बोरोबुदूर-विश्व का विशालतम बौद्ध मंदिर

दक्षिण-पूर्वी एशिया में स्थित इन्डोनेशिया के मध्य जावा प्रांत में है विश्व का विशालतम महायान बौद्ध मंदिर-बोरोबुदूर। ‘ बोरोबुदूर’ शब्द की व्युतपत्ति दो शब्दों के समनव्य से हुई है। ‘बोरो’ अर्थात ‘विशाल’ व ‘बुदूर’ अर्थात ‘बुद्ध’। अतः विशाल बुद्ध। जावा की स्थानीय भाषा में ‘बुदूर’ का अर्थ पर्वत भी है। एक उच्च पर्वत की भांति उन्नत शीर्ष के साथ खड़े ‘बोरोबुदूर’ मंदिर का यह अर्थ भी सार्थक दिखाई देता है। दो ज्वालामुखी पर्वतों व नदी के बीच स्थित होने के कारण यहाँ की भूमि अत्यधिक उपजाऊ है।

पुरातत्त्वविदों के अनुसार बोरोबुदूर का निर्माण आठवीं सदी में प्रारम्भ हुआ था। उस समय शैलेंद्र राजवंश के सम्राट श्री विजय का शासन था। इसका निर्माणकार्य लगभग तीन सदियों (आठवीं से दसवीं) तक चला लेकिन इसकी सम्पूर्ण रूपरेखा प्रारम्भ में ही परिकल्पित कर ली गयी थी। यही कारण है कि कई चरणों में निर्मित होने के बाद भी इसके विभिन्न भागों में अपूर्व सामंजस्य देखने को मिलता है। मान्यता के अनुसार इस विशाल अद्वितीय संरचना के वास्तुशिल्पी गुणधर्मी थे लेकिन उनके जीवन के संबंध में अधिक कुछ ज्ञात नहीं है।

पंद्रहवीं शताब्दी में मुस्लिम आधिपत्य के बाद जनसामान्य ने इस स्थान का परित्याग कर दिया था। धीरे-धीरे यह विशाल मंदिर मानव दृष्टि से ओझल हो गया। इर्द-गिर्द घना जंगल उग आया। कई सदियों तक यह ज्वालामुखी की राख़ और घने जंगल तले दब कर इसी प्रकार मानव दृष्टि से ओझल रहा।

खोज व पुनर्निर्माण-

इस विलुप्त स्थान की खोज 1907 ई में लेफ्टिनेंट थॉमस स्टेमफोर्ड रैफल्स ने की थी। वे उस समय मध्य जावा के ब्रिटिश गवर्नर थे। उन्होने डच इंजीनियर एच.सी. कार्नेलिउस की सहायता से 20 वर्ष के अथक प्रयास से विश्व की इस अमूल्य सम्पदा के पुरातत्त्वशेष खोज निकाले। इसकी खोज व जीर्णोद्धार का श्रेय रैफल्स के अथक प्रयासों को जाता है।

इन्डोनेशिया सरकार ने यूनेस्को के सहयोग से इसका पुनर्निर्माण कार्य आरंभ किया। दोनों की संयुक्त परियोजना के अंतर्गत बोरोबुदूर का पुनर्निर्माण कार्य 1973 ई में पूरा कर लिया गया था। 1991 ई में यूनेस्को की विश्व विरासत समिति मे बोरोबुदूर को सांस्कृतिक धरोहर स्थल के रूप में मान्यता प्रदान कर दी थी। पुनर्निर्माण के बाद यह मंदिर सम्पूर्ण विश्व के बौद्ध श्रद्धालुओं तथा पर्यटकों के आकर्षण का विशिष्ट केंद्र बन गया था।

संरचना-

मंदिर एक विशाल चबूतरे पर निर्मित है। चबूतरे पर एक के ऊपर एक नौ वेदिकाएँ बनी हुई हैं। नीचे से ऊपर पहली छह वेदिकाएँ वर्गाकार हैं तथा ऊपर की तीन वेदिकाएँ वृत्ताकार हैं। सब से ऊपर की वेदिका के ऊपर वृत्ताकार स्तूप निर्मित है।

नीचे की छह वेदिकाओं के चारों तरफ परिक्रमापथ बना हुआ है। परिक्रमापथ के दोनों ओर भित्तियों पर भगवान बुद्ध व बोधिस्त्वों के जीवन से सम्बद्ध सुंदर चित्र उत्कीर्ण हैं। प्रत्येक मंज़िल के प्रवेशद्वार पर दोनों ओर द्वारपाल के रूप में सिंह की प्रतिमा अवस्थित है। ऊपर जाने के लिए सीढ़ियों की व्यवस्था है।

मंदिर के निर्माण में पत्थरों का उपयोग हुआ है। उस काल में इतने पत्थरों को एक स्थान पर किस प्रकार एकत्रित किया गया होगा, यह मानवबुद्धि से परे की बात है।

ऊपरी तीन स्तूपों की संरचना, ज्यामितीय व समरूपता आश्चर्यजनक रूप से अद्वितीय है। सम्पूर्ण संरचना पत्थरों को आपस में जोड़ कर की गयी है। जोड़ने के लिए गारे,चूने अथवा कीलों का उपयोग नहीं किया गया है। स्तूपों में बने छिद्रों से बाहर झाँका जा सकता है। प्रत्येक स्तूप कमलपुष्प के आकार में खिला है।

जालीदार छिद्रों वाले प्रत्येक छिद्र में भगवान बुद्ध की प्रतिमा धर्मचक्र परिवर्तन मुद्रा में अवस्थित है। यह मुद्रा गतिमान धर्मचक्र की प्रतीक है। दुर्भाग्यवश बुद्ध की अधिकांश प्रतिमाएँ शीर्षरहित हैं। केवल धड़ बचा है। इन बौद्ध प्रतिमाओं के शीर्ष विश्व के अनेक संग्रहालयों अथवा व्यक्तिगत संग्रहालयों में देखे जा सकते हैं।

ऊंचाई से देखने पर बोरोबुदूर एक स्तूप की भांति दिखाई देता है। इसका ज्यामितीय तलविन्यास ‘बौद्ध मंडला’ अथवा हिन्दू ‘श्री यंत्र’ की तरह दिखाई देता है। बोरोबुदूर का स्तूप अपनी विशालता में मिस्र के महान पिरामिड की याद दिलाता है। एक विद्वान ने तो बोरोबुदूर को पिरामिड के ऊपर निर्मित स्तूप बता डाला है।

वर्तमान में यह मंदिर विश्व में महायान बौद्ध धर्म का केंद्र माना जाता है। वस्तुतः यह विज्ञान तथा कला का अद्वितीय, अपूर्व सम्मिश्रण है। इसको देख कर मानवबुद्धि अचंभित हो जाती है।

भीतरी भाग-

मंदिर के भीतर 500 से अधिक शीर्ष रहित बौद्ध प्रतिमाएँ हैं। निचली मंज़िलों में पद्मासन में अवस्थित अधिकांश प्रतिमाएँ शीर्षरहित हैं। कुछ प्रतिमाएँ अन्य मुद्राओं में भी दिखाई देती हैं। ये मुद्राएँ हैं-

भूमि स्पर्श मुद्रा-

‘पृथ्वी साक्षी है’ अर्थात महाज्ञान की प्रतीक है।

वरद मुद्रा-

‘दान व परोपकार’ ( दानवीर बुद्ध की प्रतीक है)।

अभय मुद्रा-

‘ साहस व निर्भयता,’ संरक्षक बुद्ध की प्रतीक है।

ध्यान मुद्रा-

‘एकाग्रता व ध्यान’, समाधिस्थ भगवान बुद्ध

धर्मचक्र परिवर्तन मुद्रा-

यह गतिमान धर्मचक्र की प्रतीक है।

वितर्क मुद्रा-

‘तर्क एवं पुण्य’ की द्योतक है।

तीन लोकों का निरूपण-

मंदिर के तीन भाग प्रतीकात्मक रूप से ब्रह्मांड के तीन लोकों का निरूपण करते हैं। ये साधना के तीन चरणो को व्याख्यायित करते है: –

कामधातु-(इच्छाओं का संसार)-

यह मानव जीवन का निम्न स्तर है। इसमें मानव इच्छाओं के संसार में विचरण करता रहता है। निम्न वेदिकाओं की भित्तियों पर बोधिसत्वों की जातक कथाएँ उत्कीर्ण हैं।

रूपधातु-(रूपों का संसार)-

इच्छाओं को संयमित करने के बाद मानव इस स्तर पर पंहुच जाता है। इसको सगुण रूप माना गया है। इस स्तर की भित्तियों पर अंकित चित्र बुद्ध की इच्छा से अनिच्छा तक पंहुचने की यात्रा को दर्शाते हैं।

अरूप धातु (रूप रहित संसार)-

मूलभूत व विशुद्ध स्तर पर मानव व्यावहारिक वास्तविकता से ऊपर उठ कर ‘निर्वाण प्राप्ति’ कर लेता है। यह संत कबीर की भांति निर्गुण उपासना का प्रतीक है। इस स्तर के खंडों पर न कोई चित्र अंकित है न ही कोई शिल्पाकृति।

भित्तिचित्र-

बोरोबुदूर में भव्य अलंकरण देखने को मिलता है। अलंकृत भित्तियों को एक कतार में रख देने पर उनकी लम्बाई पाँच कि.मी होगी। मंदिर की भित्तियों तथा भीतरी भाग में कथा चित्र उत्कीर्ण हैं। चित्रों में मानव आकृति को त्रिभंग रूप में उकेरा गया है। इनमें वस्त्र, केश विन्यास, आभूषणों तथा पशुओं का भी सूक्ष्म चित्रण है। तत्कालीन जनसामान्य के जीवन को भी उकेरा गया है। भगवान बुद्ध के जीवन से सम्बद्ध घटनाओं का चित्रण अतीव भाव प्रवणता से किया गया है। उनके जन्मस्थान, अश्व,बोधिवृक्ष इत्यादि के चित्र मनोहारी हैं। भारत की एलोरा गुफाओं की भांति ही संभवतः इन चित्रों में भी चटक रंगों का उपयोग किया गया हो।

किंवदंती है कि किसी समय बोरोबुदूर मंदिर झील के मध्य स्थित था और पानी पर तैरता हुआ दिखाई देता था। आधुनिक पुरातत्त्ववेताओं के मतानुसार हो सकता है कि किसी समय मंदिर के समीप कोई झील रही हो लेकिन मंदिर झील के मध्य स्थित नहीं था। जलनिकासी के लिए मगरमच्छ की आकृति का निकासमार्ग बना हुआ था।

बोरोबुदूर मंदिर तीन कतारबद्ध मंदिरों की शृंखला में से एक माना जाता है। अन्य दो मंदिर हैं- पवन तथा मेदुल। बोरोबुदूर मंदिर विश्व का सर्वाधिक विशाल बौद्ध मंदिर है। इसकी शिल्पाकृतियाँ सजीव व भाव प्रवण हैं। विशालता में अद्भुत रहस्यात्मकता है। इसके सृजनकर्ताओं ने भगवान बुद्ध की महानता से प्रभावित हो कर इस विशाल स्मारक के निर्माण करवाने का निर्णय लिया होगा। उन्होने पूरी आस्था के साथ आकार और भव्यता के दृष्टिकोण से इस अप्रतिम स्मारक का निर्माण करवाया।

इन्डोनेशिया सरकार तथा यूनेस्को के अथक प्रयासों के फलस्वरूप इस मंदिर का पुनर्निर्माण हो पाया। यूनेस्को ने इसको 1991ई में इसको विश्व विरासत घोषित कर दिया था। अब यह श्रद्धालुओं के लिए पुनः तीर्थस्थल तथा आस्था का केंद्र बन गया है। वर्ष में एक बार मई अथवा जून मास में पूर्णिमा के दिन श्रद्धालु सिद्धार्थ गौतम का जन्म,निधन, बुद्ध शाक्यमुनि के रूप में ज्ञान प्राप्ति के उपलक्ष्य में ‘वैशाख’ उत्सव मनाते हैं।

मंदिर में दर्शन करने का सर्वोत्तम समय सूर्योदय का समय है। इसके लिए दर्शनार्थियों को रात्रि की निद्रा का परित्याग करना पड़ता है। मध्य जावा में स्थित बोरोबुदूर मंदिर सम्पूर्ण विश्व से सम्बद्ध है। इन्डोनेशिया की राजधानी जकारता के अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर विश्व के सभी देशों की विमान सेवाएँ उतरती हैं। बोरोबुदूर जोगजकारता से 40 कि.मी दूर है। यहाँ के हवाई अड्डे पर जकारता,बाली, सिंगापुर की विमान सेवाओं द्वारा पंहुचा जा सकता है। जोगजकारता में आवास,खान-पान की समुचित व्यवस्था है। बोरोबुदूर का भ्रमण करने के लिए पर्यटकों को सुविधापूर्वक आटो, टैक्सी मिल जाती हैं। बोरोबुदूर में भी रहने के लिए आवासगृह हैं। वहाँ जाने के लिए अगस्त से अक्तूबर के मध्य का समय उचित है। मंदिर के समीप ही स्मृति चिन्हों की दुकान है। इच्छा होने पर खरीदे जा सकते हैं। किसी भी पर्यटक के लिए विश्व के विशालतम, भव्य बौद्ध स्मारक ‘बोरोबुदूर’ अविस्मरणीय होगी।

