सभ्यता में भी देवी की उपासना के साक्ष्य मिलते हैं। शक्ति की उपासना पृथ्वी से सम्बद्ध है वहीं से आरंभ होती है ‘मातृदेवो’ की भावना। मोहन-जो-दड़ो में एक मुद्रा पर अंकित सात मानव आकृतियाँ ‘सप्तमातृका’ का बोध करवाती है। वह युग धार्मिक मान्यताओं और विश्वासों का युग रहा होगा। तंत्र-मंत्र भी प्रचलन में रहा होगा।

संग्रहालय-

मोहन-जो-दड़ो में स्थित संग्रहालय छोटा ही है। प्रमुख वस्तुएँ कराची, लाहोर, दिल्ली और लंदन के संग्रहालयों में संरक्षित हैं। यहाँ पर काला पड़ गया गेंहू, तांबे और कांसे के बर्तन,मुहरें, चाक पर बने विशाल मृदाभांड, उन पर चित्रित काले-भूरे चित्र, चौपड़ की गोटियाँ, दीये, माप-तौल के पत्थर, मिट्टी की बैलगाड़ी और दूसरे खिलौने, दो पाटों वाली चक्की, कंघी, रंग-बिरंगे पत्थरों के मनकों वाले हार और पत्थर के औज़ार रखे हुए हैं। संग्रहालय में रखी वस्तुओं में सूइयाँ भी हैं। खुदाई में तांबे और कांसे की बहुत सारी सुइयां मिली थी। इन में से एक सुई दो इंच लम्बी थी। काशीनाथ दीक्षित को सोने की तीन सुइयां मिली थी। समझा जाता है कि ये सुइयां महीन कशीदाकारी के काम में आती होंगी। इन के अतिरिक्त हाथीदांत और तांबे के सुए भी मिले हैं।

पतन-

सिंधु घाटी सभ्यता के विलुप्त होने का अभी तक कोई ठोस कारण नहीं मिला है। कुछ इस का कारण प्राकृतिक आपदाएँ,भूकम्प इत्यादि मानते हैं जबकि अन्य रेडियो एक्टिव विकिरणों को इस विनाश का कारण मानते हैं। जो भी हो मोहन-जो-दड़ो के आँचल में छिपा है एक गौरवशाली सभ्यता-संस्कृति का इतिहास।

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प्रमीला गुप्ता