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प्रमीला गुप्ता

पैरिस का ऐतिहासिक नोटरे-डेम-कैथेडरल-

दुनिया का खूबसूरत शहर,फ्रांस की राजधानी,पैरिस। सीन नदी के तट पर स्थित पैरिस शहर के केंद्र में है गोथिकस्थापत्यशैली में निर्मित विश्व विख्यात ‘नोटरे -डेम-कैथेडरल। 1991 ई में यूनेस्को ने अनेक अद्वितीयस संरचनाओं सहित पैरिस नगर को विश्व विरासत घोषित कर दिया था। नोटरे-डेम-कैथेडरल भी उन अद्वितीय संरचनाओं में से एक है। प्रारम्भ में इस स्थान पर रोमनवासियों द्वारा ज्यूपिटर का मंदिर था। उसके बाद यहाँ पर क्रिश्चियन गिरजाघर का निर्माण हुआ। तत्पश्चात 528 ई में चाइल्डबर्ट ने यहाँ पर सेंट एंटीयन का चर्च निर्मित करवाया।

पैरिस नगर नित्यप्रति विकसित हो रहा था,जनसंख्या में वृद्धि हो रही थी। तब पैरिस के बिशप मारिस-द-सली ने ‘वर्जिन मेरी’ को समर्पित विशाल नए चर्च के निर्माण की योजना बनाई। चर्च का निर्माणकार्य 1163 ई में प्रारम्भ हो गया था लेकिन इसको पूरा होने में 180 वर्ष लग गए। 1345 ई में निर्माण कार्य पूरा हुआ। उस अज्ञानता, अशिक्षा के समय में भी कैथेडरल के प्रवेशद्वारों पर तथा रंगीन काँच की खिड़कियों पर बाइबल से उद्धृत चित्र व आख्यान उत्कीर्ण हैं।

1183 ई में कैथेडरल में गायक मंडली के लिए बैठने का कक्ष बन जाने के बाद मध्य भाग का निर्माण कार्य शुरू हुआ जो 1208 ई में पूरा हुआ। पश्चिम के बाहरी भाग तथा गुंबदों का निर्माण 1225-1250 ई के बीच पूरा हुआ। 1235-50 के मध्य केंद्र में अन्य कई गिरजाघर निर्मित किए गए। 1250-67 ई के बीच जीन-द- चेलेस तथा पियरे-द- मोंट्रियल ने गलियारों तथा 1296-1330 के मध्य पियरे-द-चेलेस व जीन रेवी ने पूर्वी छोर का मेहराबदार भाग निर्मित करवाया। भित्तियों पर प्रारम्भिक गोथिक शैली में महीन नक्काशी उत्कीर्ण है।

इतिहास-

नोटरे-डेम कैथेडरल का इतिहास सदियों पुराना तथा संघर्षपूर्ण है। प्रारम्भ में धर्मयुद्ध पर प्रस्थान करने से पहले योद्धा यहाँ पर प्रार्थना करने के लिए आते थे। कैथेडरल के भीतर मधुर ध्वन्यात्मक संगीत का जन्म हुआ। फ्रेंच क्रान्ति के समय क्रांतिकारियों ने पूरे फ्रांस के कैथेडरलों के साथ नोटरे-डेम को भी तहस-नहस कर डाला। पश्चिम द्वार के ऊपर निर्मित संतों की प्रतिमाओं को जनसमूह ने सम्राटों की प्रतिमाएँ समझ कर खंडित कर डाला। कैथेडरल की बहुमूल्य वस्तुओं को या तो नष्ट कर दिया या फिर लूट लिया। केवल विशाल घंटे ही संरक्षित रहे। क्रांतिकारियों ने पहले तो कैथेडरल में तर्क सम्प्रदाय की स्थापना की बाद में इसको ईश्वर को समर्पित कर दिया। नेपोलियन प्रथम ने इसी कैथेडरल में राजसत्ता को चर्च के ऊपर अधिमान्यता प्रदान की । अपने सिर पर स्वयं ही सम्राट का ताज रखा,उसके बाद अपनी पत्नी, साम्राज्ञी को ताज पहनाया। उस समय यह कार्य आर्कबिशप करता था। उस अवसर पर उपस्थित पोप पायस पंचम ने भी इस पर किसी प्रकार की आपत्ति नहीं की। 18वीं सदी के युवा साहित्यकारों ने इन मध्यकालीन संरचनाओं को उपेक्षा की दृष्टि से देखा। यही नहीं कैथेडरल में रंगीन काँच के स्थान पर सादे काँच के शीशे लगवा दिये। 19वीं सदी के रोमांटिक कलाकारों, साहित्यकारों ने इस भव्य संरचना को नए दृष्टिकोण से देखा। 19वीं सदी के विक्टर ह्यूगो तथा इंग्रेस जैसे प्रख्यात साहित्यकारों व कलाकारों ने कैथेडरल की दुर्दशा के प्रति जनसामान्य का ध्यान आकर्षित किया तथा इसके संरक्षण के प्रति जागरूकता उत्पन्न की। 1844 ई में कैथेडरल का पुनर्निर्माण कार्य आरंभ हुआ जो तीन साल तक चला। यूजेन एमेन्यूल, वायलट-ल-डक ने केंद्र के पूर्वी भाग की खिड़कियों को पुनर्निर्मित करवाया, पश्चिमी दिशा के बाहरी भाग की ध्वस्त प्रतिमाओं का भी पुनर्निर्माण करवाया।

गुलाबी रंग की खिड़कियों तथा प्रतिमाओं की पुनर्स्थापना के बाद वायलट-ल-डक ने अपनी वैज्ञानिक सोच तथा सृजनशीलता के आधार पर नोटरे-डेम के ऊपर गुंबद बनवाए, पवित्र बर्तनों को रखने के लिए भी स्थान बनवाया। 19वीं शताब्दी में बैरन हाउसमन ने कैथेडरल की मनमोहक दृश्यावली को अवरुद्ध करने वाली आसपास की इमारतों को तुड़वा दिया।

1871 ई में विप्लवकारियों ने कैथेडरल में आग लगा दी। भीतर रखी कुर्सियों का ढेर आग में जल कर राख़ हो गया लेकिन कैथेडरल को किसी प्रकार का नुकसान नहीं पंहुचा। 1768 ई में भूगोलविदों ने निर्णय लिया कि फ्रांस के किसी भी स्थान की दूरी का मापन केंद्र नोटरे-डेम कैथेडरल होगा। 176 वर्ष बाद द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के उपरांत फ्रांस स्वतंत्र हुआ। तब वापिस लौटने पर जनरल-द- गाल ने कैथेडरल में धन्यवादस्वरूप प्रार्थना की थी। नोटरे-डेम आज भी फ्रांस का केंद्रस्थल माना जाता है।

स्थापत्य कला-

इतिहास की अपेक्षा कैथेडरल की स्थापत्यकला अधिक दर्शनीय व मुग्धकारी है। विश्व के व्यस्ततम नगर पैरिस में स्थित होने के कारण यह पर्यटकों का सर्वाधिक लोकप्रिय आकर्षण है। किसी अन्य कैथेडरल की तुलना में यहाँ पर अधिक पर्यटक आते हैं।

नोटरे-डेम का बाहरी अलंकृत, नक्काशीदार भाग विश्व विख्यात एवं लोकप्रिय है। इसका चित्र अधिकांश पोस्टकार्डों व ट्रैवल गाइड्स पर मुद्रित है। इसका कारण तत्कालीन स्थापत्यशैली में दिखाई न देने वाला बाहरी भाग में डिजाइन की समरूपता तथा उत्कृष्ट शिल्प है।

विशाल प्लाज़ा-

19वीं सदी में हाउसमन द्वारा डिजाइन किए गए नोटरे-डेम के विशाल प्लाज़ा से कैथेडरल के बाहरी तीन भव्य नक्काशीदार प्रवेश द्वार दिखाई देते हैं। यद्यपि इन का निर्माण 13 वीं शताब्दी में हो चुका था तथापि बाद में अधिकांश प्रतिमाएँ व नक्काशी नष्ट हो गयी थी। बाद में उन का पुनर्निर्माण किया गया। प्रवेशद्वार पूर्णरूप से सममित (सिमीट्रिकल) नहीं हैं। मध्यकालीन स्थापत्यकला में सममिति का होना अनिवार्य नहीं था।

बायाँ प्रवेशद्वार-

इस प्रवेशद्वार पर वर्जिन मेरी के जीवन से सम्बद्ध चित्रों के साथ-साथ राज्याभिषेक का चित्र व खगोलीय कैलेंडर भी चित्रित है।

केंद्र का प्रवेशद्वार-

इस द्वार पर अंतिम निर्णय (Last Judgement) को सीधे अलंकृत,नक्काशीदार चित्रों में उकेरा गया है। पहले तथा दूसरे पैनल पर पुनर्जीवित होने,अंतिम निर्णय, प्रभु यीशु का अन्य देवदूतों के साथ के चित्र उत्कीर्ण हैं। सिंहासन पर बैठे प्रभु का चित्र अत्यधिक भावपूर्ण है।

दायाँ प्रवेशद्वार-

यहाँ पर सेंट एंटीयन का चित्र उत्कीगर्ण है। इसके अतिरिक्त 12वीं सदी की सर्वोत्कृष्ट प्रतिमाओं का चित्रण है। इन में वर्जिन मेरी का अपने शिशु यीशु को गोद में लेकर सिंहासन बैठे हुए भी चित्रण है।

गैलेरी-

तीनों प्रवेशद्वारों के ऊपर एक गैलेरी में जुडाई तथा इज़राइल के 28 सम्राटों की एक कतार में प्रतिमाएँ स्थित हैं। ये मूल कृतियों की प्रतिकृतियाँ हैं। मूल कृतियाँ क्रान्ति के समय खंडित कर दी गयी थी।

पश्चिम की रोज़ विंडोज़-

कैथेडरल के पीछे पश्चिम में रोज़ विंडोज़ हैं। इन का व्यास 10 मीटर है। उस समय ये विंडोज़ अपनी तरह की विशिष्ट विंडोज़ थी। समीप जाने पर इन के बाहरी किनारे पर बाइबल से उद्धृत आदम और ईव के चित्र दिखाई देते हैं।

बाहरी भाग का ऊपरी हिस्सा-

गुंबदों से पहले एक विशाल गैलेरी है। यह दोनों गुंबदों को आधार से जोड़ती है। इस गैलेरी में भयावह दैत्य,दैत्याकार पक्षी दिखाई देते हैं। ये नीचे से नहीं दिखाई देते हैं। नोटरे-डेम के चित्ताकर्षक,अलंकृत गुंबद विश्व प्रसिद्ध हैं। इसका श्रेय 19वीं सदी के कालजयी फ्रेंच साहित्यकार विक्टर ह्यूगो को जाता है। उनकी प्रसिद्ध कृति ‘The Hunchback of Notre-dem)’ नोटरे-डेम का कुबड़ा) का मुख्य पात्र कुबड़ा क्वासिमिडो कैथेडरल के दक्षिणी गुंबद पर रहता है। ये गुंबद 68 मीटर ऊंचे हैं। यहाँ से सीन नदी तथा पैरिस नगर की मुग्धकारी दृश्यावली दिखाई देती है। गुंबद के शिखर तक जाने के लिए 402 सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं।

उत्तरी, दक्षिणी व पिछला भाग-

प्रायः पर्यटक इस भाग की अनदेखी कर देते हैं। वास्तव में कैथेडरल का उत्तरी, दक्षिणी तथा पिछला भाग भी बेहद खूबसूरत है। यहाँ पर 13वीं सदी में निर्मित वर्जिन मेरी की प्रतिमा स्थित है। दुर्भाग्यवश उनकी गोद में बैठे प्रभु यीशु की प्रतिमा 18वीं सदी में खंडित कर दी गयी थी तथा उसका पुनर्निर्माण नहीं हो पाया। पिछला भाग भी निश्चित रूप से बाहरी भाग की तरह चित्ताकर्षक है। यहाँ पर उड़ते पक्षियों की आकृतियाँ देखते ही बनती हैं। मुख्य बाहरी भाग के दायीं ओर सेंट एंटीयन चर्च का प्रवेशद्वार है।

आंतरिक भाग –

मध्यकालीन वास्तुकार प्रायः स्वर्ग की तुलना में सांसारिक नश्वरता को अपनी संरचनाओं में प्रतिबिम्बित करते थे। नोटरे-डेम में भी भौतिकता तथा पारलौकिकता का चित्रण स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। विशाल सभागार, नक्काशीदार छतें,उनमें रंगीन काँच से छन कर आता अलौकिक प्रकाश मानवीय तथा दैवी ऊर्जा का अपूर्व सम्मिश्रण है। कैथेडरल की ऊपरी मंज़िलों पर पंहुचने का कोई मार्ग नहीं है। नीचे से ही ऊपर के अलौलिक सौंदर्य का आनंद लिया जा सकता है।

रंगीन काँच की तीन रोज़ विंडोज़-

ये कैथेडरल के आंतरिक भाग की अद्वितीय आकर्षण हैं। दो खिड़कियाँ क्रूसागार भाग में हैं। उत्तर की रोज़ विंडो का निर्माणकाल 13वीं सदी है। यह खिड़की सर्वाधिक मनोहारी है। इसमें वर्जिन मेरी के चारों ओर पुरातन टेस्टामेंट से उद्धृत चित्र उत्कीर्ण हैं। दक्षिण की रोज़ विंडो में संतों तथा देवदूतों से घिरे प्रभु यीशु का चित्र है। रंगीन काँच की ये खिड़कियाँ 1965 ई से कैथेडरल को शोभायमान कर रही हैं।

1990 ई में नोटरे-डेम के वाद्य यंत्रों को ठीक किया गया। इन की गणना फ्रांस के सर्वाधिक विशाल वाद्य यंत्रों में होती है। प्रार्थना सभा में इन का मधुर संगीत तन-मन के साथ-साथ आत्मा को तृप्त कर देता है। यहाँ पर वर्जिन मेरी, यीशु की प्रतिमा के साथ अनेक संतों के स्मारक भी स्थित हैं।

कोषागार-

कैथेडरल के पिछवाड़े में कोषागार है। इसमें बहुमूल्य वस्तुएँ, सोने व अन्य कीमती धातुओं से निर्मित मुकुट तथा सलीबें संरक्षित हैं।

म्यूज़ियम-

1960ई तक कैथेडरल के सामने इमारतों का जमावड़ा था।इन के कारण कैथेडरल की दृश्यावली अवरुद्ध होती थी। अंततः इन इमारतों को ढहा दिया गया। खुदाई में गैलो-रोमन काल से लेकर 19वीं सदी तक के पुरातत्त्वशेष प्राप्त हुए हैं। 1965 ई में उत्खनन कार्य आरंभ हुआ था। इन पुरातत्त्वशेषों को संग्रहीत करने के लिए कैथेडरल के सामने पुरातात्त्विक संग्रहालय निर्मित किया गया। यह विश्व में अपनी तरह की विशालतम संरचना है। प्लाज़ा के फर्श पर पीतल की पट्टियाँ लगी हुई हैं। इनसे उन स्थानों का पता चलता है जहां पर इमारतों को ढहाया गया था।

गिफ्ट शॉप –

कैथेडरल के प्रमुख हाल में गिफ्ट शॉप है। यहाँ पर कैथेडरल के स्मृतिचिन्ह मिलते हैं।

नोटरे-डेम कैथेडरल फ्रांस की राजधानी पैरिस में स्थित है। पैरिस दुनिया का खूबसूरत शहर है तथा पूरे विश्व के साथ हवाई मार्ग से जुड़ा है। हर साल लाखों पर्यटक यहाँ पर नोटरे-डेम कैथेडरल, एफिल टावर जैसी विशिष्ट कलात्मक संरचनाओं को देखने के लिए आते हैं।

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प्रमीला गुप्ता

ऐतिहासिक इस्तांबुल

इस्तांबुल अथवा कान्स्टेण्टिपोल के नाम से कल्पना में उभरने लगती है मस्जिदों,मीनारों, बोसपोरस, जलडमरू, बैले नर्तकियों की छवि। विमान से इस्तांबुल के विशाल अतातुर्क एयरपोर्ट पर उतरने के बाद यह छवि धूमिल पड़ जाती है। भव्य अतातुर्क एयरपोर्ट के सामने यूरोप के कुछ एयरपोर्ट भी फीके दिखाई देंगे। इस्तांबुल के आँचल में सिमटे हैं पूर्वी तथा पाश्चात्य सभ्यता व संस्कृति के अनेक रहस्य।

एशिया तथा यूरोप के दो विशाल महाद्वीपों के मध्य स्थित इस्तांबुल विश्व का एकमात्र शहर है। 657 बीसी में ग्रीक निर्माता बायजन्स ने इस शहर की आधारशिला रखी थी व अपने नाम पर शहर का नाम ‘बायज़ेंटियम’ रखा। दो महाद्वीपों के बीच स्थित होने के कारण उस समय व्यापारिक दृष्टिकोण से यह अत्यधिक महत्त्वपूर्ण था। दोनों द्वीपों के व्यापारी इस शहर से हो कर गुजरते,यहाँ पर ठहरते तथा स्थानीय लोगों के साथ भी व्यापार करते थे। परिणामस्वरूप यह दिनोंदिन समृद्ध होता चला गया और शक्तिसम्पन्न देशों की आँखों की किरकिरी बन गया। 330 ई में कान्स्टेंटाइन दी ग्रेट ने इस शहर पर आधिपत्य कर लिया और इसे रोमन साम्राज्य की राजधानी बना लिया। 1926 तक यह शहर पाश्चात्य जगत में कान्स्टेण्टिपोल के नाम से ही जाना जाता था। वर्तमान में यह पुरातन ऐतिहासिक शहर विश्व विजेताओं की अपेक्षा सम्पूर्ण विश्व के पर्यटकों का लोकप्रिय भ्रमण स्थल है। सागरतट पर बसा यह शहर सामान्य तथा सम्पन्न पर्यटकों का समान रूप से आकर्षण का केंद्र है। इसके ऐतिहासिक महत्त्व तथा विशिष्ट स्थापत्य कला के कारण यूनेस्को की विश्व विरासत समिति ने 1985 ई में विश्व विरासत के रूप में इसको मान्यता प्रदान कर दी थी।

अहमत स्क्वेयर

पुरातन इस्तांबुल सुल्तान अहमत स्क्वेयर के इर्द-गिर्द बसा है। यहाँ की गलियों में लोगों को रेहड़ियों पर सामान बेचते, मजदूरों को माल ढोते और बच्चों को जूते पालिश करते देख यकायक दिल्ली के चाँदनी चौक की याद आ जाती है। प्रसिद्ध ऐतिहासिक, भव्य स्मारक व दर्शनीय स्थल ‘तोपकापी पैलेस’, ‘अया सोफिया’, ‘नीली मस्जिद’ भी सुल्तान अहमत स्क्वेयर में स्थित है। समीप ही है पाँच सौ साल पुराना ‘ग्रांड बाज़ार’।

तोपकापी पैलेस

पिछले साढ़े पाँच सौ वर्षों से तोपकापी पैलेस में ओटोमन साम्राज्य का दिल धड़कता है। 1453 ई में कान्स्टेण्टिपोल पर अधिकार करने के बाद सुल्तान अहमत द्वितीय ने शहर के बीच तोपकापी पैलेस का निर्माण करवाया था। चार विशाल प्रांगणों के बीच निर्मित है पैलेस। स्वयं को ईश्वरीय दूत समझने वाले सुल्तान इस पैलेस में अपनी अगणित पत्नियों के साथ रहते थे। उनके लिए पृथक आलीशान अंतःपुर बने हुए थे।

1924 ई में तुर्की को गणतन्त्र राष्ट्र घोषित करने के बाद पैलेस को म्यूज़ियम में परिवर्तित कर दिया गया था। यहाँ पर तुर्की सभ्यता,संस्कृति के प्राचीनतम स्मृतिचिन्ह संरक्षित हैं। सुल्तानों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले बहुमूल्य रत्नजड़ित वस्त्र, आभूषण, सिंहासन, शिल्पाकृतियाँ देख कर आँखें चौंधिया जाती हैं। सभी वस्तुओं को तत्कालीन पृष्ठभूमि में सजा कर रखा हुआ है।

सुंदर इजनिक टाइलों से निर्मित हैं कैफे। तुर्की भाषा में ‘कैफे’ का अर्थ है-पिंजरा। राजगद्दी के लिए विद्रोह को रोकने के विचार से राजकुमारों को बाल्यकाल से ही इस ‘पिंजरे’ में बंद कर दिया जाता था। मूक-बधिर दास उनकी सेवा करते थे। दो साल की नन्ही उम्र से ही इस पिंजरे में रहने के कारण कई बार राजकुमार राजगद्दी पर बैठने की आयु तक अपनी बोलने की शक्ति ही खो बैठते थे।

सुल्तान महमूद द्वितीय विद्वान और सभ्य था। उसको बागबानी का भी बहुत शौक था। पैलेस के एक प्रांगण में दुर्लभ प्रजातियों के वृक्ष, लताएँ और पुष्पों के पौधे लगवाए गए थे। ट्यूलिप पुष्प तो इस उद्यान की शोभा थे। यह एक आश्चर्यजनक तथ्य है कि हालैण्ड में ट्यूलिप का प्रवेश यहीं से हुआ था। हालैण्ड का क्यूकेनहाफ ट्यूलिप गार्डन विश्व का सबसे बड़ा ट्यूलिप गार्डन है। 18वीं सदी में सुल्तान अहमद तृतीय इस्तांबुल में ट्यूलिप फेस्टिवल का आयोजन करवाता था। बिजली तो उस समय थी नहीं। कल्पना कीजिये कि रात्रि के समय लालटेनों की रोशनी में जगमगाते खूबसूरत ट्यूलिप और कछुओं की पीठ पर जलती मोमबत्तियों के प्रकाश में उद्यान की शोभा कितनी मनोहारी होती होगी!

तोपकापी म्यूज़ियम में रखा हुआ है विश्व प्रसिद्ध ‘कासिकी’ हीरा। इसको ‘स्पूनमेकर’स’ डायमंड भी कहते हैं। इस हीरे के चारों ओर छोटे-छोटे हीरे जड़े हैं। इस हीरे के साथ अनेक किंवदंतियाँ जुड़ी हैं। एक किंवदंती के अनुसार 1669 ई में एक तुर्की मछुआरे को यह कूड़े के ढेर में मिला था। कीमत से अनजान उसने इसको एक चम्मच बनाने वाले को लकड़ी के तीन चम्मचों के बदले में बेच दिया। शायद इसीलिए इसका नाम ‘स्पून मेकर’स’ डायमंड पड़ गया हो।

हीरे-जवाहरात जड़ित, स्वर्णमंडित संगीतमय बॉक्स का निर्माण स्थान भारत है। 18 वीं सदी में यह बॉक्स तत्कालीन तुर्की सम्राट को उपहारस्वरूप दिया गया था। इसमें आज भी भारतीय शास्त्रीय लोक नृत्यों के संगीत की धुनें सुनी जा सकती हैं।

1964 ई में निर्मित प्रख्यात हालीवुड फिल्म तोपकापी का मशहूर डैगर 1747 ई में सुल्तान महमूद प्रथम ने एशिया के बादशाह को भेंट में देने के लिए तैयार करवाया था। दुर्भाग्यवश उसको देने से पहले ही बादशाह की हत्या कर दी गयी। बाद में सुल्तान महमूद ने वह डैगर अपने ही पास रख लिया।

रूबी जड़ित भव्य स्वर्णिम सिंहासन देख कर आँखें चौंधिया जाती हैं। किंवदंती के अनुसार यह राजसिंहासन नादिरशाह ने सुल्तान महमत को भेंट में दिया था।

अया सोफिया/ हेगीया सोफिया

भव्य तोपकापी पैलेस के बाद अन्य दर्शनीय स्थल है-अया सोफिया/ हेगीया सोफिया। यह तुर्की के समग्र इतिहास का साक्षी है।537 ई में ईसाई सम्राट जास्टीनियम प्रथम ने इस विशाल चर्च का निर्माण करवाया था। इसके गुंबद का घेरा 100फीट और ऊंचाई 200 फीट है। इस चर्च का कार्यभार संभालने के लिए 60 से 80 पादरियों और 76 से 100 द्वारपालों की ज़रूरत पड़ती थी। प्रभु यीशु मसीह के जीवन के अंतिम दिन को दर्शाते भित्तिचित्र देख कर दर्शकों की आँखें नम हो जाती हैं। कई सदियों तक इसकी छत विश्व की विश्व की विशालतम छत मानी जाती रही। गुंबद की खिड़कियों से छन कर आता सूर्य का प्रकाश इमारत के कण-कण को सुनहरे रंग में रंग देता है। दर्शकों का हृदय भी उजास और उष्णता से भर जाता है

ओटोमन साम्राज्य की स्थापना के तुरंत बाद यह चर्च मस्जिद में परिवर्तित कर दिया गया था। गुंबद के चारों ओर चार मीनारें बनवा दी गयी। धर्म निरपेक्ष गणतन्त्र राष्ट्र बनने के उपरांत कमाल अतातुर्क ने घोषणा कर दी कि यह न चर्च होगा न ही मस्जिद बल्कि सर्वधर्म समन्वय की भावना को दर्शाता एक सेक्युलर म्यूज़ियम होगा। अपनी विशिष्ट स्थापत्य कला, भव्य भित्तिचित्रों व शिल्पाकृतियों के कारण यह सम्पूर्ण विश्व के पर्यटकों का लोकप्रिय दर्शनीय स्थल है।

नीली मस्जिद-

ओटोमन बादशाह सुल्तान अहमद ने भव्य अया सोफिया/ हेगीया सोफिया से प्रभावित हो कर उससे श्रेष्ठ मस्जिद बनवाने का फैसला किया। नीली मस्जिद उसी का परिणाम है। सामान्यतः मस्जिद के ऊपर चार मीनारें होती हैं लेकिन नीली मस्जिद के ऊपर छह मीनारें हैं। रंगीन काँच की खिड़कियाँ, अनेक गुंबद, छह मीनारें तथा आसपास का शांत वातावरण अतीव सुखद है। भीतरी भाग 20,000 पुरानी नीली टाइलों से अलंकृत होने के कारण यह नीली मस्जिद के नाम से मशहूर हो गयी। 16वीं सदी में उकेरे गए चित्ताकर्षक भित्तिचित्र इसके सौंदर्य में चार चाँद लगा देते हैं। दोपहर की नमाज़ अदा करने के बाद मस्जिद से बाहर आती नमाज़ियों की अपार भीड़ देखते ही बनती है। बाउंड्रीवाल के बाहर सुल्तान अहमत, उनकी पत्नी और तीन बेटों की कब्रगाहें हैं। मस्जिद के पिछवाड़े में है ‘वक्फ कार्पेट म्यूज़ियम’ इसमें तुर्की के प्राचीन कालीन रखे हुए हैं ।

हिप्पोड्रोम

समीप ही है हिप्पोड्रोम। बाइजेंटाइन तथा रोमन काल की ही भांति वर्तमान में भी यहाँ पर मनोरंजन के लिए रथों तथा घुड़दौड़ प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं।

ग्रांड बाज़ार –

सुल्तान अहमत स्क्वेयर में 500 वर्ष पुराना विशाल ग्रांड बाज़ार तुर्की के इतिहास तथा धर्म के बीच एक शानदार व्यावसायिक केंद्र है। इसमें 4,000 दुकाने हैं। बिजली के आविष्कार से पहले यहाँ की ऊंची छतों पर कैरोसीन के लैम्प लटकते थे। हैरानी की बात नहीं कि इस कारण से बाज़ार में कई बार आग लगी और कई बार इसका पुनर्निर्माण करवाया गया। बाज़ार में आभूषण,फर्नीचर, कपड़ों और तांबे के सामान की दुकानों के साथ-साथ रेस्टौरेंट और फव्वारे भी हैं। तुर्की में एक मशहूर कहावत है कि खरीददार एक सिरे से बाज़ार में खाली हाथ घुसता है तो दूसरे सिरे से बीवी,दहेज,फर्नीचर से भरा घर और ताउम्र अदा न होने वाला कर्ज़ लेकर बाहर निकलता है।

तुर्की वासी अपने आप को योद्धा और प्रशासक कहलवाना पसंद करते हैं। दूकानदारी में उनकी विशेष रुचि नहीं है। इसलिए अधिकांश दुकानदार यहूदी,ग्रीक तथा आर्मेनियन्स हैं। सभी दूकानदारों के व्यापार करने के तौर-तरीके एक जैसे हैं।

ग्रांड बाज़ार के पीछे एक हज़ार साल पुरानी गलियों में शिल्पकार रहते हैं। इन के द्वारा निर्मित कलाकृतियाँ, आभूषणों की भारी मांग रहती है। समोवर शिल्पकार किसी भी असली एंटिक की प्रतिकृति एक घंटे में तैयार कर देते हैं। चर्मकार लिनन की तरह मुलायम चमड़े का सामान तैयार करने में माहिर हैं तो सुनार दुल्हनों की बाँहों पर सजाने के लिए खूबसूरत ब्रेसलेट बनाते हैं। जितना अधिक धनी सम्पन्न परिवार होगा,दुल्हन की बाँहों पर उतने ही ज़्यादा ब्रेसलेट सज़े दिखाई देंगे।

मसाला बाज़ार (स्पाइस मार्केट)-

तीन सौ साल पुराने मिस्र मार्केट को मसाला बाज़ार भी कहा जाता है। यहाँ की तीन चीज़ें बहुत मशहूर हैं-भुनी मकई, सूखी सब्जियाँ और मसाले। जगह-जगह कालीन की दुकानें हैं। इन में हर कीमत के बढ़िया और खूबसूरत कालीन मिलते हैं। मसाला बाज़ार में केसर से लेकर शक्तिवर्धक जड़ी-बूटियाँ मिलती हैं। एक दुकान है जो 1777ई से मिठाइयाँ बेच रही है। उस समय अलिमुहिद्दीन हाजी बेकार ने एक मिठाई तैयार की थी जो हज की लम्बीयात्रा में खराब नहीं होती थी। जल्दी ही यह मिठाई पूरी दुनिया में मशहूर हो गयी। समय के साथ इसको बनाने की विधि में थोड़ा हेर-फेर अवश्य हो गया है लेकिन दुकान आज भी उसी स्थान पर मौजूद है।

सुल्तान अहमत स्क्वेयर में बजट के अनुरूप सस्ते,सुविधाजनक छोटे होटल हैं। अधिकांश होटल निजी आवासगृहों में हैं,इन का संचालन परिवार का मुखिया करता है। इन में एयरपोर्ट से रिसीव करने से ले कर घूमने-फिरने, विशिष्ट स्थानों पर खान-पान तथा ग्रांड बाज़ार में खरीददारी करने की व्यवस्था रहती है। एक दिक्कत है। नहाने के लिए इन में बाथरूम बहुत छोटे होते हैं लेकिन एक आकर्षण इस कमी को पूरा कर देता है। प्रायः सभी होटलों में टेरेस गार्डन हैं। वहाँ से सागर तथा भव्य दर्शनीय इमारतों का चित्ताकर्षक दृश्य दिखाई देता है।

सुल्तान अहमत स्क्वेयर से छह कि.मी दूर तकसीम है। यहाँ पुरानी मस्जिदों के बीच नयी ऊंची-ऊंची इमारतें खड़ी हैं। होटल के कमरे की खिड़की से बोसपोरस और पुराने इस्तांबुल की स्काईलाइन दिखाई देती है। बोसपोरस पर निर्मित पुल एशिया तथा यूरोप के महाद्वीपों को जोड़ता है। सागर तट पर इस्तांबुल की सबसे ज़्यादा महंगी प्रापर्टी है।

यहाँ का बैले नृत्य सामान्य नृत्य नहीं है अपितु नृत्यकला की विशिष्ट शैली है। इसमें पारंगत होने के लिए विशिष्ट साधना करनी पड़ती है।

कानून,व्यवस्था, साफ-सफाई की हालत सामान्य है। बसें,ट्राम खचाखच भरी रहती हैं,सवारियाँ बाहर लटकी रहती हैं। बेफिक्र हो कर सैर-सपाटा, मौज-मस्ती और खरीददारी की जा सकती है। सूरज ढलने पर पूरा शहर बिजली की रोशनी में सोने की तरह दमकने लगता है। इतिहास के आईने में झिलमिल करता इस्तांबुल वास्तव में सम्पूर्ण विश्व की अनुपम धरोहर है।

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प्रमीला गुप्ता

मिस्र के पिरामिड

विश्व इतिहास आश्चर्यजनक रहस्यों से भरा पड़ा है। उनमें मिस्र के पिरामिड आज भी मानव मस्तिष्क के लिए रहस्यमय पहेली बने हुए हैं। उनकी संरचना के रहस्य को अभी तक सुलझाया नहीं जा सका है।

पिरामिड निर्माण में निहित भावना-

एक समय मिस्र की सभ्यता की गणना विश्व की सर्वाधिक शक्तिसंपन्न और वैभवशाली सभ्यताओं में होती थी। मिस्र के तीसरे राजवंश का सम्राट जोसर प्रजाप्रेमी था। प्रजा भी सम्राट का सम्मान ईश्वर के चुने हुए प्रतिनिधि के रूप में करती थी। सम्राट जोसर की मृत्यु के उपरांत मिस्रवासियों ने अपने प्रिय सम्राट की आत्मा को शरीर के साथ संरक्षित रखने के विचार से दफनाने से पहले लेप लगा कर शरीर को संरक्षित कर दिया। शव के साथ खाने-पीने की सामग्री,वस्त्र, आभूषण,वाद्ययंत्र, शस्त्र-अस्त्र, यहाँ तक कि सेवक-सेविकाओं को भी दफना दिया गया। 263 ई पू के आसपास जोसर की कब्रगाह के रूप में मिस्र के सबसे पिरामिड का निर्माण हुआ था। यह सकारा में स्थित है। उसके बाद तीसरे और चौथे राजवंश के सम्राटों ने पिरामिड निर्माण की परम्परा को आगे बढ़ाया।

पिरामिडों का देश मिस्र-

आरंभ में मिस्र की राजधानी मेम्फीस थी। मेम्फी स के पुरातत्त्वशेष वर्तमान राजधानी काहिरा के 40 कि.मी दक्षिण में नील नदी के पश्चिमी तट पर अवस्थित हैं। नील नदी के पश्चिमी तट पर एक शाही कब्रिस्तान है। यहाँ पर सम्राटों द्वारा निर्मित 138 पिरामिड हैं। संभवतः इसीलिए मिस्र को ‘पिरामिडों का देश’ कहा जाता है। चोर-लुटेरे उनके भीतर रखे बहुमूल्य सामान को चुरा न लें इसलिए पिरामिडों की संरचना अतीव जटिल होती थी। प्रायः सम्राट अपने जीवनकाल में ही एक भव्य, विशाल पिरामिड का निर्माण करवा देता था। शव को पिरामिड के केंद्र में दफनाया जाता था।

मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक सी बात है कि जब मृत सम्राटों की कब्रगाह (पिरामिड) इतनी भव्य है तब उनके राजप्रासाद इन स्मारकस्थलों से अधिक वैभवसम्पन्न और विशाल होंगे। उन भव्य स्थानों के अवशेष तो आज कहीं भी देखने को नहीं मिलते जब कि ये प्रस्तर स्मारक आज भी विद्यमान हैं।

गिज़ा का ग्रेट पिरामिड-

जो भी कारण हो यह एक तथ्य है कि ये पिरामिड मिस्र के गौरवशाली अतीत के साक्षी हैं। वैसे तो मेम्फीस में 138 पिरामिड तथा काहिरा के उपनगर गिजा में तीन पिरामिड हैं लेकिन इन में से ‘दी ग्रेट पिरामिड’ ही सर्वाधिक आकर्षण का केंद्र है। यह विश्व के प्राचीन सात अजूबों में से एक है। अन्य छह कालप्रवाह में क्षतिग्रस्त हो गए लेकिन यह आज भी उन्नत मस्तक के साथ खड़ा है। 1979ई में यूनेस्को ने मेम्फीस के पुरातत्त्वशेषों सहित इन पिरामिडों को भी विश्व धरोहर घोषित कर दिया था।

चतुर्थ राजवंश के तीन सम्राटों खुफू, खफ्रे, मे-कुरे ने गिज़ा में इन पिरामिडों का निर्माण करवाया था। इन तीनों में खुफू का पिरामिड सबसे बड़ा है। इसको ‘दी ग्रेट पिरामिड’ कहा जाता है। ‘दी ग्रेट पिरामिड’ 450 फीट ऊंचा है। 4300 वर्षों तक यह विश्व की सर्वोच्च संरचना थी। 19वीं शताब्दी में उसका यह रिकार्ड टूट गया। इसका आधार 13 एकड़ भूमि पर फैला है जो लगभग 16 फुटबाल के मैदानों के बराबर है।इसके निर्माण में 25 लाख चूना-पत्थरों के खंडों का उपयोग हुआ है। पुरातत्त्वविशेषज्ञों के अनुसार 2560 ई पू मिस्र के सम्राट खुफू ने स्मारक के रूप में इसका निर्माण करवाया था तथा इसके निर्माण में लगभग 23 वर्ष का समय लग गया था। यह पिरामिड इतनी परिशुद्धता से निर्मित है कि आधुनिक विकसित तकनीक द्वारा भी ऐसी संरचना का निर्माण संभव नहीं है।

पिरामिड की संरचना-

गिज़ा का यह ग्रेट पिरामिड वर्गाकार है।नाप-जोख के लिए लेजर किरणों जैसे उपकरणों का आविष्कार होने से पहले वैज्ञानिक सूक्ष्म सिमिट्रीज़ (सममिति) का पता लगाने में असमर्थ थे लेकिन इसके निर्माण में ज्यामितीय शुद्धता का पूरा ध्यान रखा गया है। चारों भुजाएँ लगभग बराबर हैं। उन के माप में केवल कुछ से.मी का ही अंतर है जो इसकी विशालता को देखते हुए नगण्य है। पिरामिड के चारों कोने समकोण हैं। मूलरूप में इसकी ऊंचाई 146 मीटर थी लेकिन समय के अंतराल में अब केवल 137 ही रह गयी है।

ग्रेट पिरामिड का प्रवेशद्वार उत्तरी दिशा में भूतल से पाँच मीटर ऊपर है। प्रवेशद्वार अड़तालीस स्तंभों पर आधारित था। भीतर प्रवेश करने पर पहले रानी का शावकक्ष और फिर राजा का शवकक्ष आता है। राजा के शवकक्ष में लाल ग्रेनाइट पत्थर की खाली शवपेटी मिली है। राजा के शवकक्ष के चारों तरफ एक सुरंग है। अनुमान है कि इसी सुरंग से नील नदी का पानी पिरामिड के नीचे बहता था। इसके दोनों तरफ मंदिर निर्मित थे। मंदिरों के अब अवशेष ही बचे हैं। पिरामिड का भाल हल्का करने के लिए इस कक्ष के ऊपर पाँच कक्ष और बनाए गए थे। नींव में पीले रंग का चूना-पत्थर इस्तेमाल किया गया था लेकिन बाहर की तरफ बहुत अच्छी क्वालिटी का चूना-पत्थर लगाया गया है।

प्रसिद्ध स्फ़िंक्स प्रतिमा-

पिरामिड के समीप ही चौदह मीटर ऊंची प्रतिमा स्थित है। इसकी मुखाकृति मानव की तथा शेष भाग सिंह का है। यह स्फ़िंक्स के नाम से विश्व प्रसिद्ध है।

निर्माण-

ग्रेट पिरामिड के निर्माण में लगभग 23 लाख पाषाण खंडों का प्रयोग हुआ है। प्रत्येक पाषाण खंड का औसत भार ढाई टन है। कुछ पत्थरों का वज़न तो 16 टन से भी ज़्यादा है। यदि इन पत्थरों को 30 से.मी के टुकड़ों में काट दिया जाए तो उनसे फ्रांस के चारों तरफ एक मीटर ऊंची दीवार बन सकती है।

आधुनिक वास्तुशिल्प द्वारा ग्रेट पिरामिड जैसी संरचना का निर्माण कर पाना असंभव है। इसके निर्माण की तकनीकी दक्षता और इंजीनियरिंग आज भी वास्तुविदों के लिए एक चुनौती बनी हुई है। उस समय जब क्रेन जैसे यंत्र का आविष्कार नहीं हुआ था तब इतने विशाल,भारी पाषाण-खंडों को इतनी ऊंचाई पर कैसे लगाया गया होगा। अधिकांश विद्वानों के मतानुसार उन लोगों ने पिरामिड तक एक ढलुआं रास्ता बना लिया होग और निर्माण कार्य के आगे बढ़ने के साथ-साथ वे उस रास्ते को भी ऊंचा करते गए होंगे। लकड़ी की बल्लियों के सहारे अथवा पहिये वाले लकड़ी के ढांचों पर रख कर पत्थरों को इस ढलुआं रास्ते से ऊपर पिरामिड के निर्माण स्थल तक ले जाते होंगे।

यूनानी इतिहासकार हेरोडोटस के अनुसार नदी से लेकर पिरामिड तक पाषाण खंडों को पंहुचाने के लिए ढलुआं रास्ता बनाने में ही दस साल लग गए होंगे। उनके अनुसार इस विशाल पिरामिड को बनाने के लिए एक लाख आदमियों ने 20 साल काम किया होगा। आधुनिक विद्वानों के मतानुसार हेरोडोटस का यह कथन अतिशयोक्तिपूर्ण है। उनके अनुसार पिरामिड के निर्माणस्थल पर 36,000 से ज़्यादा व्यक्ति एक साथ काम नहीं कर सकते थे। संभवतः हेरोडोटस ने उन लोगों की गणना भी कर ली हो जो पिरामिड के लिए ढलुआं रास्ता बनाने तथा और दूसरे कामों में लगे हों।

विशिष्टताएँ –

वास्तुशिल्प की बात तो अलग है, मिस्रवासी खगोलविद्या और गणित के भी गहन ज्ञाता थे। पत्थरों को इतनी कुशलता से तराश कर फिट किया गया है कि उनके बीच एक ब्लेड भी नहीं घुस सकता है। पिरामिड ओरियन राशि के तीन तारों की सीध में है। पिरामिड को सूर्यदेवता ( मिस्रवासी जिस को माट कहते हैं) के नियमानुसार बनाया गया है। जब सूर्य की किरणें इस की दीवारों पर पड़ती हैं तो वे चांदी की तरह चमकने लगती हैं।

पिरामिड को भूकंप से सुरक्षित रखने के लिए उसकी नींव के चारों कोनों में बॉल और साकेट बनाए गए हैं।

ग्रेट पिरामिड पाषाण के कंप्यूटर जैसा है। इसके किनारों की लम्बाई, ऊंचाई और कोनों को मापने से पृथ्वी से संबन्धित भिन्न-भिन्न चीजों की सटीक गणना की जा सकती है।

ग्रेट पिरामिड में पत्थरों का उपयोग इस प्रकार किया गया है कि इसके भीतर का तापमान हमेशा स्थिर और पृथ्वी के औसत तापमान 20 डिग्री सेल्सियस के बराबर रहता है।

तत्कालीन मिस्रवासी पिरामिड का उपयोग वेधशाला, कैलेंडर, सन डायल और सूर्य की परिक्रमा के समय पृथ्वी की गति तथा प्रकाश के वेग को जानने के लिए भी किया जाता था।

पिरामिड को गणित की जन्मकुंडली भी कहा जाता है। इससे भविष्य की गणना की जा सकती है।

पिरामिड अपने विशाल आकार, अद्वितीय वास्तुशिल्प तथा मजबूती के लिए विश्वविख्यात हैं। इसमें खगोलीय विशेषताएँ भी विद्यमान हैं लेकिन सबसे विलक्षण गुण हैं। इन का जादुई प्रभाव । वैज्ञानिक प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध हो गया है कि पिरामिड के भीतर विलक्षण ऊर्जा तरंगें निरंतर सक्रिय रहती हैं जो जड़ और चेतन दोनों प्रकार की वस्तुओं पर प्रभाव डालती हैं। इस विलक्षणता को ‘पिरामिड पावर’ की संज्ञा दी गयी है।

अब यह नयी अवधारणा चिकित्सा जगत में ‘पिरामिडोलोजी’ के नाम से लोकप्रिय होती जा रही है। पिरामिड के आकार की संरचना के भीतर बैठने से सिर दर्द,दाँत दर्द से छुटकारा मिल जाता है। आधुनिक अनुसंधानकर्ता बोबिस ने पिरामिड के आकार की टोपी बना कर पहनी और इस बात को आज़माया। बोबिस का मानना है कि इसको पहनने से दर्द तो दूर हो ही जाता है , अन्य कई प्रकार के मानसिक रोग भी दूर हो जाते हैं।

वैसे तो मिस्र में अनेक ऐतिहासिक पर्यटन स्थल हैं लेकिन इन पिरामिडों का आकर्षण ही अलग है,विशेष रूप से गिज़ा के ग्रेट पिरामिड का । प्रतिवर्ष लाखों पर्यटक इन पिरामिडों को देखने के लिए मिस्र पंहुचते हैं।

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प्रमीला गुप्ता

पाषाण पर बसा सिगरिया

श्रीलंका के मध्य प्रांत में दंबूला नगर के समीप उत्तर में मताले ज़िले में स्थित है पुरातन सिगरिया ( सिंहगिरी अथवा सिंह पाषाण खंड)। इस उच्च,विशाल पाषाण पर निर्मित राजप्रासाद तथा दुर्ग ऐतिहासिक एवं पुरातत्त्विक दृष्टिकोण से अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हैं। यह राजप्रासाद व दुर्ग सागरतल से 370 मीटर ऊंचे,विशाल पाषाण पर निर्मित है।

श्रीलंका के प्राचीन अभिलेखों के अनुसार 477-495 ई में सम्राट कश्यप ने इस स्थान पर अपना राजप्रासाद बनवाया तथा उसको चारों तरफ से भव्य रंगीन भित्तिचित्रों से अलंकृत किया। ऊपर जाते समय आधे रास्ते के समतल भाग में विशाल सिंह की आकृति का प्रवेशद्वार निर्मित है। उसके पंजों के बीच से गुजर कर मुख के भीतर जाने के लिए सीढ़ियाँ बनी हुई हैं। सिंह का मुख तो ध्वस्त हो गया है लेकिन सिंह के पंजे तथा आरंभिक सीढ़ियाँ अभी भी संरक्षित हैं। ऊपर जाने के लिए इन सीढ़ियों की संरचना अद्भुत, अद्वितीय है। संभवतः इस संरचना के आधार पर इस स्थान का नाम ‘सिंहगिरी’ अर्थात सिंह पाषाण पड़ गया हो। सम्राट कश्यप के निधन के बाद राजधानी और राजप्रासाद दोनों ही वीरान हो गए। इस स्थान का उपयोग बौद्ध भिक्षुओं के आवासस्थल के रूप में होने लगा। 14वीं शताब्दी तक यह स्थान बौद्ध विहार के रूप में प्रयुक्त होता रहा। उसके बाद घने जंगलों के बीच गुमनामी के अंधेरे में विलीन हो गया।

1982 ई में यूनेस्को ने इसको प्राचीन नगर योजना के सर्वोत्कृष्ट संरक्षित स्थान के रूप में विश्व विरासत घोषित किया था।

सिगरिया के उत्खनन में प्राप्त पुरातत्त्वशेषों से ज्ञात होता है कि यहाँ पर प्रागैतिहासिक काल में भी मानवबस्तियाँ रही होंगी। चट्टानों तथा गुफाओं में निर्मित आश्रयस्थल इस तथ्य की पुष्टिकरते हैं। ई पू तीसरी शताब्दी में यहाँ पर भिक्षु व सन्यासी रहते होंगे। सिगरिया पाषाण के पूर्व में चट्टान में निर्मित ‘अलीगला’ आश्रयस्थल प्राचीनतम माना जाता है।

सिगरिया पाषाण के चारों तरफ चट्टानों और गुफाओं में ये आश्रयस्थल निर्मित थे। कुछ आश्रयस्थलों के मुहानों पर स्थित चट्टानों पर उत्कीर्ण अभिलेखों से ज्ञात होता है कि यहाँ पर बौद्ध भिक्षु रहते थे तथा इन का निर्माण ई पू तीसरी से पहली शताब्दी के बीच हुआ था।

477 ई में सम्राट धातुसेन के अवैध पुत्र कश्यप ने सेनापति के साथ मिलकर विद्रोह कर दिया। पिता की हत्या कर राजगद्दी पर अधिकार कर लिया। वैध उत्तराधिकारी मोगलाना जान बचा कर दक्षिण भारत भाग गया। मोगलाना के वापिस आने के भय से कश्यप ने ऊंचाई पर इस विशाल पाषाण पर अपना राजप्रासाद, दुर्ग तथा ऐशो-आराम के लिए अलग महल बनवाया। उसके शासन काल 477-495 में सिगरिया में एक नगर बस गया। यहाँ सुरक्षा के लिए एक दुर्ग भी निर्मित करवाया गया। अधिकांश संरचनाएँ -राजप्रासाद,किले, दुर्ग तथा उद्यान पाषाण के शिखर व उसके आसपास निर्मित हैं।

जैसी कि आशंका थी, मोगलाना ने विशाल सेना संगठित की और राजगद्दी वापिस लेने के लिए सिगरिया पर आक्रमण कर दिया। कश्यप को हार का मुंह देखना पड़ा। कश्यप की सेना भाग खड़ी हुई और कश्यप ने अपनी छाती में तलवार घोंप कर आत्महत्या कर ली। मोगलाना ने अपनी राजधानी दोबारा अनुराधापुर में स्थापित कर ली। सिगरिया को बौद्ध धर्मावलम्बियों को दे दिया। 13वीं, 14वीं शताब्दी तक यहाँ पर बौद्ध विहार रहे। उसके बाद की विशिष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है। उस समय तक यह श्रीलंका के महायान और थेरवाद बौद्ध सम्प्रदायों का विशिष्ट महत्त्वपूर्ण स्थान था।

1831 ई में ब्रिटिश सैन्याधिकारी मेजर जोनाथन ने पोलोनुरवा जाते समय झाड़ियों से ढके सिगरिया के शिखर पर स्थित खंडहरों को देखा। इस संबंध में पुरातत्त्वविदों को बताया। 1890 ई में पुरातत्त्वविदों ने इस स्थान पर छोटे स्तर पर उत्खनन कार्य आरंभ किया। बाद में एच.सी.पी.बेल की अध्यक्षता में व्यापक स्तर पर उत्खनन कार्य हुआ। श्रीलंका सरकार ने भी इसके महत्त्व को समझा। त्रिकोणीय परियोजना के अंतर्गत 1982 ई में सिगरिया पर विशेष काम हुआ।

सम्राट कश्यप ने 5वीं शताब्दी में सिगरिया में किले का निर्माण करवाया था। विशाल पाषाण के समतल शिखर पर राजप्रासाद के पुरातत्त्वशेष संरक्षित हैं। नीचे मध्य स्तर पर सिंहद्वार, आकर्षक भित्तिचित्रों से अलंकृत दर्पण दीवार ( Mirror Wall), किले की सुरक्षा के लिए निर्मित परकोटों के पीछे अवस्थित है एक अन्य प्रासाद। यह महल तथा किला दोनों था।

पुरातन सिगरिया लगभग 2 मील लंबा और 0.68 मील चौड़ा था। सुरक्षा के लिए चारों तरफ ऊंची दीवारें, खाइयाँ बनी हैं। इनमें जल भरा है। पहाड़ी के नीचे एक बड़ी खंदक है। कहते हैं कि इस खंदक के भीतर आज भी मगरमच्छ रहते हैं। लगता है उस समय इस विशाल पाषाण का उपयोग दुर्ग के रूप में किया जाता होगा।

सिगरिया के चारों तरफ सुव्यवस्थित, सुनियोजित चित्ताकर्षक उद्यान हैं। इन में जलोद्यान, पाषाण उद्यान तथा टेरेस (सीढ़ीदार) उद्यान विशिष्ट रूप से सुनियोजित एवं दर्शनीय हैं।

जलोद्यान-

किले/ राजप्रासाद की तरफ जाने वाले प्रमुख मार्ग के दोनों ओर पानी के सममित ( सिमिट्रिकल) जलकुंडों को ही जलोद्यान कहते हैं। इन कुंडों में बने फव्वारे वर्षा ऋतु में आज भी काम करते हैं। छिद्र में एक तरफ से फूँक मारने पर फव्वारे के दूसरी से पानी बाहर आ जाता है। यह जलोद्यान पश्चिमी परिसर में है। यहाँ पर तीन जलोद्यानों के अवशेष मिले हैं। पहले उद्यान के चारों तरफ जल है। यह प्राचीन चारबाग उद्यान शैली पर निर्मित है। दूसरे उद्यान में मार्ग के दोनों तरफ लम्बे, गहरे जलाशय हैं। दो सर्पाकार जल-धाराएँ जलाशयों तक जाती हैं। इस में चूना पत्थरों से बने फव्वारे हैं। ये फव्वारे आज भी चलते हैं। उद्यान के दोनों तरफ दो द्वीप हैं। इन द्वीपों के समतल भाग पर ग्रीष्मकालीन महल निर्मित है। तीसरा जलोद्यान पहले दोनों उद्यानों की अपेक्षा थोड़ा ऊंचाई पर है। इसके उत्तर-पूर्व में अष्टकोणीय जलाशय है। ईंटों व पत्थर से निर्मित किले की प्राचीर इस उद्यान के पूर्वी छोर पर है। सिगरिया के इन उद्यानों को महाद्वीप में प्राचीनतम माना जाता है।

पाषाण उद्यान-

ये उद्यान विशाल पाषाणों को जोड़ कर पगडंडियों के रूप में बनाए गए हैं। ये सिगरिस पाषाण शिला के नीचे पहाड़ियों की उत्तरी ढलानों पर बने हैं। अधिकांश पाषाणों पर कोई भवन अथवा पेवेलियन निर्मित है।

टेरेस (सीढ़ीदार) उद्यान-

सिगरिस पाषाण के नीचे प्राकृतिक पहाड़ी पर स्थित है यह उद्यान। यहाँ की पगडंडियों से ऊपर शिखर तक जाने के लिए प्राचीर के साथ-साथ सीढ़ियाँ बनी हुई हैं। उद्यान की सीढ़ियाँ चूना-पत्थरों से निर्मित हैं।

भित्तिचित्र-

सिगरिया की चट्टानों पर 5वीं शताब्दी में उत्कीर्ण चित्ताकर्षक भित्तिचित्र हैं। लगभग 500 चित्रों में से अब केवल दर्जन भर शेष बचे हैं। इन भित्तिचित्रों को देख कर सहसा अजंता के भित्तिचित्रों की स्मृति मन में कौंध जाती है। सिगरिया के चित्रों में लाल,पीला हरा व काला रंग इस्तेमाल किया गया है। अजंता का नीला रंग इन चित्रों में नहीं दिखाई देता है। भित्तिचित्रों में नारी का चित्रण अप्सराओं के रूप में किया गया है। सभी चित्र अतीव भावपूर्ण तथा कलात्मक हैं। इनमें नारियों को पुष्पवर्षा करते हुए दिखाया गया है। उनके साथ सहायिकाओं का भी चित्रण है। सभी आकृतियाँ प्राभावोत्पादक व मनोहारी हैं। इन की मुखाकृति दक्षिण भारतीय नारियों के सदृश है। कटि से नीचे का भाग बादलों से ढका है। खड़े होने की मुद्रा, सजग नेत्र, कलात्मक केश विन्यास तथा सूक्ष्म, आकर्षक अलंकरण मुग्धकारी है। ये भित्तिचित्र एक ओर अजंता चित्र शैली का श्रीलंका में प्रसार का प्रतीक हैं तो दूसरी ओर इन में स्थानीय अभिव्यंजना भी निहित है। अभिव्यक्ति एवं चित्रकला की दृष्टि से इस स्थल को सिंहलद्वीप की अजंता कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

दर्पण दीवार (Mirror Wall) –

शिखर पर जाने के लिए सीढ़ियों से ऊपर जाते समय एक ऐसी दीवार आती है जो किसी लेप से एकदम चिकनी कर दी गयी है। यह इतनी चिकनी है कि इसमें अपना प्रतिबिंब उसी प्रकार दिखाई देता है जिस प्रकार दर्पण में दिखाई देता है। छठी से चौदहवीं शताब्दी तक इस मार्ग से गुजरने वाले यात्री दीवार पर कविता,लेख वगैरह लिखते रहते थे। इससे सिद्ध होता है कि यह स्थल एक हज़ार साल पहले भी लोकप्रिय रहा होगा। अब दीवार पर कुछ भी लिखने की सख्त मनाही है।

राजप्रासाद-

सिगरिया का प्रमुख आकर्षण है शिखर पर निर्मित विशाल राजप्रासाद के पुरातत्त्वशेष। इसकी संरचना स्थापत्यशैली के दृष्टिकोण से अद्वितीय है। सटीक अनुपात तथा गुणवत्तापूर्ण उत्कृष्ट निर्माण इसकी विशिष्टता है। जलसंरक्षण के लिए टैंक सीधे चट्टान में निर्मित हैं। परिसर के पश्चिमी भाग में नहरें,झीलें,बांध,पुल, फव्वारे दृश्यावली को मनमोहक बना देते हैं।

पठार रूपी शिखर पर पुरातत्त्व में रुचि रखने वालों के लिए बहुत कुछ दर्शनीय है। नहरें,जलनिकासी के लिए बनी नालियाँ आज भी विद्यमान हैं। जनता से भेंट करने के लिए दीवान-ए-आम जैसे पत्थर के चबूतरे, पहरेदारों के रहने की व्यवस्था पर्यटकों को आश्चर्यचकित कर देती है। एक तरफ विशाल घने वन तो दूसरी तरफ दूर-दूर तक फैले धान के खेत मंत्रमुग्ध कर देते हैं। वस्तुतः श्रीलंका में पुरातन सिगरिया ऐतिहासिक एवं पुरातत्त्विक दृष्टिकोण से अतीव महत्त्वपूर्ण है। स्थानीय लोग तो इसको दुनिया का आठवाँ अजूबा मानते हैं। इसको देखने के लिए प्रतिवर्ष पूरे विश्व से अगणित भ्रमणार्थी आते हैं। प्र्कृती तथा मानवनिर्माण के अद्वितीय सामंजस्य आश्चर्यचकित करने वाला है।

सिगरिया पूरे विश्व के साथ हवाई मार्ग से जुड़ा है। श्रीलंका की राजधानी कोलम्बो अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा है। कोलम्बो से कार अथवा टैक्सी से सिगरिया पंहुचने में चार घने लगते हैं। ट्रेन कैंडी तक जाती है वहाँ से आगे सड़क मार्ग से जाना पड़ता है। समीपस्थ नगर दंबूला है। वहाँ से सिगरिया केवल 25 मील दूर है।

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प्रमीला गुप्ता

मास्को का दिल क्रेमलिन व रेड स्क्वेयर

अतीत की स्मृतियों को हृदय में सँजोए रूस की राजधानी मास्को आज भी दुनिया के बड़े और खूबसूरत शहरों में से एक है। मास्को शहर मस्कवा नदी के तट पर बसा है। प्रमुख सड़कों ‘टिमस्कया उल’ तथा ‘उल नोवी आर्बेट’ के दोनों तरफ आधुनिक रूस की पहचान विशाल होटल और डिपार्टमेंटल स्टोर स्थित हैं।

रूस की प्राचीन सभ्यता, संस्कृति,आधुनिक विज्ञान और तकनीक का अपूर्व संगमस्थल है मास्को। एक तरफ ऊंची-ऊंची बहुमंज़िला इमारतें आधुनिकता की परिचायक हैं तो दूसरी तरफ पुरानी शान-ओ-शौकत और सभ्यता जीवंत है क्रेमलिन और रेड स्क्वेयर में। यहीं पर धड़कता है मास्को का दिल।

1990 ई में यूनेस्को की विश्व विरासत समिति ने क्रेमलिन और रेड स्क्वेयर को विश्व विरासत घोषित कर दिया था। रूसी भाषा में ‘क्रेमल’ का अर्थ है किला। अतः रूस में अनेक क्रेमलिन हैं लेकिन मास्को स्थित क्रेमलिन विश्वविख्यात है। पुरातत्त्वविदों के मतानुसार इस स्थान पर 500 ई पू भी मानव बस्तियाँ रही होंगी लेकिन मास्को से जुड़ा इतिहास 1147 ई से आरंभ होता है। उस समय प्रिंस यूरी डोलोगोर्की ने पहाड़ी पर लकड़ी के किले का निर्माण करवाया था। समय के साथ-साथ उसके आसपास लकड़ी से बने मकानों की बस्ती बस गयी। मंगोलों ने कई बार आक्रमण कर इसको ध्वस्त कर दिया लेकिन इसका विकास अनवरतरूप से होता रहा। शीघ्र ही यह एक शक्तिसम्पन्न राज्य बन गया।

14वीं सदी के अंत में क्रेमलिन (किले) में पत्थरों की इमारतों का निर्माण आरंभ हो गया था। ईवान-दी-ग्रेट (1462-1505)के शासनकाल में क्रेमलिन संगठित रूसी सत्ता का केंद्र बन गया था। 1458 ई में ईवान -दी-ग्रेट ने 69 एकड़ में फैले किले के चारों तरफ ईंटों की मजबूत दीवार बनवा दी थी। 2,235 मीटर लम्बी दीवार में 20 खूबसूरत टावर बने हुए हैं। क्रेमलिन राज्य और धर्म के आधार पर दो भागों में बंट गया था।

इस अंतराल में यहाँ पर अनेक भव्य चर्चों, तेरेम महल, राजप्रासाद का निर्माण हुआ। सोबोरन्या स्क्वेयर में ‘ईवान-दी-ग्रेट’ बेल टावर की स्थापना हुई। क्रेमलिन एक भव्य, चित्ताकर्षक रूप में उभर कर सामने आया। ईवान की भावी पीढ़ियों ने भी क्रेमलिन के विकास तथा विस्तार में उल्लेखनीय योगदान किया। पीटर-दी-ग्रेट द्वारा राजधानी को पिटसबर्ग में स्थानान्तरित किए जाने के बाद भी इस मध्यकालीन किले पर रूसी शासकों की छाप देखी जा सकती है। पीटर ने यहाँ पर आयुधागार निर्मित करवाया था। प्रारम्भ में यहाँ पर सैन्य संग्राहलय का निर्माण कार्य शुरू हुआ था लेकिन बाद में यहाँ पर सीनेट बिल्डिंग और ग्रेट क्रेमलिन पैलेस जैसी उत्कृष्ट संरचनाएँ निर्मित की गयी।

1917 ई की क्रान्ति के बाद क्रेमलिन को अपना खोया सम्मान पुनः प्राप्त हो गया। कम्युनिस्टकालीन विरासत अनेक सुरक्षात्मक गुंबदों व वर्तमान क्रेमलिन के ऊपर लाल सितारों के रूप में शोभायमान है। 27 हेक्टेयर भूमि पर फैला भव्य क्रेमलिन अब सार्वजनिक रूप से खुला है। पर्यटक इसके सौंदर्य को निहार सकते हैं। भीतर विशाल ज़ार बेल ( टूट चुकी है) और ज़ार तोप विशेष रूप से दर्शनीय है।

कैथेडरल-

क्रेमलिन के कैथेडरल स्क्वेयर में अनेक भव्य अलंकृत चर्च हैं। कुछ विशिष्ट दर्शनीय कैथेडरल हैं-

यूस्पेंसकी (Cathederal of Assumption)-

इसका निर्माण इतालवी वास्तुकार अरस्तू फियोरावतंकी ने 1475 ई में आरंभ करवाया था। 1479 ई में श्रद्धालुओं के लिए इसके द्वार खोल दिये गए थे। यह यूरोपीय पुनर्जागरण काल में बाइजेंटाइन शैली में निर्मित भव्य संरचना है। भीतर वर्जिन मेरी के जीवन से सम्बद्ध सुंदर भित्तिचित्र हैं। इसके अतिरिक्त एक त्रिमूर्ति भी है। 1991 ई से यह रूस के कुलपति का पितृसत्तात्मक कैथेडरल है।

घोषणा कैथेडरल (Cathederal of Annunciation)-

मास्को के राजकुमारों के निजी उपयोग के लिए इस कैथेडरल का निर्माण हुआ था। प्रारम्भ में कैथेडरल के ऊपर तीन गुंबद और गैलेरी थी। निजी चर्च होने के कारण निर्माताओं ने इसकी आधारशिला ऊंचाई पर बनवाई ताकि इसमें रॉयल पैलेस की दूसरी मंज़िल से प्रवेश किया जा सके। ‘ईवान-दी-टेरीबल’ ने चर्च को अधिक आकर्षक बनाने के विचार से इसमें चार अतिरिक्त छोटे गिरिजाघरों का निर्माण करवाया। परिणाम ‘ईवान-दी-टेरीबल के नाम के अनुरूप टेरीबल हुआ। इमारत का संतुलन बनाए रखने के लिए दो और गुंबदों का निर्माण करवाना पड़ा। यह चर्च पूर्वनिर्मित चर्चों की तुलना में श्रेष्ठ माना जाता है

Archengal Cathederal-

यह कैथेडरल घोषणा कैथेडरल से आगे है। पत्थर से निर्मित इस कैथेडरल का डिजाइन इतालवी वास्तुकार अलेविज ने तैयार किया था। इस कैथेडरल में राजकुमारों तथा ज़ार का राज्याभिषेक होता था, विवाह सम्पन्न होता था और मृत्यु के बाद दफनाया जाता था। यहाँ पर शाही परिवार के सौ से अधिक सदस्यों के समाधि स्थल हैं।

12 देवदूतों का चर्च (Twelve Apostles Church)-

यह चर्च पेट्रीआर्क पैलेस का एक भाग है। पहले यह किले का ही भाग था। ज़ार शासन में इस को दैनिक प्रार्थना के लिए इस्तेमाल किया जाता था। केवल विशिष्ट अवसरों पर ही सामूहिक प्रार्थना सभा आयोजित की जाती थी।

बेल टावर ऑफ ईवान-दी-ग्रेट-

यह क्रेमलिन का प्रमुख आकर्षण है । इसके निर्माण की परिकल्पना ईवान-दी-ग्रेट ने की थी। निर्माण बोरिस गोडुनोव ने करवाया था। किंवदंती के अनुसार बोरिस गोडुनोव ने इसका निर्माण सिंहासन के वैध उत्तराधिकारी प्रिंस दिमित्री की हत्या का पश्चाताप करने के लिए करवाया था। बोरिस ज़ार घोषित किया गया था लेकिन जनसामान्य की दृष्टि में वह अयोग्य था। घंटाघर ऊंचा उठने के साथ-साथ जब हिलने लगता था तब लोग खुश होते थे। उनको लगता था कि घंटे के साथ-साथ ज़ार की गद्दी भी हिल रही है। लेकिन न तो ज़ार की गद्दी हिली और न ही बेल टावर गिरा। आज भी बेल टावर क्रेमलिन की सर्वोच्च संरचना के रूप में उन्नत मस्तक किए खड़ा है। इसका वज़न है 200 टन। समीप ही रखी है ‘ज़ार कैनन’। दुनिया की सबसे बड़ी तोप। हैरानी की बात यह है कि इस तोप ने कभी गोला नहीं उगला।

पैलेस ऑफ फेसट्स –

ईवान तृतीय को नवनिर्माण में अत्यधिक रुचि थी। उसके द्वारा निर्मित करवायी गयी संरचनाओं में यह सर्वाधिक भव्य है। मास्को की अन्य संरचनाओं के विपरीत यह पैलेस इटली के पुनर्जागरण काल की विशुद्ध स्थापत्यशैली में निर्मित है। इसका डिजाइन रुफ़ो एवं सोलारी ने तैयार किया था। यहाँ पर ज़ार विदेशी राजदूतों व अन्य अतिथियों का स्वागत करते थे। इस पैलेस की शान-ओ-शौकत देखते ही बनती है। स्वर्णिम पृष्ठभूमि पर सुंदर भित्तिचित्र उत्कीर्ण हैं।

कैथेडरल ऑफ डिपोज़िशन ऑफ रोब’ उपसेन्सकी कैथेडरल और पैलेस ऑफ फेसट्स के बीच एक निजी चर्च निर्मित है। 1653 ई में इसको रोमनोव परिवार ने निजी इस्तेमाल के लिए अधिग्रहण कर लिया था।

आर्मरी संग्रहालय-

मास्को के क्रेमलिन में स्थित आर्मरी संग्रहालय में विश्व का सर्वोत्कृष्ट, अमूल्य शाही खजाना संग्रहीत है। यहाँ पर शाही घरानों का साजोसामान, रत्नजड़ित वस्त्र, आभूषण,हथियार इत्यादि संग्रहीत हैं। उल्लेखनीय हैं- ‘कैप ऑफ मोनोमारव’। ज़ार इसको पहन कर ही सिंहासन पर बैठता था। यहीं पर रखी हुई है महारानी कैथेरीन द्वितीय की दुल्हन की पोशाक ।

डायमंड फंड-

यह आर्मरी संग्रहालय में स्थित पृथक प्रदर्शनी है। इसमें प्रदर्शित बहुमूल्य हीरे-जवाहरात से जड़े मुकुटों की तुलना ब्रिटेन तथा ईरान के रत्नजड़ित मुकुटों से की जा सकती है। कैथेरीन-दी-ग्रेट के शाही मुकुट तथा आने वाले सम्राटों का 5,000 हीरों जड़ा मुकुट भी रखा है। सात बहुमूल्य ऐतिहासिक तथा विश्व प्रसिद्ध रत्न देख कर भी आँखें चौंधिया जाती हैं।

ग्रेट क्रेमलिन पैलेस-

उपरोक्त पैलेस क्रेमलिन में प्राचीनतम है लेकिन समय के साथ-साथ नए भवनों का निर्माण भी होता गया। कान्स्टेंटाइन थोन ने नए ग्रेट क्रेमलिन पैलेस का निर्माण करवाया था। यह तेरेम पैलेस के ठीक सामने है। यह पारम्परिक काष्ठ संरचना है। इसमें सबसे पहले माइखेल रोमानोव (1613-1645) का परिवार रहा। ज़ार बनने से पहले रोमानोव एक कुलीन परिवार का सदस्य था।

क्रेमलिन के पूर्वी भाग में सरकारी भवन हैं। विशिष्ट हैं-18वीं सदी में निर्मित मास्को डिपार्टमेन्ट ऑफ दी सीनेट। यद्यपि क्रेमलिन की सभी संरचनाएँ तथा 20 टावर चित्ताकर्षक व दर्शनीय हैं तथापि दक्षिणी दीवार का ‘टावर ऑफ सीक्रेट्स’ सदियों से विद्वानों के लिए शोध का विषय रहा है। कहा जाता है कि यहाँ से नदी तक जाने के लिए भूमिगत मार्ग है; एक अन्य कथन के अनुसार यहाँ पर ‘ईवान-दी- टेरीबल’ का पुस्तकालय था। उसकी नानी/दादी सोफिया ने यहाँ पर पुस्तकों का संग्रह करना शुरू किया था। वह दहेज में अपने साथ दुर्लभ पुस्तकों की पांडुलिपियाँ लायी थी। माना जाता है कि क्रेमलिन की दीवार में अभी भी पुस्तकालय विद्यमान है। रहस्य बरकरार है।

रेड स्क्वेयर –

क्रेमलिन की दीवार को छू कर बाहर निकलना सौभाग्य तथा सुरक्षित वापसी का सूचक माना जाता है। क्रेमलिन के पूर्व में रेड स्क्वेयर है। यहाँ पंहुचने के लिए ट्रिनिटी गेट से बाहर निकल कर घूम कर आना पड़ता है। अलेक्ज़ेंड्रोवस्की गार्डन से बाहर आने पर मिलती है ‘अज्ञात सैनिक की समाधि’। बायीं तरफ की लाल इमारत में ऐतिहासिक संग्रहालय है। इसमें रूसी इतिहास को दर्शाती अतीत की दुर्लभ शिल्पाकृतियाँ रखी हैं।

मूल रूप से रेड स्क्वेयर क्रेमलिन की सुरक्षा के लिए खंदक के रूप में स्थित था। बाद में इसको भर कर समतल बनाया गया व पत्थर लगा कर पक्का कर दिया गया। शुरू-शुरू में पूरी दुनिया के व्यापारी यहाँ पर लकड़ी का व्यापार करते थे। 1737 ई के भीषण अग्निकांड में पुराना शहर नष्ट हो गया।

सामान्य धारणाओं के विपरीत रेड स्क्वेयर का नाम यहाँ की लाल बिल्डिंगों से सम्बद्ध नहीं है। अपितु इसका संबंध कम्युनिस्ट पार्टी के प्रतीक लाल रंग से है। आरंभ में यह ट्रिनिटी स्क्वेयर के नाम से जाना जाता था। 17वीं शताब्दी में रूसी लोगों ने इसको ‘क्र्सन्या प्लोशाड’ नाम से पुकारना शुरू कर दिया। पुरानी रूसी भाषा में ‘क्रसन्या’ का अर्थ सुंदर था जो बाद में लाल हो गया। फलस्वरूप यह ट्रिनिटी स्क्वेयर के स्थान पर रेड स्क्वेयर के नाम से प्रसिद्ध हो गया।

सेंट बेसिल कैथेडरल –

रेड स्क्वेयर स्थित सेंट बेसिल कैथेडरल मास्को की उसी प्रकार पहचान है जिस प्रकार पैरिस की पहचान ‘एफिल टावर’; लंदन की पहचान ‘बिग बेन’। किंवदंती के अनुसार ईवान-दी-टेरीबल ने इसका निर्माण करने वाले सभी शिल्पियों को अंधा करवा दिया था ताकि वे दोबारा ऐसी संरचना का निर्माण न कर सकें। ईवान ने रेड स्क्वेयर तथा मास्को में अनेक संरचनाओं का निर्माण करवाया। सेंट बेसिल कैथेडरल ‘ कैथेडरल ऑफ वेल’ के नाम से भी जाना जाता है। ईवान ने इसका निर्माण तातारों पर विजय के उपलक्ष्य में करवाया था। प्रत्येक विजय प्राप्ति के बाद (कुल नौ) इसमें एक नए गिरजाघर का निर्माण होता था। प्रत्येक गिरजाघर का नाम तत्कालीन संत के नाम पर रखा जाता था। ऊपरी स्वर्णिम गुंबद का नाम तत्कालीन संत बेसिल पर रखा गया था। संत बेसिल ने 1547 ई के भीषण अग्निकांड की भविष्यवाणी की थी। अपने भव्य गुंबदों, शिखरों और मेहराबों के कारण सेंट बेसिल रूस की सर्वाधिक भव्य और आकर्षक संरचना है।

स्मारक-

1930 ई में बोल्शेविक क्रान्ति के प्रणेता तथा सोवियत राज्य के संस्थापक लेनिन को रेड स्क्वेयर के पश्चिमी छोर पर दफनाया गया था। उसी वर्ष कुज़्मा मिनिन तथा प्रिंस दिमित्री पोज़ास्की को सम्मानित करने के विचार से उनको सेंट बेसिल कैथेडरल से ला कर रेड स्क्वेयर के मध्य समाधिस्थ किया गया। निकोलस्क्या तथा सेंटेसक्या के बीच क्रेमलिन दीवार का क्षेत्र सोवियत राजनीतिज्ञों, प्रसिद्ध व्यक्तियों तथा राजनेताओं का समाधिस्थल है। यहाँ पर मैक्सिम गोर्की, लेनिन की पत्नी न्देजदा कृप्स्क्या, अन्तरिक्ष यात्री यूरी गैगरीन ,आण्विक भौतिक शास्त्री कुरचाटोव तथा जॉन रीड की समाधियाँ हैं।

शताब्दियों तक रेड स्क्वेयर सार्वजनिक मार्केट तथा जनसामान्य का मिलन स्थल रहा। अनेक भाषण,प्रदर्शन, पैरेडस तथा विशाल भीड़ देखी। 16वीं शताब्दी में निर्मित चबूतरे पर खड़े हो कर भाषण दिये जाते थे। ज़ार यहाँ पर खड़े हो कर जनता को संबोधित करते थे। राजद्रोहियों का यहाँ जनता के सामने सिर कलम किया जाता था। रेड स्क्वेयर आधिकारिक सैन्य परेडों, सोवियत सैन्य शक्ति के प्रदर्शन का प्रमुख स्थल है।

सोवियत यूनियन के पतन के बाद भी रेड स्क्वेयर रूस के सांस्कृतिक जीवन का अभिन्न अंग तथा पर्यटकों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र है। यहाँ का विशाल GUM डिपार्टमेंटल स्टोर सोवियत कालीन प्रतीक चिन्ह के रूप में पूरे पूर्वी छोर पर फैला है। यह खरीददारी के लिए सर्वोत्तम स्थान है।

आज भले ही लेनिन के स्मारक के सामने लोगों की भीड़ न दिखाई दे,रेड स्क्वेयर में आयोजित रंगारंग कार्यक्रमों, उत्सवों को देखने के लिए लोगों का तांता लगा रहता है। इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं कि मास्को का दिल रेड स्क्वेयर तथा क्रेमलिन में धड़कता है। इनके अतिरिक्त भी मास्को के बदलते परिवेश में देखने के लिए बहुत कुछ है।

मास्को के लिए दिल्ली,मुंबई से एरोफ़्लोट व एयर इंडिया की उड़ानें जाती हैं। बजट के अनुरूप खान-पान व आवास की समुचित व्यवस्था है।

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विश्व का विशालतम हिन्दू मंदिर-अंगकोर वाट मंदिर

दक्षिण-पूर्वी एशिया के छोटे से देश कंबोडिया की अपने विशाल,भव्य विष्णु मंदिर के कारण सम्पूर्ण विश्व में एक विशिष्ट पहचान है। इस सांस्कृतिक, ऐतिहासिक विश्व विरासत को देखने के लिए प्रतिवर्ष यहाँ पर लाखों पर्यटक आते हैं। प्राचीन अभिलेखों में कंबोडिया का वर्णन कंबुज देश के नाम से किया गया है। किसी समय अंगकोरथोम कंबुज देश की राजधानी थी। इसका मूल नाम यशोधरपुर था। यहाँ पर खमेर शासकों का आधिपत्य था। मेकांग नदी के किनारे सिमरीप शहर में स्थित यह मंदिर विश्व का विशालतम हिन्दू मंदिर है।

कंबुज की राजधानी अंगकोरथोम के दुर्ग से लगभग डेढ़ कि.मी दक्षिण में स्थित है अंगकोरवाट। संभवतः इसी कारण से मंदिर का नाम ‘अंगकोरवाट मंदिर’ पड़ गया। इतिहासकारों के मतानुसार इस मंदिर का निर्माण कार्य सूर्यवर्मन द्वितीय ( 1112-1151) ने आरंभ करवाया था। असमय निधन हो जाने के कारण निर्माण पूरा नहीं हो पाया था। उनकी मृत्यु के बाद उन के उत्तराधिकारी धरनीन्द्रवर्मन (1152-1181) ने इस का निर्माण पूरा करवाया।

चौदहवीं-पंद्रहवीं शताब्दी में पश्चिम के सीमावर्ती प्रदेश के थाई लोगों ने कंबुज देश पर बार-बार आक्रमण करने आरंभ कर दिये और लूट-पाट मचाने लगे। विवश हो कर खमेर शासकों ने अपनी राजधानी स्थानान्तरित कर ली । यह नगर धीरे-धीरे बांस के घने जंगलों में विलुप्त हो गया। सभ्य जगत की आँखों से ओझल हो कर खंडहरों में परिवर्तित हो गया। 1861 ई में एक फ्रांसीसी ने घने जंगलों के बीच खंडहरों में परिवर्तित इस अमूल्य सम्पदा को देखा और पुरातत्वविदों को इस स्थान के बारे में सूचित किया। उन्होने इस भव्य मंदिर के जीर्णोद्धार का कार्य आरंभ कर गहन अध्ययन किया।

अंगकोरवाट की स्थापत्यशैली अद्वितीय है। कुछ पुरातत्वविदों,वास्तुविदों के विचार में मंदिर की स्थापत्य शैली भारत के चोलवंश शासकों द्वारा निर्मित मंदिरों की स्थापत्यशैली से मिलती है। वास्तव में इसमें चोल तथा खमेर स्थापत्यशैली का सम्मिश्रण परिलक्षित होता है। मिस्र तथा मेक्सिको के स्टेप पिरामिडों की भांति यह मंदिर सीढ़ीदार है। मंदिर के चारों तरफ साढ़े तीन कि मी लम्बी पत्थरों से निर्मित दीवार है। उसके बाहर 30 मीटर खुली ज़मीन और फिर सुरक्षा के लिए जलपरित खाई है। खाई की चौड़ाई लगभग 700 फीट है। दूर से यह खाई झील की तरह दिखाई देती है। खाई को पार करने के लिए मंदिर के पश्चिम में पुल बना हुआ है। पुल पार करने के बाद मंदिर तक पंहुचने के लिए ग्यारह मीटर चौड़ा और चार सौ मीटर लम्बा पत्थरों का रास्ता बना हुआ है।

अंगकोरवाट मेरु पर्वत का प्रतीक माना जाता है। विश्व के सर्वाधिक लोकप्रिय पर्यटन स्थलों में से एक है। इसकी अद्वितीय स्थापत्य शैली,अलंकरण,सांस्कृतिक महत्ता के आधार पर 1992 ई में यूनेस्को की विश्व विरासत समिति ने इसको विश्व धरोहर घोषित कर दिया था। यही नहीं 1983 ई से यह राष्ट्र के सम्मान के प्रतीक के रूप में राष्ट्रध्वज की शोभा बढ़ा रहा है।

162 हेक्टेयर भूमि पर फैले अंगकोरवाट मंदिर की तीन मंज़िल हैं। प्रत्येक मंज़िल से ऊपरी मंज़िल पर पंहुचने के लिए सीढ़ियाँ बनी हुई है। प्रत्येक मंज़िल पर निर्मित खंड भव्य प्रतिमाओं से सुशोभित है। सब से ऊपरी मंज़िल पर पंहुचने के लिए सीढ़ियाँ पहली मंज़िल की सीढ़ियों की तुलना में दोगुनी हो गयी है। प्रत्येक मंज़िल पर स्थित भाग में आठ गुंबज हैं। प्रत्येक गुंबज की ऊंचाई 180 फीट है। ऊपरी खंड पर भी एक गुंबज है। मध्य में गर्भगृह है । इसमें भगवान विष्णु की प्रतिमा प्रतिष्ठित है। इस मंज़िल पर स्थित मुख्य मंदिर के शिखर की ऊंचाई 213 फीट है।

अंगकोरवाट की भव्य मूर्तिकला चित्ताकर्षक है। दीवारों पर उत्कीर्ण भित्तिचित्र, आलों में रखी मूर्तियों , स्थान-स्थान पर किए गए अलंकरण को देख कर पर्यटक चित्रलिखित से रह जाते हैं। आलों में रखी जीवंत,सुंदर नवयौवनाओं की मूर्तियाँ मन मोह लेती हैं। उनके परिधान,भाव-भंगिमाएँ,मुखाकृतियाँ देख कर कंबुज नृत्यांगनाओं का स्मरण हो आता है ।

मंदिर के गलियारों में निर्मित शिल्पाकृतियों के कथानकों का मुख्य आधार रामायण,महाभारत की कथाएँ हैं। शिव,विष्णु के अनेक रूपों को चित्रित किया गया है। बलि-वामन,स्वर्ग-नरक, समुद्र मंथन, देव-दानव युद्ध, महाभारत, हरिवंश पुराण तथा रामायण के आख्यानों को वर्णित करते अनेक मुग्धकारी चित्र हैं। भित्तिचित्रों में भी रामकथा संक्षिप्त में उत्तीर्ण है। यह रामकथा वाल्मीकि के आदिकाव्य पर आधारित है। यह शृंखलाबद्ध रूप में रावणवध हेतु देवताओं की आराधना से आरंभ होती है। परवर्ती चित्रों में अशोकवाटिका में हनुमान की उपस्थिती,बाली-सुग्रीव युद्ध, राम-रावण युद्ध, सीता की अग्नि परीक्षा और राम की अयोध्या वापसी के दृश्य हैं। अंगकोरवाट में रूपायित रामकथा विरल और संक्षिप्त है। देख कर पर्यटक भाव विभोर हो जाते हैं।

अंगकोरवाट का विशाल आकार, सुनियोजिन, कलात्मक -उत्कृष्ट मूर्तिकला, भव्य अलंकृत स्थापत्यशैली का अप्रतिम उदाहरण है। एक ओर अद्वितीय, भव्य स्थापत्य शैली तो दूसरी ओर नीचे से ऊपर शिखर तक वैविध्यपूर्ण, विस्मयकारी अलंकरण देख कर दर्शक का हृदय आनंद से उद्वेलित हो उठता है। वस्तुतः यह खमेर कला का अनुपम, विकसित कलात्मक अविस्मरणीय स्मारक है।

पुरातत्त्ववेत्ताओं व इतिहासकारों के मन में यह रहस्य जानने की उत्कंठा आज भी विद्यमान है कि इस विशाल, भव्य मंदिर के निर्माण के मूल में क्या भावना रही होगी? कुछ के विचार में सूर्य वर्मन द्वितीय ने अपनी स्मृति को चिरस्थायी बनाने के लिए इस मंदिर का निर्माण करवाया था। इसमें उनके अस्थि अवशेष भी संरक्षित थे। उनको विष्णु का अवतार माना जाता था। मंदिर में भगवान विष्णु की प्रतिमा प्रतिष्ठित थी। 14वीं,15वीं शताब्दी में बौद्ध अनुयायियों ने इस पर आधिपत्य कर लिया था।

बीसवीं शताब्दी के आरंभ में अंगकोरवाट में किए गए पुरातत्त्विक उत्खनन से खमेरों के धार्मिक विश्वासों,उनकी कला, शिल्प तथा तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों पर विस्तृत प्रकाश पड़ा है। प्रतिवर्ष सम्पूर्ण विश्व से अगणित पर्यटक इस प्राचीन हिन्दू-बौद्ध केंद्र को देखने के लिए आते हैं। वे यहाँ पर केवल वास्तुशास्त्र के अप्रतिम सौंदर्य का ही आनंद नहीं लेते अपितु यहाँ पर सूर्योदय तथा सूर्यास्त का मुग्धकारी दृश्य भी देखने के लिए आते हैं।

अंगकोरवाट भारत के साथ कंबुज (कंबोडिया) देश के साथ घनिष्ठ सम्बन्धों का परिचायक है। इसके निर्माण में भारतीय शिल्पकला, विषयवस्तु के साथ-साथ क्षेत्रीय प्रभाव भी परिलक्षित होता है। अंगकोरवाट पूरे विश्व के साथ सम्बद्ध है। समीपस्थ एयरपोर्ट सिमरीप अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट है। केवल अंगकोरवाट के भ्रमणार्थियों के लिए सिमरीप एयरपोर्ट पर उतरना सुविधाजनक है। एयरपोर्ट से टैक्सी से 30 मिनट का रास्ता है। टुक-टुक ( आटोरिक्शा) भी आसानी से मिल जाती है। मंदिर दिखाने के लिए गाइड मिल जाते हैं।

अंगकोरवाट का भ्रमण करने के लिए नवम्बर-दिसम्बर सर्वोत्तम समय है। यद्यपि इस समय पर्यटकों की भीड़ भी रहती है। जो भी हो इस विशाल हिन्दू मंदिर की एक बार यात्रा वांछनीय है।

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प्रमीला गुप्ता